सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

श्री वेदव्रत मंडोरा का आत्मकथ्य

भूमिका

हर परिवर्तन की कहानी एक व्यक्ति के जागरण से शुरू होती है—एक ऐसा मन, जो साधारण परिस्थितियों में भी असाधारण संभावना देख ले। मंडोरा के प्रगतिशील किसान श्री वेदव्रत मंडोरा की यात्रा भी ऐसी ही दूरदृष्टि और संकल्प की कहानी है। गन्ना उत्पादक क्षेत्र में वैज्ञानिक तकनीकों, जैविक उपायों और समेकित नाशीजीव प्रबंधन को व्यवहार में उतारने का स्वप्न उन्होंने तब देखा, जब आम किसान इन अवधारणाओं को कठिन और दूर की बात समझते थे। परंतु वेदव्रत जी ने न केवल इस दिशा में पहल की, बल्कि अपने गाँव को देश का पहला “गन्ना आधारित आईपीएम मॉडल गांव” बनवाने में अग्रणी भूमिका निभाई। यह आत्मकथ्य उनके उसी समर्पण, संघर्ष और सफलता का जीवंत दस्तावेज है—जो बताता है कि एक किसान की सोच यदि जाग जाए, तो वह गाँव नहीं, युग बदल देता है।

“गन्ना आधारित आईपीएम मॉडल गांव : मेरा स्वप्न, मेरा संकल्प”

श्री वेदव्रत मंडोरा का आत्मकथ्य

गाँव की मिट्टी का कण-कण मेरे लिए आशीर्वाद है। मैं अक्सर सोचता हूँ—यदि किसान बदलने का साहस कर ले, तो उसके खेत ही नहीं, उसकी पूरी दिशा बदल सकती है। आज जब मैं “गन्ना आधारित आईपीएम मॉडल गांव—मंडोरा” के उद्घाटन दिवस को याद करता हूँ, तो लगता है जैसे मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि उसी क्षण आकार ले रही थी।

28 नवम्बर 2025…

मंडोरा की हवाओं में उस दिन एक अलग ही उल्लास था। गन्ने के खेतों में ड्रोन की गुनगुनाहट किसी नए युग की आहट लग रही थी। वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और सैकड़ों किसानों की उपस्थिति में जब इस परियोजना का उद्घाटन हुआ, तो मेरे भीतर मानो वर्षों का संकल्प उजाला बनकर फैल गया। मुझे गर्व भी था और जिम्मेदारी भी—गर्व इसलिए कि मेरा गाँव पूरे उत्तर प्रदेश से चयनित होकर यह सम्मान प्राप्त कर रहा है, और जिम्मेदारी इसलिए कि यह पहल अब मेरे गाँव के भविष्य को दिशा देने जा रही है।

मेरा सपना

जैविक और सुरक्षित खेती की ओर कदम

किसानों के बीच रहकर मैंने हमेशा यही चाहा कि हम रासायनिक निर्भरता से बाहर निकलें और फसल को सुरक्षित रखने के लिए प्रकृति की ओर लौटें। यही वजह थी कि जब आईसीएआर–राष्ट्रीय समेकित नाशीजीव प्रबंधन अनुसंधान संस्थान ने “गन्ना आधारित आईपीएम परियोजना” मंडोरा में लागू करने की सहमति दी, तो मैंने इसे सिर्फ योजना नहीं, बल्कि गाँव के परिवर्तन का अवसर माना।

पिछले 7–8 महीनों में हमारे खेतों ने बदलते समय को करीब से देखा है।

— 200 एकड़ में जैविक कंसोर्टियम का प्रयोग

— 250 एकड़ में नीम आधारित कीटनाशक का छिड़काव

— 500 एकड़ में ट्राइकोकार्ड वितरण

— 200 एकड़ में ड्रोन स्प्रे

ये केवल आँकड़े नहीं थे, बल्कि मेरे गाँव के किसानों की नई सोच का प्रमाण थे।

किसानों को मिली पहली बार IPM किट

जब किसानों को विशेष रूप से तैयार की गई IPM किट वितरित की गई, तो उनके चेहरों पर उमंग देखकर मुझे यह अहसास हुआ कि ज्ञान और साधन—यदि दोनों सही समय पर मिल जाएँ—तो किसान असीम संभावनाएँ रच सकता है।

नीम तेल, ट्राइकोकार्ड, फेरोमोन ट्रैप, IPM-Trigourd, कंसोर्टियम, क्रायसोपरला कार्ड, आधुनिक कीटनाशक विकल्प और मार्गदर्शन पुस्तिकाएँ…

यह सब वही परिवर्तनकारी सामग्री थी, जिसे देखकर वर्षों से मेरे मन में बसे सपने ने आवाज दी—

“अब मंडोरा पीछे नहीं, आगे चलेगा।”

वैज्ञानिकों के प्रति मेरी कृतज्ञता

डॉ. श्रवण एम. हलधर का मार्गदर्शन, डॉक्टर आर. थंगावेलु और मुख्य अतिथि डॉ. पूनम जसरोटिया का प्रेरक संबोधन, साथ ही डॉ. पी.एन. मीना, डॉ. मनोज चौधरी, डॉ. रेखा बलोधी और ऐके कनौजिया का समर्पित सहयोग—

इन सबने इस परियोजना को सिर्फ सरकारी पहल नहीं, बल्कि किसानों की अपनी आंदोलनात्मक यात्रा बना दिया।

उद्घाटन के क्षण और मेरा मन

जब मैंने समारोह में सभी अतिथियों और किसानों का आभार व्यक्त किया, तो मेरे मन में एक ही बात थी—

*“यह शुरुआत है। आने वाला कल बदलेगा, और बदलने का श्रेय मेरे गाँव के किसानों को ही मिलेगा।”*

गर्व तो मुझे इस बात का भी है कि इस तकनीक के लिए मंडोरा पूरे उत्तर प्रदेश से चयनित अकेला गांव बना। यह सम्मान मेरे लिए केवल पुरस्कार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का बोध है।

मैं चाहता हूँ कि मंडोरा, गन्ना आधारित आईपीएम का ऐसा मॉडल बने, जिसे देखकर देशभर के किसान प्रेरणा लें।

जहाँ फसल स्वस्थ हो, पर्यावरण सुरक्षित हो और किसान सम्मान के साथ आगे बढ़े।

आज जब मैं यह आत्मकथ्य लिख रहा हूँ, तो मेरे हृदय में एक ही वाक्य बार-बार गूँज रहा है:

“किसान बदलेगा, तभी कृषि बदलेगी—और मंडोरा इस परिवर्तन का पहला अध्याय बन चुका है।”

झलकियाँ 











सुर्खियाँ 


सृजक

वेदव्रत मंडोरा

प्रगतिशील किसान, मंडोरा (मेरठ)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...