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संवेदनाओं को शब्दों में ढालने में सक्षम हैं कवयित्री नेहा कटारा

 प्रेरणादायी साक्षात्कार : कवयित्री नेहा कटारा

भूमिका

कला और साहित्य मानव जीवन की आत्मा हैं, और जब कोई स्त्री अपनी संवेदनाओं को शब्दों में ढालकर समाज के सामने प्रस्तुत करती है तो वह केवल साहित्य नहीं रचती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का दीप भी प्रज्वलित करती है। राजस्थान की पावन धरती से जुड़ीं कवयित्री नेहा कटारा आज साहित्य जगत में अपनी ग़ज़लों, कविताओं, हाइकुओं और कहानियों से एक सशक्त पहचान बना रही हैं। उनकी लेखनी में जहाँ संवेदनाओं की गहराई है, वहीं समाज और जीवन के विविध पहलुओं पर विचारोत्तेजक दृष्टि भी है। कई प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर और विभिन्न सम्मानों से अलंकृत होकर वे नवोदित साहित्यकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हैं। प्रस्तुत है उनसे हुई प्रेरणादायी बातचीत—

प्रश्नोत्तर

प्रश्न १. नेहा जी, सबसे पहले हम आपसे यह जानना चाहेंगे कि साहित्य की ओर आपका रुझान कब और कैसे प्रारंभ हुआ?

उत्तर: बचपन से ही शब्दों के प्रति आकर्षण था। किताबें पढ़ते-पढ़ते मन में भी भाव उमड़ने लगे और उन्हें कागज़ पर उतारने की आदत बन गई। धीरे-धीरे यह शौक एक जुनून में बदल गया और ग़ज़लें, कविताएं और कहानियाँ लिखना मेरी आत्मा की अभिव्यक्ति बन गईं।

प्रश्न २. आपने बी.एस.सी. और एम.ए. (हिन्दी व भूगोल) की शिक्षा ली है। विज्ञान और साहित्य का यह संगम आपके लेखन को किस प्रकार प्रभावित करता है?

उत्तर: शिक्षा से मिली तार्किकता और संवेदनशीलता ने मेरी लेखनी को संतुलन दिया। विज्ञान ने मुझे जीवन की गहराई को समझने की दृष्टि दी और हिन्दी साहित्य ने भावनाओं को शब्द देने का सामर्थ्य। यही कारण है कि मेरी रचनाओं में संवेदना के साथ-साथ गहराई और स्पष्टता भी मिलती है।

प्रश्न ३. आपकी ग़ज़लें और कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। आपके लिए प्रकाशन का यह सफर कैसा रहा?

उत्तर: यह सफर बेहद सुखद और प्रेरणादायी रहा। जब मेरी पहली ग़ज़ल ‘राजस्थान पत्रिका’ में प्रकाशित हुई तो आत्मविश्वास बढ़ा। उसके बाद "कविता कोना", "सौरभ दर्शन", "शिखर विजय", "दैनिक नवज्योति" और अन्य पत्रिकाओं में रचनाएँ छपना मेरे लिए सम्मान और ज़िम्मेदारी दोनों लेकर आया।

प्रश्न ४. आपने हाइकु, ग़ज़ल, कविता, दोहे और कहानियाँ लिखीं हैं। इन सबमें आपको कौन-सा विधा सबसे निकट लगती है?

उत्तर: हर विधा का अपना आकर्षण है, लेकिन ग़ज़ल मेरे दिल के सबसे करीब है। ग़ज़लें लिखते समय लगता है जैसे शब्द खुद-ब-खुद बहते चले जा रहे हैं। उसमें भावनाओं को संक्षेप और गहराई से व्यक्त करने का जो सौंदर्य है, वह मुझे बहुत प्रिय है।

प्रश्न ५. आपको कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं। इनमें से आपके हृदय के सबसे करीब कौन-सा सम्मान है?

उत्तर: हर सम्मान मेरे लिए अमूल्य है, लेकिन "महिला युवा ग़ज़लकार" के रूप में मेरा चयन मेरे लिए बेहद खास है। यह केवल एक सम्मान नहीं बल्कि स्त्रियों की सृजनशीलता को पहचान देने वाला गौरव भी है।

प्रश्न ६. साहित्य के क्षेत्र में कदम रखने वाली नई पीढ़ी को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर: मेरा संदेश यही है कि लिखने से पहले जीवन को गहराई से महसूस करें। शब्द तभी असर करते हैं जब वे दिल से निकले हों। साथ ही धैर्य रखें—साहित्य साधना है, जल्दबाज़ी में नहीं बल्कि निरंतर प्रयासों से ही पहचान मिलती है।

प्रश्न ७. आपको अध्यापन का भी अनुभव है। क्या यह आपके लेखन को प्रभावित करता है?

उत्तर: जी हाँ, अध्यापन से मुझे समाज और नई पीढ़ी की सोच को करीब से समझने का अवसर मिलता है। बच्चों की जिज्ञासाएँ, उनकी भावनाएँ और सपने अक्सर मेरी कविताओं और कहानियों में झलकते हैं।

प्रश्न ८. एक महिला साहित्यकार होने के नाते आपने अपनी लेखनी से स्त्रियों की भावनाओं को भी आवाज़ दी है। इस विषय पर आपका क्या कहना है?

उत्तर: स्त्रीत्व केवल एक पहचान नहीं बल्कि शक्ति और संवेदना का संगम है। मेरी कोशिश रहती है कि मेरी रचनाएँ हर स्त्री को यह अहसास दिलाएँ कि वह खुद में पूर्ण है और समाज की धुरी भी।

प्रश्न ९. आपकी दृष्टि में साहित्य का समाज सुधार में क्या योगदान है?

उत्तर: साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, बल्कि उसका पथ-प्रदर्शक भी है। एक रचना मनुष्य की सोच बदल सकती है, नई दिशा दे सकती है। यदि साहित्यकार अपनी लेखनी का उपयोग सकारात्मक विचारों के लिए करें तो समाज में निश्चित ही परिवर्तन संभव है।

प्रश्न १०. आगे आप साहित्य की किस दिशा में कार्य करने की योजना रखती हैं?

उत्तर: भविष्य में मैं अपनी एकल ग़ज़ल संग्रह और कविता संग्रह प्रकाशित करना चाहती हूँ। साथ ही, चाहती हूँ अपने प्रयास जारी निरंतर जारी रखना।

सूचना स्रोत





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