डॉ. अश्विनी कुमार की शैक्षणिक एवं व्यावसायिक यात्रा अपने आप में एक प्रेरणादायी गाथा है। ग्रामीण परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक और शिक्षाविद् के रूप में प्रतिष्ठित होना उनकी प्रतिभा, मेहनत और दृढ़ संकल्प का परिचायक है। सहारनपुर के छोटे से गाँव सालियर से आरंभ हुई यह यात्रा चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से भौतिकी में एम.एससी. प्राप्त करने के बाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की तक पहुँची, जहाँ उन्होंने नैनो प्रौद्योगिकी में एम.टेक और भौतिकी में पीएच.डी. की उपाधियाँ अर्जित कर अपने शोध कौशल को नई ऊँचाइयाँ दीं।
इसके उपरांत उन्होंने वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) में वैज्ञानिक के रूप में कार्य करते हुए ऊर्जा अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। इस दौरान उन्होंने न केवल प्रयोगशाला आधारित शोध को आगे बढ़ाया, बल्कि वैज्ञानिक खोजों को सामाजिक और औद्योगिक उपयोगिता से जोड़ने का भी प्रयास किया।
वर्तमान में डॉ. कुमार राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के अंतर्गत क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भुवनेश्वर में सहायक प्राध्यापक (भौतिकी) के रूप में कार्यरत हैं। यहाँ उनकी भूमिका केवल एक अध्यापक की नहीं, बल्कि एक विज्ञान दूत की है, जो विद्यार्थियों में प्रयोगधर्मिता, जिज्ञासा और शोध की भावना को प्रोत्साहित कर रहे हैं। उनका प्रयास है कि विज्ञान शिक्षा पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर अधिक सजीव, उपयोगी और जीवनमूलक बने।
नैनो प्रौद्योगिकी, ऊर्जा विज्ञान और भौतिकी के क्षेत्र में उनके कार्यों ने उन्हें न केवल अकादमिक जगत में विशिष्ट पहचान दिलाई है, बल्कि वे आज उन वैज्ञानिकों में शुमार हैं जो विज्ञान और शिक्षा दोनों को साथ लेकर चलने का दृष्टिकोण रखते हैं। ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकले इस वैज्ञानिक की उपलब्धियाँ इस तथ्य का प्रमाण हैं कि संकल्प और परिश्रम के बल पर कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी विज्ञान एवं शिक्षा की नई दिशा स्थापित कर सकता है।
साक्षात्कार
प्रश्न १. डॉ. कुमार, सबसे पहले हम आपके जीवन की शुरुआत और शिक्षा के बारे में जानना चाहेंगे।
उत्तर: "मेरा जन्म और प्रारंभिक जीवन उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के सालियार गाँव में हुआ। ग्रामीण परिवेश से निकलकर उच्च शिक्षा की ओर बढ़ना मेरे लिए चुनौतीपूर्ण किंतु प्रेरणादायी रहा। यह मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण संदेश है कि कठिन परिस्थितियाँ कभी बाधा नहीं बनतीं, यदि आपके भीतर आगे बढ़ने का जुनून और सीखने की प्यास हो। मैंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU) से भौतिकी में एम.एससी. प्राप्त करने के बाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), रुड़की से नैनोप्रौद्योगिकी में एम.टेक तथा भौतिकी में पीएच.डी. की उपाधियाँ अर्जित कीं। यह मेरे जीवन का एक ऐसा दौर था, जिसने विज्ञान और अनुसंधान के प्रति मेरी दृष्टि को गहराई दी और मुझे भविष्य की राह दिखलाई।"
प्रश्न २. आपकी अनुसंधान यात्रा का आरंभ किस प्रकार हुआ और आपने किन विषयों पर विशेष कार्य किया?
उत्तर: "मेरी अनुसंधान यात्रा ऊर्जा विज्ञान और नैनोप्रौद्योगिकी के क्षेत्र से शुरू हुई। यह अनुसंधान यात्रा मेरी डॉ. बीरपाल, जो CCSU में भौतिकी में प्रोफेसर हैं, उनके ज्ञान से प्रेरित होकर आरंभ हुई। मैंने ऊर्जा अनुसंधान से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स पर कार्य किया, जिनका उद्देश्य स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा के नए स्रोतों को तलाशना था। इसके बाद भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) में मेरे गाइड डॉ. रमेश चंद्र ने मुझे नई ऊर्जा देने का मार्गदर्शन किया। नैनोप्रौद्योगिकी, जो ऊर्जा सेंसर और अन्य क्षेत्रों में काम करने का नया और उभरता हुआ क्षेत्र है, ने मुझे यह समझने में मदद की कि कैसे सूक्ष्म स्तर पर की गई खोजें समाज की बड़ी समस्याओं के समाधान प्रस्तुत कर सकती हैं।"
प्रश्न ३. आपने वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) में भी कार्य किया। वहाँ का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर: "सीएसआईआर में वैज्ञानिक के रूप में कार्य करना मेरे करियर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। वहाँ मुझे देश के श्रेष्ठ वैज्ञानिकों के साथ काम करने और विभिन्न शोध परियोजनाओं में भाग लेने का अवसर मिला। इस अनुभव ने मुझे शोध की व्यावहारिक दिशा और औद्योगिक उपयोगिता दोनों से परिचित कराया। यहाँ मुझे अच्छे शोधकर्ताओं से मार्गदर्शन मिला कि उच्च-प्रभाव वाले जर्नल्स में रिसर्च पेपर कैसे प्रकाशित किए जाते हैं और पीएच.डी. छात्रों को शोध कार्य के साथ गाइड कैसे किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप आज कुछ छात्र अन्य देशों में नैनो प्रौद्योगिकी पर कार्य कर रहे हैं और महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।"
प्रश्न ४. वर्तमान में आप शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत हैं। यह यात्रा किस प्रकार आरंभ हुई?
