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पेरेंटिंग, वह दीप, अभावों में भी उजाला गढ़ दे

भूमिका

यूपीएससी की टॉपर कशिश के पिता के इस साक्षात्कार में वह पूरा परिवार जीवंत हो उठता है।

एक ओर वह पिता, जो संघर्षों की तपिश में खुद को तपाकर बेटी के लिए रास्ते बनाता रहा;

दूसरी ओर वह मां, जिसने अपने हर त्याग को बेटी के सपनों की सीढ़ी बना दिया;

और बीच में कशिश, जिसने उन्हीं मूल्यों को धारण कर इतिहास लिख दिया।

यह सिर्फ सफलता की कहानी नहीं—

यह संदेश है कि सपने अक्सर साधनों की कमी से नहीं रुकते; वे रुकते हैं जब परिवार का संकल्प डगमगा जाए।

यह परिवार साबित करता है कि संसाधन सीमित हों तो भी,

यदि पेरेंटिंग में विश्वास, सहयोग, अनुशासन और मूल्य हों—तो बच्चा केवल लक्ष्य ही नहीं पाता, अपनी छवि भी गढ़ता है।

साक्षात्कार 

पेरेंटिंग, वह दीप, अभावों में भी उजाला गढ़ दे

संवाद  श्री जितेंद्र कसाना जी से 

(पिता, कशिश कसाना – UPSC I.S.S. Top Ranker)

प्रस्तुति 


टीम उलझन–सुलझन

बातचीत 

प्रश्न १. सर, कशिश की सफलता ने आपको किस प्रकार की अनुभूति दी? उस पल आपके मन में क्या उमड़ा?

उत्तर : "जब रैंक सूची में कशिश का नाम सबसे ऊपर चमक रहा था, मुझे ऐसा लगा जैसे जीवन ने मेरे संघर्षों पर हल्की-हल्की मुस्कान बिखेर दी हो। वर्षों की तपस्या, रातों की थकान, अभावों से जूझता मन… सब एक बिंदु पर आकर ठहर गया। आँखें नम थीं, पर दिल गर्व से भरकर चौड़ा हो गया था। जैसे किसी ने कंधे पर हाथ रखकर कहा हो—

"तुम्हारे संघर्ष व्यर्थ नहीं गए।"

प्रश्न २. आपके जीवन की कठिनाइयों ने पेरेंटिंग को कैसे प्रभावित किया? क्या कभी ऐसा लगा कि अभावों से बच्चों का सपना भारी पड़ जाएगा?

उत्तर: "अभावों ने हमें तोड़ा नहीं, बल्कि बच्चे पालने का सही अर्थ सिखाया। मैंने और उनकी मां ने हमेशा यही तय किया कि चाहे घर में सुविधा कम हो, पर बच्चों के आत्मविश्वास में कभी कमी नहीं आएगी। कभी-कभी लगता था कि रास्ता लंबा है और साधन कम… पर पितृत्व का साहस किसी मशीन से नहीं जन्मता—वह बच्चों की आँखों में चमकते सपनों से जन्म लेता है।

हमने वही चमक बचाए रखी।"

प्रश्न ३. आपकी पत्नी शिक्षिका हैं। उनकी भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

उत्तर: "सच कहूँ तो मैं जितना संघर्षों को जानता हूँ, वह उतनी ही गहराई से समर्पण को जीती हैं। एक मां, एक शिक्षिका और एक मार्गदर्शक—इन तीनों भूमिकाओं को वह इतने सहज भाव से निभाती हैं कि कई बार लगता है कशिश की सफलता का आधा श्रेय तो उन्हें ही है।

रात में बच्चों की पढ़ाई का माहौल बनाना, सुबह स्कूल जाना, घर लौटकर फिर बच्चों के साथ बैठना—वह खुद थक जाती थीं, पर बच्चों को कभी थकने नहीं देती थीं।

उनका यही त्याग आज सूखे पेड़ पर हरी पत्ती की तरह कशिश के भविष्य में खिल उठा है।"

प्रश्न ४. कशिश की क्रमिक सफलताओं को जब आप देखते थे, तब एक पिता के भीतर क्या परिवर्तन आता था?

उत्तर: "हर छोटी सफलता के साथ मेरा विश्वास बड़ा होता गया। जब उसने पहली बार जिला स्तर पर सफलता पाई थी, तभी मुझे लगा कि यह बच्ची थमने वाली नहीं है। उसकी आँखों में एक अजीब-सी दृढ़ता है—वह अनथकी है, अबाध है, अडिग है।

हर बार जब वह कोई उपलब्धि लेकर आती थी, मेरा सीना कुछ और चौड़ा हो जाता था… जैसे वह सिर्फ अपनी नहीं, मेरे जीवन की भी जीत लिख रही हो।"

प्रश्न ५. बच्चों के लिए अध्ययन का अनुकूल वातावरण बनाने में आपने क्या सिद्धांत अपनाए?**

उत्तर: "हमारा सिद्धांत बहुत सरल था—

'परिस्थितियों को साध नहीं सकते, पर बच्चों की ऊर्जा को साध सकते हैं।' 

हमने घर में यह सुनिश्चित किया कि बच्चों को ‘सुनने वाला’ वातावरण मिले—

• उनकी जिज्ञासाओं को रोका नहीं जाए।

• उनकी गलतियों को दंड नहीं, दिशा मिले।

• और उनकी मेहनत का सम्मान हो, चाहे परिणाम कैसा भी हो।

कभी-कभी मुझे लगता है कि पेरेंटिंग का असल मतलब बच्चों पर पहरा रखना नहीं, बल्कि उनकी उड़ान की हवा को साफ रखना है।"

प्रश्न ६. आप अपने पुत्र के भविष्य को लेकर कितने आश्वस्त हैं?

उत्तर: "बहुत। क्योंकि मैंने उसके भीतर वही दृढ़ता देखी है जो कशिश के भीतर है। वह अपने लक्ष्य को लेकर सजग है और मेहनत के रास्ते से कभी पीछे नहीं हटता। जब पिता अपने बच्चे को संघर्ष करते देखता है, तो चिंताएँ कम और विश्वास अधिक जन्म लेता है।

मैं आश्वस्त हूँ कि वह अपने रास्ते खुद गढ़ेगा—और जब वह सफलता की पहली सीढ़ी चढ़ेगा, तब मेरी खुशी दोगुनी होगी, जैसे आज है।"

प्रश्न ७. क्या आपको लगता है कि कशिश अपनी उपलब्धि के बाद अब रुक जाएगी?

उत्तर:

"नहीं। बिल्कुल नहीं।

कशिश का स्वभाव ही आगे बढ़ने का है। उसने जब परिणाम देखा, तो मुझसे सिर्फ एक बात कही—

'पापा, अभी बहुत कुछ बाकी है।' 

उसके इस एक वाक्य ने मेरे भीतर की सारी थकान धो दी। वह रुकने वालों में से नहीं है। उसका सपना उससे बड़ा है, और उसका संकल्प उसके सपने से भी बड़ा।"

प्रश्न ८. अंत में, आप पेरेंटिंग को एक वाक्य में कैसे परिभाषित करेंगे?

उत्तर: "पेरेंटिंग वह श्रद्धा है, जो बच्चों के सपनों को देखकर अभावों को भी अवसर में बदल दे।"

ममता की छांव


सूचना स्रोत 

श्री जितेंद्र कसाना जी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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