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शिक्षा, संस्कार और समाजसेवा का अनूठा उदाहरण हैं निर्मल जी डेढ़ा

भूमिका

निर्मल डेढा जी का जीवन शिक्षा, संस्कार और समाजसेवा का अनूठा संगम है। दिल्ली के चंद्रावल गाँव से आरंभ हुई उनकी जीवन-यात्रा अध्यापन से समाजसेवा तक प्रेरणादायक रही है। लगभग तीन दशकों तक उन्होंने अध्यापिका के रूप में अनगिनत छात्रों को न केवल अंग्रेजी भाषा सिखाई, बल्कि जीवन मूल्यों का पाठ भी पढ़ाया। उनके परिवार की उपलब्धियाँ, विशेषकर पुत्रों का नौसेना में उच्च पदों पर पहुँचना और बेटियों को समान अवसर देना, यह दर्शाता है कि उन्होंने घर और समाज दोनों में समान रूप से संतुलन और आदर्श स्थापित किया। दहेज जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ खड़ा होना और विभिन्न समितियों में सक्रिय रहना उनके दृढ़ संकल्प को उजागर करता है। प्रस्तुत साक्षात्कार में निर्मल जी के अनुभव, विचार और संकल्प नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

साक्षात्कार

साक्षात्कारकर्ता: सबसे पहले आपका स्वागत है निर्मल जी। आप अपने प्रारंभिक जीवन और शिक्षा के बारे में हमें बताइए।

निर्मल डेढा: धन्यवाद। मेरा जन्म दिल्ली के चंद्रावल गाँव में हुआ। मेरे पिता वेटरनरी सर्जन थे , भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस में डिप्टी कमांडेंट के पद पर तैनात रहे इसलिए मेरा बचपन और प्रारंभिक शिक्षा हिमाचल प्रदेश के विभिन्न शहरों में हुई।

 स्कूली जीवन से ही मेरी गहरी रुचि पढ़ाई के साथ-साथ सांस्कृतिक और खेल गतिविधियों में रही। जिसके लिए मुझे अनेकों पुरस्कार मिलते रहे परन्तु 

*शंकर इंटरनेशनल पेंटिंग प्रतियोगिता में सिल्वर मेडल* *एशियाड 82 में मेरा चयन* और 

*कॉम्पिटिशन सक्सेस रिव्यू पत्रिका द्वारा आयोजित अराउन्ड द वर्ल्ड प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान* प्राप्त करने का अवसर मेरे लिए अविस्मरणीय उपलब्धियाँ रहीं।

साक्षात्कारकर्ता: आपने विविधतापूर्ण शैक्षणिक योग्यता अर्जित की, तो इसका प्रेरणास्रोत क्या रहा और शिक्षा कहाँ से अर्जित की?

निर्मल डेढा: मेरे सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत मेरे दादा जी चौधरी हुकुम सिंह जी रहे जो 1920 में अपना पैतृक गांव बिछपड़ी, जिला बागपत छोड़ कर सिर्फ इसलिए आए कि वे अपने बच्चों को शिक्षित कर सकें। उन्होंने अपने पांच बेटे पढ़ा लिखा कर उच्च पदों पर स्थापित किए। उल्लेखनीय है कि मेरे बड़े ताऊ जी नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी में, दूसरे नम्बर के ताऊ जी भिलाई स्टील प्लांट में, तीसरे नंबर के ताऊ जी दिल्ली यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में, फिर मेरे पिता श्री आई टी बी पी में और छोटे चाचा जी श्री राम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से ऑनर्स कर अपने व्यवसाय में लगे।

उनका मानना था कि शिक्षा जीवन का सबसे बड़ा हथियार है जो हर मुश्किल से बाहर निकलेगा और इसे कोई छीन नहीं सकता। इसी की बदौलत आज मेरे परिवार के अधिकांश सदस्य उच्च पदों पर सुशोभित हैं।

मैंने दौलत राम कॉलेज से स्नातक और हिमाचल विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर किया। साथ ही कुकिंग, केटरिंग एवं होम मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया NTT और B.Ed जैसी डिग्रियाँ भी लीं।

इन सभी का उद्देश्य हर स्तर पर अपने आप को भविष्य के लिए उपयोगी बनाना रहा।

साक्षात्कारकर्ता: आपने लगभग तीस वर्षों तक अध्यापन किया। उस अनुभव को कैसे देखती हैं?