उत्तर: "शोध कार्य के दौरान मैंने महसूस किया कि यदि विज्ञान को जमीनी स्तर पर समाज तक पहुँचाना है तो शिक्षा उसकी सबसे बड़ी कुंजी है। मुझे यह एहसास हुआ कि जब तक आपका ज्ञान और शोध बच्चों के काम और उनके अकादमिक डेस्क पर नहीं आएगा, तब तक आपके शोध का कोई वास्तविक मतलब नहीं है। इसी सोच के साथ मैं राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) से जुड़ा और वर्तमान में भुवनेश्वर स्थित क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान में सहायक प्राध्यापक (भौतिकी) के पद पर कार्यरत हूँ। मैंने देखा कि आज हमारे आसपास के हर क्षेत्र में नैनोप्रौद्योगिकी का उपयोग हो रहा है, इसलिए बच्चों के दिमाग में बचपन से ही यह स्पष्ट हो कि यह क्षेत्र क्या है और बड़े होने पर इसे और जानने की उत्सुकता पैदा हो। मुझे लगा कि NCERT जैसा प्लेटफ़ॉर्म भारत को कोने-कोने तक जोड़ने और विज्ञान शिक्षा को प्रभावी बनाने के लिए सबसे उपयुक्त है। यहाँ मेरा प्रयास है कि विज्ञान शिक्षा को अधिक सरल, प्रयोगधर्मी और प्रेरणादायी बनाया जा सके।"
प्रश्न ५. आप विज्ञान शिक्षा को नई दिशा देने की बात करते हैं। इस दिशा में आपके क्या प्रयास रहे हैं?
उत्तर: "मेरा मानना है कि विज्ञान केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे जीवन और समाज से जोड़ना चाहिए। मैंने भौतिकी, ऊर्जा विज्ञान और नैनोप्रौद्योगिकी को शिक्षा में शामिल करने के लिए नवीन शिक्षण विधियाँ विकसित की हैं। मेरा उद्देश्य विद्यार्थियों को शोध के प्रति उत्सुक करना और उन्हें समस्या-समाधान की दृष्टि से तैयार करना है। मेरे प्रयास इस दिशा में हैं कि जैसा नई शिक्षा नीति (New Education Policy) 2020 बताती है, बच्चों को अनुभवात्मक (experiential) शिक्षण के माध्यम से सीखने का अवसर मिले। मेरा प्रयास है कि अपने शोध क्षेत्र और वास्तविक विज्ञान को शिक्षा में जोड़कर विद्यार्थियों के सीखने के अनुभव को और अधिक प्रभावी बनाया जाए।"
प्रश्न ६. आपके अनुसार भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का भविष्य किस दिशा में बढ़ रहा है?
उत्तर: "भारत में अपार संभावनाएँ हैं। विशेषकर ऊर्जा विज्ञान, नैनो प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में युवा शोधकर्ताओं को अवसर देने की आवश्यकता है। जैसा कि हम जानते हैं, विकसित भारत 2047 में इन क्षेत्रों का महत्वपूर्ण योगदान होगा। यदि हम शिक्षा और अनुसंधान को एकीकृत कर पाएँ, तो आने वाले समय में भारत वैश्विक स्तर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी का नेतृत्व कर सकता है। यह क्षेत्र विज्ञान के भविष्य को अच्छी दिशा की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाएगा और युवाओं को नई खोज और नवाचार की ओर प्रेरित करेगा।"
प्रश्न ७. अंत में, आप देश के युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर: "मैं युवाओं से यही कहना चाहूँगा कि वे अपनी जिज्ञासा को कभी समाप्त न होने दें। प्रश्न पूछें, प्रयोग करें और असफलताओं से सीखें। यह याद रखें कि जीवन में कभी भी हार मानना उचित नहीं है। विज्ञान केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है; यह हमारे सोचने और जीवन जीने के तरीके को बदलने की क्षमता रखता है। यदि युवा पीढ़ी इस भावना से आगे बढ़ेगी तो भारत निश्चित ही वैज्ञानिक दृष्टि से आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगा।"
सूचना स्रोत

.png)



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें