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साक्षात्कार – श्रीमती ज्योति भड़ाना से बातचीत

साक्षात्कार – श्रीमती ज्योति भड़ाना से बातचीत

परिचय

हिंदी दिवस, 14 सितंबर 2025 के अवसर पर एक गर्व का क्षण देखने को मिला। गुर्जर समाज की प्रतिभाशाली शोधार्थी श्रीमती ज्योति भड़ाना को विजय सिंह पथिक के जीवन संघर्ष और किसान आंदोलन पर आधारित उनके उत्कृष्ट शोध कार्य के लिए नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया।

श्रीमती ज्योति भड़ाना ने न केवल शोध के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत का नाम रोशन किया है। बैंकॉक, थाईलैंड में उन्हें Best Oral Presentation Award से नवाजा गया। उनकी कहानियाँ, कविताएँ और शोध पत्र दिल्ली विश्वविद्यालय (DU), हरियाणा विश्वविद्यालय (HU), हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय (HGU) सहित अनेक प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित हो चुके हैं। वे अपने समाज के बलिदानों और योगदान को उजागर करने का सतत प्रयास कर रही हैं।

आइए जानते हैं उनकी प्रेरणाओं, संघर्षों, शोध दृष्टि और भविष्य की योजनाओं के बारे में।


बातचीत

प्रश्न १. आपको नेशनल अवार्ड मिलने पर बहुत-बहुत बधाई! विजय सिंह पथिक और किसान आंदोलन पर शोध करने के लिए यह सम्मान मिलने पर आपको कैसा लग रहा है?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "बहुत-बहुत धन्यवाद। यह मेरे लिए बेहद विनम्र और भावनात्मक क्षण है। विजय सिंह पथिक का जीवन संघर्ष त्याग और सेवा का प्रतीक है। किसानों के अधिकारों और समाज के लिए उनका योगदान प्रेरणादायक है। उनके जीवन पर शोध करना मेरे लिए केवल अकादमिक कार्य नहीं रहा, बल्कि अपने इतिहास से जुड़ने का एक माध्यम बना। यह पुरस्कार मेरा नहीं, बल्कि उन सभी का है जिनकी आवाज़ अब तक सामने नहीं आ पाई।"

प्रश्न २. आपने किसानों की स्वतंत्रता में भूमिका पर शोध का विषय क्यों चुना?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "मैं ऐसे परिवार में पली-बढ़ी जहाँ स्वतंत्रता संग्राम और किसानों के योगदान की कहानियाँ सुनाई जाती थीं। मैंने पाया कि ग्रामीण क्षेत्रों और किसानों का योगदान अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। मैं चाहती थी कि अकादमिक स्तर पर उनके संघर्ष और सहभागिता को सामने लाया जाए। मेरा उद्देश्य यह है कि इतिहास की किताबों में उन्हें उचित स्थान मिले।"

प्रश्न ३. आपके शोध पत्र DU, HU, HGU जैसे विश्वविद्यालयों में प्रकाशित हुए हैं। आप शोध की गंभीरता और कहानी कहने के कौशल में संतुलन कैसे बनाए रखती हैं?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "मेरे लिए शोध और कहानी एक-दूसरे के पूरक हैं। शोध तथ्य, संदर्भ और गहराई देता है, जबकि कहानी उसे भावनात्मक रूप से जोड़ती है। मैं सामग्री को सटीक बनाकर लिखती हूँ, लेकिन साथ ही यह ध्यान रखती हूँ कि पाठक उससे जुड़ सके। स्थानीय लोगों से बातचीत, अभिलेखों का अध्ययन और मौखिक इतिहास से सामग्री लेकर मैं शोध को जीवंत बनाती हूँ।"

प्रश्न ४. आपने कहानियाँ और कविताएँ भी लिखी हैं। क्या ये आपके शोध में मदद करती हैं?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "बिल्कुल। शोध औपचारिक होता है जबकि रचनात्मक लेखन स्वतंत्र और भावनात्मक होता है। कहानियाँ मुझे उन पहलुओं को व्यक्त करने का अवसर देती हैं जिन्हें शोधपत्रों में विस्तार से नहीं बताया जा सकता। कविता मुझे संघर्ष, उम्मीद और मानवीय संवेदनाओं को शब्द देने में मदद करती है। दोनों मिलकर शोध को प्रभावशाली बनाते हैं।"

