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समर्पण, संघर्ष और संवेदना का प्रतीक हैं उषा जी

भूमिका 

साहित्य जगत में उषा त्रिपाठी जी का नाम समर्पण, संघर्ष और संवेदना का प्रतीक है। हिन्दी साहित्य में प्रावीण्य के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवाएँ देते हुए उन्होंने न केवल विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया बल्कि साहित्य को भी समृद्ध किया। कविताओं, लघुकथाओं और विविध रचनाओं के माध्यम से उनकी कलम ने स्त्री-पुरुष समानता, मातृभाषा गौरव, देशभक्ति और मानवीय मूल्यों को आवाज़ दी है। अनेक मंचों, समाचार पत्रों और संकलनों में प्रकाशित होकर उनकी रचनाएँ पाठकों के हृदय को स्पर्श करती रही हैं। सम्मान और पुरस्कार उनके लेखन की गुणवत्ता का प्रमाण हैं, पर उनकी असली पहचान है – "सृजनशीलता का सतत प्रवाह"। 

प्रस्तुत है उनसे लिया गया एक प्रेरणादायी साक्षात्कार।

प्रेरणादायी साक्षात्कार : उषा त्रिपाठी

प्रश्न १. उषा जी, सबसे पहले आपसे जानना चाहेंगे कि हिन्दी साहित्य में आपकी रुचि कैसे जागी?

उत्तर : "बचपन से ही हिन्दी भाषा के प्रति एक गहरा लगाव रहा। किताबों से मेरा आत्मीय रिश्ता था। यही लगाव धीरे-धीरे साहित्य साधना में बदल गया और मैंने हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। जब महाविद्यालय में सर्वाधिक अंक प्राप्त कर सम्मानित हुई तो यह मेरे लिए एक आशीर्वाद जैसा था जिसने आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया।"

प्रश्न २. शिक्षा के क्षेत्र में प्रधानाचार्या के रूप में आपने लंबा समय दिया। यह अनुभव आपके साहित्य में कैसे परिलक्षित हुआ?

उत्तर : "शिक्षा क्षेत्र ने मुझे मानवीय जीवन की बारीकियों से अवगत कराया। विद्यार्थियों के प्रश्न, उनकी जिज्ञासाएँ और संघर्षों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। यही अनुभव मेरी कविताओं और लघुकथाओं में जीवन के विविध रंगों के रूप में उतरते गए।"

प्रश्न ३. आपकी कई रचनाएँ दैनिक भास्कर और अन्य संकलनों में प्रकाशित हुई हैं। आपको पहली बार अपनी रचना प्रकाशित देखकर कैसा लगा?

उत्तर : "सच कहूँ तो वह क्षण अविस्मरणीय था। जब अपनी कविता छपी हुई देखी, तो लगा जैसे मेरी भावनाओं को भी एक नया जीवन मिल गया है। उस पल ने विश्वास जगाया कि लिखी गई पंक्तियाँ सिर्फ कागज़ पर शब्द नहीं, बल्कि पाठकों के दिलों तक पहुँच सकती हैं।"

प्रश्न ४. आपने मातृभाषा, महिला समानता और हिन्दी गौरव जैसे विषयों पर सम्मान प्राप्त किए। आपके लिए इन सम्मान का क्या महत्व है?

उत्तर : "सम्मान निश्चित ही प्रेरणा देते हैं, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है जब पाठक मेरी रचनाओं को पढ़कर जुड़ाव महसूस करते हैं। मातृभाषा और महिला समानता जैसे विषय मेरी आत्मा से जुड़े हुए हैं, इन पर लिखना मेरे लिए कर्तव्य है।"

प्रश्न ५. "चन्द्रयान" और "कागज़ की कश्ती" जैसी रचनाओं के लिए भी आपको सम्मान मिला। विज्ञान और बालसुलभ कल्पनाओं का यह मिश्रण कैसे बना?

उत्तर : "साहित्य का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि यह हर विषय को छू सकता है। "चन्द्रयान" लिखते समय मेरे मन में देश की वैज्ञानिक उपलब्धि की गर्व भावना थी। वहीं "कागज़ की कश्ती" ने बचपन की मासूमियत को अभिव्यक्त किया। ये दोनों ही मेरे दिल के बहुत करीब हैं।"

प्रश्न ६. आज के समय में जब युवा पीढ़ी हिन्दी से दूर जाती दिखती है, आप उन्हें क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर : "मैं कहूँगी कि अपनी मातृभाषा से जुड़ना कोई बंधन नहीं, बल्कि गौरव है। हिन्दी में अभिव्यक्ति की सहजता है। युवा यदि अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे तो उनकी पहचान और भी मजबूत होगी। अंग्रेज़ी सीखना आवश्यक है, लेकिन हिन्दी को न भूलना हमारी ज़िम्मेदारी है।"

प्रश्न ७. आपकी लेखनी का मुख्य उद्देश्य क्या है?

