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सुनीत भाटी जी का आत्मकथ्य

भूमिका

शिक्षा किसी भी समाज की सबसे महत्वपूर्ण नींव है। खेतिहर समाज, जो परंपराओं और मेहनतकश जीवन का परिचायक रहा है, आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ नई पीढ़ी को केवल खेती तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं। विज्ञान, तकनीक, सेवा और प्रशासन जैसे क्षेत्र भी उतने ही आवश्यक हैं, जिनमें हमारा समाज अपनी पहचान बना सकता है।

इस भूमिका में तीन पहलू आपस में जुड़े हुए हैं—

  • अभिभावक, जो बच्चों को अवसर और प्रेरणा प्रदान करते हैं।

  • विद्यार्थी, जिनमें क्षमता और परिश्रम की शक्ति छिपी होती है।

  • समाज और मिशन, जो मार्गदर्शन और दिशा प्रदान करते हैं।

बालिका कशिश की सफलता इसका जीता-जागता उदाहरण है। उसने यह दिखा दिया कि छोटे शहरों और खेतिहर परिवेश से निकले विद्यार्थी भी उच्चतम शिखरों को छू सकते हैं, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन, अवसर और प्रोत्साहन मिले।

इसलिए यह आवश्यक है कि—

  • अभिभावक बेटियों को भी वही अवसर दें जो बेटों को मिलते हैं।

  • विद्यार्थी अपनी मेहनत और अनुशासन को खेती के बीज की तरह बोएँ, जो समय पर अंकुरित होकर सफलताओं की फसल बनता है।

  • समाज, परिवार और शैक्षिक संस्थान मिलकर ऐसा वातावरण बनाएँ जिसमें हर बच्चा अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ सके।

जनचेतना मिशन का उद्देश्य यही है कि समाज के सभी वर्ग इस शिक्षा-यात्रा को समझें और इसमें सक्रिय भागीदार बनें। जब खेत की मिट्टी मेहनत से सुनहरा सोना उगल सकती है, तो उसी समाज के बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में भी नए कीर्तिमान रच सकते हैं।

सुनीत भाटी जी का आत्मकथ्य

(खेतिहर समाज की उन्नति की राह और बालिका कशिश की सफलता की गाथा)

"मैं, सुनित भाटी, आज जब बालिका कशिश की सफलता को देखता हूँ तो लगता है कि खेतिहर समाज की वास्तविक उन्नति यहीं से शुरू होती है। कृषि से जुड़े लोग अक्सर यह सोचते रहे हैं कि पढ़ाई-लिखाई और प्रतियोगी परीक्षाएँ बड़े शहरों या सम्पन्न वर्ग के बच्चों के लिए ही होती हैं लेकिन आज कशिश ने शीर्ष स्थान प्राप्त कर मेरी इस सोच को बदल दिया है।

कशिश ने अपनी शिक्षा की शुरुआत यहीं मेरठ की धरती से की। उसने मेहनत, लगन और अनुशासन के बल पर विद्यालय और विश्वविद्यालय दोनों स्तरों पर श्रेष्ठ प्रदर्शन किया। वह न केवल अपनी कक्षा की टॉपर बनी, बल्कि दिल्ली विश्वविद्यालय से सांख्यिकी विषय में गोल्ड मेडल भी उसने अर्जित किया। यही नहीं, उसने UPSC की भारतीय सांख्यिकी सेवा (ISS) परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कर यह सिद्ध किया कि छोटे शहरों से निकली बेटियाँ भी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकती हैं।

खेतिहर समाज का जीवन हमेशा परिश्रम, धैर्य और गणनात्मक समझ पर आधारित रहा है। किसान का हर बीज, हर मौसम, हर फसल उसकी योजनाबद्ध गणना पर टिका होता है। उसी धैर्य और गणना को आज की पीढ़ी को शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनाने की आवश्यकता है। मेरी अपनी पुत्री विदुषी ने यह मार्ग तब दिखाया था जब एक प्रतियोगी परीक्षा की कठिनाइयों-जटिलताओं को उसने नकारात्मक अंकन (Negative Marking) से बचते हुए, शुद्ध गणनात्मक और तार्किक तरीकों का सहारा लेकर पार किया और परीक्षा उपरांत अपने सटीक उत्तरों के अनुसार जो गणना की थी वह परिणाम से मेल खाने पर उसके प्रयासों की पुष्टि भी हुई।

आज यह सफलता केवल कशिश की नहीं है, बल्कि पूरे खेतिहर समाज की है। यह उस सोच की जीत है जिसमें शिक्षा को खेती जितना ही महत्वपूर्ण माना जाए। जिस प्रकार खेत में मेहनत का बीज बोने पर ही फल मिलता है, वैसे ही शिक्षा में निरंतर प्रयास और अनुशासन से ही परिणाम प्राप्त होते हैं।

मुझे गर्व है कि कशिश ने शीर्ष स्थान प्राप्त कर अपनी उपलब्धि से हमें यह अहसास कराया है कि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ केवल खेतों तक सीमित न रहें, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और सेवा के क्षेत्र में भी अपना योगदान दें। यही खेतिहर समाज की वास्तविक उन्नति है।

आज मैं अपने समाज के हर अभिभावक से यही कहना चाहता हूँ कि –

अपने बच्चों, विशेषकर बेटियों को अवसर अवश्य दें। उन्हें पढ़ाई में आगे बढ़ाएँ। उनकी रुचि और क्षमता को पहचानें। खेतिहर समाज को केवल परंपरा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि शिक्षा और प्रतियोगिता के नए रास्तों पर भी कदम बढ़ाने चाहिए।

खेतिहर समाज की बच्ची कशिश ने यह साबित किया है कि –

‘अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और प्रयास निरंतर, तो कोई भी मंज़िल कठिन नहीं।’

और यही खेतिहर समाज को समझने और करने की आज सबसे बड़ी आवश्यकता है।"

प्रेषक

 

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