सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

✍️ विशेष साक्षात्कार : डॉ. नीलम से प्रेरणादायी संवाद

भूमिका

यह साक्षात्कार डॉ. नीलम जी के प्रेरणादायी व्यक्तित्व की झलक प्रस्तुत करता है, जहाँ शिक्षा, साहित्य और समाजसेवा तीनों का सुंदर संगम दिखाई देता है। शिक्षा-विभाग से सेवानिवृत्ति के पश्चात भी उनका जीवन सतत सक्रियता और सृजनशीलता से परिपूर्ण है। "नीलाक्षर" काव्य-संग्रह से लेकर विभिन्न संकलनों में उनकी रचनात्मक अभिव्यक्ति समाज और संवेदनाओं को गहराई से छूती है। भारत विकास परिषद एवं हिंद सेवा दल के माध्यम से मातृशक्ति सम्मान, सामूहिक विवाह, निर्धनों की सेवा और शहीदों की स्मृति में कार्य उनके सामाजिक सरोकार को जीवंत करते हैं। अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित डॉ. नीलम जी का जीवन इस तथ्य का उदाहरण है कि ज्ञान, संवेदना और सेवा जब एक साथ आगे बढ़ते हैं तो समाज में आशा और प्रेरणा के दीप जलते हैं।

✍️ विशेष साक्षात्कार : डॉ. नीलम से प्रेरणादायी संवाद

प्रश्न १. डॉ. नीलम जी, सबसे पहले हम आपके जीवन के सफर के बारे में जानना चाहेंगे। शिक्षा-विभाग से सेवानिवृत्ति तक की यह यात्रा आपके लिए कैसी रही?

उत्तर: "शिक्षा विभाग में बिताए गए वर्ष मेरे लिए केवल नौकरी का समय नहीं था, बल्कि बच्चों और युवाओं को सही दिशा देने का अवसर था। शिक्षक का कार्य केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह जीवन-मूल्यों को भी संचारित करता है। सेवानिवृत्ति मेरे लिए अंत नहीं बल्कि एक नई शुरुआत रही, जिसने मुझे साहित्य और समाजसेवा की ओर और गहराई से बढ़ने का अवसर दिया।"

प्रश्न २. आपकी साहित्यिक यात्रा "नीलाक्षर" काव्य संग्रह से लेकर विभिन्न काव्य संकलनों तक पहुँची है। साहित्य आपके जीवन में क्या स्थान रखता है?

उत्तर: "साहित्य मेरे लिए आत्मा की अभिव्यक्ति है। "नीलाक्षर" मेरा एकल काव्य-संग्रह है जिसमें मेरी भावनाएँ और विचार आत्मसात हैं। मैंने छंदमुक्त कविता, हाइकु, माहिया, मुक्तक, दोहा और वर्ण पिरामिड जैसी विभिन्न विधाओं में लिखा है। साहित्य मेरे लिए केवल शौक नहीं, बल्कि समाज और समय के साथ संवाद करने का माध्यम है।"

प्रश्न 3. आपको फेसबुक, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय व्हाट्सएप समूहों और काव्य मंचों से अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। इन सम्मान का आपके जीवन में क्या महत्व है?

उत्तर: "सम्मान निश्चित रूप से उत्साहवर्धन करते हैं, लेकिन असली संतोष तब मिलता है जब मेरी रचनाएँ किसी के हृदय को स्पर्श करती हैं। पुरस्कार मुझे और अधिक जिम्मेदारी का एहसास कराते हैं कि मेरी कलम समाज के लिए सार्थक लेखन करे।"

प्रश्न ४. समाजसेवा आपके जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष है। आपने भारत विकास परिषद के अध्यक्ष पद का दायित्व निभाया। इस अनुभव को आप कैसे देखती हैं?

उत्तर: "यह मेरे लिए अत्यंत गर्व और जिम्मेदारी का समय रहा। समाजसेवा केवल दान या आयोजन तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह लोगों के साथ भावनात्मक जुड़ाव है। भारत विकास परिषद के माध्यम से अनेक सामाजिक कार्य हुए – गरीबों तक वस्त्र पहुँचाना, बच्चों को आवश्यक शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराना और सामूहिक विवाह जैसे कार्य करना। इससे मुझे जीवन का असली अर्थ समझने को मिला।"

प्रश्न ५. आप हिंद सेवा दल से भी जुड़ी रही हैं। मातृशक्ति एवं महिलाओं के सम्मान कार्यक्रमों और सामूहिक विवाहों के आयोजन की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

उत्तर: "मैंने हमेशा देखा कि समाज में महिलाओं और निर्धन वर्ग की समस्याएँ सबसे अधिक होती हैं। सामूहिक विवाह न केवल आर्थिक बोझ को कम करते हैं, बल्कि यह सामाजिक समरसता का भी प्रतीक हैं, जहाँ धर्म और जाति की दीवारें टूटती हैं। यह कार्य मेरे लिए सेवा से अधिक साधना का रूप है।"

प्रश्न ६. राष्ट्रनायकों और शहीदों की स्मृति को जीवंत रखने के लिए आपने विशेष पहल की है। इस प्रेरणा के पीछे क्या भाव रहा?

उत्तर: "मैं मानती हूँ कि सुभाषचन्द्र बोस, विवेकानंद, बापू, शास्त्री जी, तिलक और हमारे वीर शहीद केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज भी हमारी चेतना के मार्गदर्शक हैं। कारगिल के शहीदों की स्मृति में वस्त्र-वितरण और जरूरतमंदों की सेवा करना मेरे लिए श्रद्धांजलि देने का एक साधन है। यह राष्ट्रप्रेम को जीवंत रखने का मेरा छोटा-सा प्रयास है।"

प्रश्न ७. आपकी प्रमुख अभिरुचियाँ पठन, पाठन और लेखन रही हैं। लेखन आपके लिए आत्मानुभूति है या सामाजिक जिम्मेदारी?

उत्तर: "यह दोनों का संगम है। जब मैं लिखती हूँ तो मन का बोझ हल्का होता है, यह आत्मानुभूति है। लेकिन जब वही रचनाएँ समाज तक पहुँचती हैं और उनके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भरती हैं, तो यह सामाजिक जिम्मेदारी का रूप ले लेती है।"

प्रश्न ८. भविष्य के लिए आपके साहित्य और समाजसेवा से जुड़े क्या संकल्प हैं?

उत्तर: "मेरा संकल्प यही है कि मैं अपनी कलम और कर्म से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाऊँ। मैं चाहती हूँ कि युवा पीढ़ी भी साहित्य और सेवा दोनों में रुचि ले। यदि मेरी रचनाएँ और कार्य किसी एक व्यक्ति का जीवन बेहतर बना सकें, तो मैं अपने जीवन को सार्थक मानूँगी।"

प्रश्न ९. अंत में, जिज्ञासु डॉ. नीलम जी, आप आज की पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर: मेरा संदेश यही है – "ज्ञान को आत्मसात कीजिए, संवेदनाओं को जीवित रखिए और सेवा को जीवन का आधार बनाइए।" यही तीन बातें जीवन को सच्चे अर्थों में सफल और सार्थक बनाती हैं।

👉 यह साक्षात्कार एक प्रेरक जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करता है जहाँ शिक्षा, साहित्य और समाजसेवा तीनों मिलकर डॉ. नीलम जी को एक आदर्श व्यक्तित्व के रूप में सामने लाते हैं।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...