उत्तर : "मेरा उद्देश्य है समाज में संवेदनाओं को जीवित रखना। चाहे कविता हो या लघुकथा, मैं चाहती हूँ कि पाठक पढ़कर अपने भीतर मानवीय मूल्यों को महसूस करें और साहित्य उनके जीवन को दिशा दे।"

प्रश्न ८. आप सेवानिवृत्त प्रधानाचार्या होने के बावजूद निरंतर लिख रही हैं। यह ऊर्जा आपको कहाँ से मिलती है?

उत्तर : "लेखन मेरे लिए साधना है। यह आत्मा को सुकून देता है और मुझे लगता है कि जब तक साँसें हैं, कलम चलती रहनी चाहिए। यही ऊर्जा मुझे प्रतिदिन नये शब्द गढ़ने के लिए प्रेरित करती है।"

प्रश्न ९. आपके अनुसार एक अच्छे साहित्यकार के लिए सबसे आवश्यक गुण क्या होना चाहिए?

उत्तर : "सबसे पहले संवेदनशीलता। अगर मन में करुणा, प्रेम और जीवन के प्रति गहरी समझ नहीं होगी, तो शब्द खोखले रह जाएँगे। साहित्यकार को समाज का दर्पण भी होना चाहिए और मार्गदर्शक भी।"

प्रश्न १०. अंत में, आप अपने पाठकों और साहित्य प्रेमियों को क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर : "मैं यही कहना चाहूँगी कि साहित्य को अपने जीवन का हिस्सा बनाइए। यह न केवल आत्मा को समृद्ध करता है, बल्कि समाज में सकारात्मकता भी फैलाता है। पढ़ें, लिखें और अपनी मातृभाषा हिन्दी पर गर्व करें, क्योंकि यही हमारी पहचान है।"

उषा जी की रचना

छोडा़ हमने राम को कितना -

जीतने की चाह में, जीवन की राह में, 

आगे बढ़ गए हम इतना, 

छोडा़ हमने राम को कितना, 

जीवन में अब आराम कहाँ है, बेटे में अब राम कहाँ है, 

राम सा सेवा भाव नहीं है, 

कलियुग में पुरूषोत्तम राम नहीं हैं, 

हर पल टूटती मर्यादा, पूछे बस इतना, 

छोडा़ हमने राम को कितना, 

सीना चीर तो राम नही हैं, 

हर पल दौड़ती दुनिया की पहचान यही है, 

नकाबों में मिलते हैं, अब अक्स हमारे, 

जयचंदो की बस्ती में, ढूंढते हैं राम हमारे, 

देखो अब रावण भी मुस्कुरा रहा इतना, 

करते हैं हिसाब, छोडा़ हमने राम को कितना, 

जिन्दगी के गणित में, हमने अपने, पराये किए हैं, 

इस घोर कलयुग में, हमने भी कुछ पाप किए हैं, 

अब पूछे पालनहार से इतना, 

छोडा़ हमने राम को कितना, 

अब जब मन समझता है इतना तो -

मिटा कर शूल राहों के, जीवन की राह बनाते हैं, 

चलो राम की राहों के, 

फिर मुसाफिर बन जाते हैं, 

करते हैं उजाला इतना, कि अंधेरा पूछे बस इतना, 

पाया हमने राम को कितना.

उषा जी की प्रतिक्रिया

उलझन सुलझन जैसे प्रतिष्ठित मंच पर बहुमुखी प्रतिभा की धनी डाक्टर छाया शर्मा द्वारा मेरा साक्षात्कार लिया जाना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। निश्चित ही यह मंच हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार के साथ ही साहित्यकारों के साक्षात्कार के द्वारा नवोदित साहित्यकारों को प्रोत्साहित कर के, हिन्दी साहित्य को महती भूमिका प्रदान कर के राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का अवसर प्रदान कर रहा है। साधुवाद 💐

उषा त्रिपाठी

सूचना स्रोत


पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




टिप्पणियाँ

  1. ऊषा जी न सिर्फ लेखिका और साहित्यकार है वरन वह एक सरल सहज और सुलझे हुए व्यक्तित्व की मालकिन भी हैं। उनकी लेखनी को भी साधुवाद।

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