निर्मल डेढा: अध्यापन मेरे जीवन का सबसे सुनहरा अध्याय है। मैंने दिल्ली के प्रतिष्ठित पब्लिक स्कूलों जैसे लाहौर मोंटेसरी, डीएवी, मानवस्थली और गुरु हरिकृष्ण पब्लिक स्कूल में अंग्रेजी अध्यापिका के रूप में कार्य किया। बच्चों को पढ़ाना, उनके भीतर आत्मविश्वास जगाना और उन्हें संस्कार देना – यही मेरी सबसे बड़ी पूँजी रही।

साक्षात्कारकर्ता: 2019 में आपने स्वैच्छिक अवकाश लेकर समाजसेवा का रुख किया। यह बदलाव क्यों?

निर्मल डेढा: 2019 में मेरे पतिदेव श्री वीर सिंह जी रिटायर हुए तब तक तीनों बच्चे भी सामाजिक और व्यावसायिक रूप से समर्थ हो चुके थे तो मुझे लगा कि अब मेरे अनुभव और समय का उपयोग समाज की जड़ों तक पहुँचा कर करना चाहिए। 

शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ काम करना आवश्यक था। इसलिए मैंने दहेज निवारण समिति, गुर्जर एजुकेशन वेलफेयर समिति, गुर्जर आर्ट एंड कल्चर ट्रस्ट और एंपावर्ड गुजरिया जैसे मंचों से जुड़कर सक्रिय योगदान देना शुरू किया।

साक्षात्कारकर्ता: आपके परिवार की उपलब्धियाँ भी प्रेरणादायक हैं। इसके पीछे कौन-से संस्कार प्रमुख रहे?

निर्मल डेढा: संस्कार ही वह नींव हैं जिस पर परिवार टिकता है। मेरी बड़ी बेटी शिक्षिका है, दामाद होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई करके अपना व्यवसाय चला रहे हैं। मेरा बड़ा बेटा भारतीय नौसेना में कमांडर है और बहू नेवी स्कूल में शिक्षिका है। छोटा बेटा भी नौसेना में लेफ्टिनेंट कमांडर है और उसकी पत्नी सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। 

सबसे बड़ी संतोष की बात यह है कि हमने दोनों बेटों का विवाह बिना दहेज केवल ₹101/- की रस्म अदायगी से किया। यह संदेश समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है कि विवाह जीवन का एक प्रमुख संस्कार है यह सौदेबाजी का मौका नहीं हैं।

साक्षात्कारकर्ता: वर्तमान में आपकी प्राथमिकताएँ और लक्ष्य क्या हैं?

निर्मल डेढा: मेरी प्राथमिकता यही है कि समाज से दहेज जैसी बुराई दूर हो, बेटियों की शिक्षा को प्राथमिकता मिले और गुर्जर समाज की नई पीढ़ी अपनी क्षमताओं को पहचान कर देश के लिए गौरव का कारण बने। मैं चाहती हूँ कि महिलाओं को आत्मनिर्भर, सक्षम और आत्मविश्वासी बनाने में अपना योगदान दे सकूँ।

साक्षात्कारकर्ता: अंत में युवा पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहेंगी?

निर्मल डेढा: युवाओं से मेरा कहना है – शिक्षा को ही अपनी सबसे बड़ी पूँजी मानें। 

जीवन में अपने जीवन मूल्यों से कभी समझौता न करें। मेहनत और ईमानदारी से सफलता एक दिन जरूर मिलेगी। 

साथ ही समाज और देश का ऋण चुकाने के लिए कुछ सार्थक करना ही जीवन का असली उद्देश्य है।

👉 यह साक्षात्कार शैली का आलेख निर्मल जी के कौशल, मूल्यों और समाजसेवा को स्पष्ट रूप से सामने लाता है।

सूचना स्रोत

शब्दशिल्प

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




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