“मेरी दृष्टि, मेरा विचार, मेरा उद्देश्य”
जब मैं इस पुस्तक को लिखने बैठा, तो मेरे मन में बार-बार एक ही पंक्ति गूंजती रही—
“शूरा सोई सराहिए… जो लड़े हीन के हेत।”
मैंने महसूस किया कि हमारी संस्कृति में नायक वह नहीं है जो दूसरों को दबाकर बड़ा बनता है; नायक वह है जो स्वयं टूटकर भी न्याय के साथ खड़ा रहता है।
इसी विचार ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया।
मैंने सोचा—
क्या आज की पीढ़ी वास्तव में जानती है कि हमारी भूमि किन बलिदानों पर खड़ी है?
क्या हम यह समझते हैं कि हमारी संस्कृति केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि रक्त, त्याग, आंसुओं और संघर्ष की रक्षा-रेखाओं में सुरक्षित रही है?
जब इतिहास के पन्नों को उलटता हूँ, तो साफ दिखता है कि भारत केवल एक देश नहीं—
यह एक विचार है, एक जीवन-धारा है, जो कभी आक्रांतों से डरी नहीं, केवल लड़ी।
कभी प्रतिहारों के साहस में,
कभी नागा साधुओं के कठोर तप में,
कभी मराठों के स्वाभिमान में,
कभी जाटों और सिखों के गर्जन में।
मैंने यह भी सोचा कि इतिहास केवल विजेताओं की कथा नहीं होता;
वह उनकी स्मृति भी होता है जो हारकर भी हारे नहीं।
यह पुस्तक उन स्मृतियों का ही संग्रह है।
जब अरबों के आक्रमण से भारत हिलता था,
जब मुगल सत्ता अपने चरम पर थी,
जब अंग्रेज आर्थिक, धार्मिक और मानसिक गुलामी थोप रहे थे—
तब भी भारत का सामान्य किसान, एक सामान्य सिपाही, एक सामान्य स्त्री अपने भीतर एक अदृश्य शक्ति महसूस करती थी।
यह वही शक्ति थी जिसने भारत को कभी टूटने नहीं दिया।
मैंने मन में कई बार सोचा—
अगर प्रतिहार न होते, अगर शिवाजी न होते, अगर गोकुला न होता, अगर सिखों का संघर्ष न होता—तो क्या हम आज अपनी पहचान के साथ खड़े होते?
इस सवाल ने मुझे इस लेखन के लिए प्रेरित किया।
मेरे विचार में इतिहास केवल घटनाएँ नहीं देता, वह हमें आत्मबल देता है।
इसीलिए मैंने यह पुस्तक लिखी कि
आज का भारत अपने इतिहास को जाने, समझे और उससे शक्ति ले— न कि केवल गौरवगान के रूप में, बल्कि जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना के रूप में।
मैं यह भी सोचता हूँ कि हमारी पहचान दो दिशाओं में आगे बढ़नी चाहिए—
नवीन को स्वीकार करना और प्राचीन मूल्यों को संरक्षित रखना।
यदि हम केवल नए की ओर भागेंगे, तो जड़ें खो देंगे।
यदि केवल पुराने से चिपके रहेंगे, तो भविष्य खो देंगे।
मेरी दृष्टि में नित-नूतन चिर-पुरातन ही वह सूत्र है जो भारत को आगे बढ़ा सकता है।
इस पुस्तक में मेरे परिवार की उन महिलाओं का उल्लेख भी है जिन्होंने बिना किसी मंच, बिना किसी प्रशंसा के—
अपने जीवन को नैतिकता, दृढ़ता और सादगी के सर्वोच्च रूप में जिया।
मुझे लगा कि त्याग केवल युद्धभूमि में नहीं होता;
वह रसोई, खेत, आंगन, और जीवन के छोटे-छोटे निर्णयों में भी होता है।
उनका जीवन मुझे सिखाता है कि इतिहास केवल राजाओं का नहीं होता—
वह माँओं और नानियों के हृदय में भी लिखा जाता है।
जब मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूँ, तो एक ही उद्देश्य सामने है—
भारतीय युवा यह जानें कि उनका वर्तमान केवल उनकी प्रतिभा का परिणाम नहीं, उनके पूर्वजों के मूल्य और बलिदानों की नींव पर खड़ा है।
और यदि यह पुस्तक एक भी युवा को अपनी पहचान, संस्कृति और मूल्यों के प्रति जागरूक कर दे—
तो मैं समझूँगा कि मेरा उद्देश्य पूरा हुआ।
वक्ता
डा. अशोक कुमार
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें