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स्वप्न - भयमुक्त, साहसी और आत्मनिर्भर बालिकाएं

 भूमिका 

आज के परिवर्तित सामाजिक वातावरण में बालिकाओं की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता केवल एक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक अनिवार्य संकल्प बन चुकी है। इसी संकल्प को अपने विज़न और जिम्मेदारी का केंद्र मानते हुए प्रधानाचार्य श्री गिरिराज प्रसाद गुर्जर ने रानी लक्ष्मीबाई आत्मरक्षा प्रशिक्षण शिविर की पहल को केवल एक गतिविधि नहीं, बल्कि एक जीवंत स्वप्न का रूप दिया है—ऐसा स्वप्न जिसमें हर बालिका भयमुक्त होकर आगे बढ़ सके, प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को सुरक्षित रख सके और साहस, नेतृत्व तथा आत्मविश्वास के साथ जीवन को जी सके। यह आत्मकथ्य उसी विचारधारा को व्यक्त करता है, जिसमें प्रधानाचार्य अपने भीतर की चिंता, आकांक्षा और उम्मीदों को शब्द देते हैं—यह बताते हुए कि एक शिक्षण संस्थान की असली सफलता तभी है, जब उसकी बालिकाएँ सिर्फ पढ़ी-लिखी ही नहीं, बल्कि आत्मरक्षा में निपुण, निर्णायक और निडर नागरिक बनकर उभरें।

प्रधानाचार्य श्री गिरिराज प्रसाद गुर्जर का आत्मकथ्य

स्वप्न - भयमुक्त, साहसी और आत्मनिर्भर बालिकाएं

जब भी मैं विद्यालय प्रांगण में खड़ी किसी बालिका की संकोच भरी नज़रें देखता हूँ, मन में एक ही प्रश्न उठता है—

क्या हम उसे इतना सक्षम बना पाए हैं कि वह अपने भय से लड़ सके?

इसी प्रश्न ने मेरे भीतर एक स्वप्न को जन्म दिया—

बालिकाओं को आत्मरक्षा में निपुण बनाकर उन्हें भयमुक्त जीवन देना है।

रानी लक्ष्मीबाई आत्मरक्षा प्रशिक्षण शिविर उसी स्वप्न का आकार लेता हुआ परिणाम है। जब पूजा गोस्वामी और उनकी टीम बालिकाओं को पंच, किक, बचाव के तरीके, मार्शल आर्ट और प्राणायाम सिखाती हैं, तो मुझे केवल तकनीकें ही नहीं दिखतीं—मुझे उनमें उगता हुआ आत्मविश्वास दिखता है।

हर सूर्य नमस्कार के साथ जैसे वे मन के भीतर छिपे डर को पीछे छोड़ देती हैं, हर वार के साथ जैसे अपनी चुप्पी को तोड़ती हैं, और हर विन्यास के साथ जैसे स्वयं को एक नई शक्ति से भर लेती हैं।

मैं अकसर प्रशिक्षण स्थल पर जाकर उनके चेहरों को देखता हूँ—कभी प्रश्नों से भरे, कभी उत्साह से चमकते, और अब धीरे-धीरे एक दृढ़ तेज से प्रकाशित होते हुए। यह तेज ही मेरे स्वप्न का मूल है। मैं चाहता हूँ कि—

हमारी हर बालिका की आँखों में साहस हो, कदमों में विश्वास हो, और मन में यह दृढ़ भावना कि वह खुद का बचाव कर सकती है।

मेरा विश्वास है कि जब यह प्रशिक्षण पूरा होगा, ये बालिकाएँ केवल तकनीकी रूप से प्रशिक्षित नहीं होंगी—ये ‘कालिका यूनिट’ बनकर खड़ी होंगी, संकल्प, शक्ति और निडरता की प्रतीक।

इनमें वह साहस होगा कि किसी भी विपरीत परिस्थिति में वे मां कालिका की तरह दृढ़ होकर खड़ी रहें।

मैं कल्पना करता हूँ उस दिन की जब कोई बालिका रास्ते में अकेली जा रही हो और उसके कदमों में ज़रा भी हिचक न हो।

* वह क्षण, जब कोई समस्या आए और वह बिना डरे उसे शिक्षक या परिजन से साझा कर सके।

* वह पल, जब किसी भी संकट की आहट पर वह खुद को असहाय नहीं, बल्कि सक्षम महसूस करे।

यदि बालिकाएँ आत्मरक्षा में निपुण हो गईं, तो सबसे बड़ा परिवर्तन तकनीक का नहीं, उनकी सोच का होगा।

वे अब डर को अपना स्वभाव नहीं बनाएंगी,

वे अब परिस्थितियों से भागेंगी नहीं,

वे अब अपने निर्णय आत्मविश्वास से लेंगी।

ईश्वर मेरी मदद करेंगे मुझको पूरा यकीन है।

मुझे विश्वास है कि जब बालिका निडर होती है, तभी समाज सुरक्षित होता है।

जब बालिका सक्षम होती है, तभी परिवार मजबूत होता है।

और जब बालिका आत्मनिर्भर होती है, तभी राष्ट्र सशक्त होता है।

रानी लक्ष्मीबाई की विरासत इन्हीं बच्चियों की भुजाओं में, इनके आत्मविश्वास में, और इनके सपनों में जीवित रहे—

यही मेरा संकल्प, यही मेरा स्वप्न, और यही इस प्रशिक्षण शिविर का सार है।

मेरा प्रयास

 

संपर्क सूत्र
Principal 
PM Shri Govt Sr Sec School 
Newai Tonk 
Mobile no - 9929535357
Mail id - gpgurjar101@gmail.com

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