प्रश्न ५. बैंकॉक जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुति देने का अनुभव कैसा रहा?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "वह अनुभव बहुत प्रेरक रहा। वहाँ जाकर समझ आया कि स्थानीय मुद्दे भी वैश्विक संदर्भ में प्रासंगिक हो सकते हैं। किसानों का संघर्ष, शिक्षा और समुदाय सशक्तिकरण जैसी समस्याएँ दुनिया भर में हैं। वहाँ मुझे यह भी सीखने को मिला कि जटिल विचारों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना कितना जरूरी है।"

प्रश्न ६. आप अपने गुर्जर समाज से बहुत जुड़ी हुई हैं। क्या यह जुड़ाव आपके शोध में मदद करता है?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "मेरा समाज मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत है। हमारे बुजुर्गों ने साहस, आत्मसम्मान और समाज सेवा की मिसालें दी हैं। मैं मानती हूँ कि उनका योगदान इतिहास में दर्ज होना चाहिए। इसलिए मैं उन कहानियों और बलिदानों पर शोध कर रही हूँ ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी उनसे प्रेरणा ले सकें।"

प्रश्न ७. इंटरनेशनल बेस्ट प्रेजेंटेशन जैसे पुरस्कार पाने के लिए कौन-से गुण आवश्यक हैं?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "सबसे महत्वपूर्ण है तैयारी। आपको अपने विषय को पूरी तरह समझना होगा। स्पष्टता और आत्मविश्वास के साथ बोलना आवश्यक है। साथ ही, दर्शकों की प्रतिक्रिया को सुनना और उसके अनुसार प्रस्तुति को अनुकूलित करना भी जरूरी है। तभी प्रभावशाली प्रस्तुति संभव होती है।"

प्रश्न ८. आपने रामप्यारी गुजरी और धनसिंह कोतवाल जैसे पात्रों पर भी कहानियाँ लिखी हैं। आप शोध कैसे करती हैं?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "मैं अभिलेख, स्थानीय इतिहास और मौखिक स्रोतों का अध्ययन करती हूँ। परिवार के बुजुर्गों, इतिहासकारों और समाज के जानकारों से बातचीत कर जानकारी इकट्ठा करती हूँ। फिर इसे प्रमाणित कर लिखती हूँ। साथ ही मैं यह भी ध्यान रखती हूँ कि सामाजिक संदर्भ और परिस्थिति को सही रूप में प्रस्तुत कर सकूँ।"

प्रश्न ९. शोध में निरंतर प्रेरित रहना कठिन होता है। आप खुद को प्रेरित कैसे रखती हैं?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "मैं खुद को याद दिलाती हूँ कि हर कहानी महत्वपूर्ण है। कई लोगों ने इतिहास में योगदान दिया, लेकिन उनका नाम आज भुला दिया गया। उनकी आवाज़ को सामने लाना मेरे लिए उद्देश्य बन गया है। परिवार और समाज का सहयोग भी मेरी ऊर्जा का स्रोत है।"

प्रश्न १०. युवा शोधकर्ताओं और लेखकों को आप क्या सलाह देना चाहेंगी?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "जिज्ञासु बनिए और संवेदनशील भी। सवाल पूछिए, गहराई तक जाइए और कठिन विषयों से डरिए मत। लोगों की कहानियों को सम्मानपूर्वक सुनिए और उन्हें ईमानदारी से दर्ज कीजिए। धैर्य रखिए—अच्छा शोध समय लेता है, लेकिन लगातार प्रयास अंततः सफलता दिलाता है।"

प्रश्न ११. भविष्य की आपकी योजनाएँ क्या हैं?

श्रीमती ज्योति भड़ाना: "मैं अपने शोध का दायरा बढ़ाना चाहती हूँ—ग्रामीण सशक्तिकरण, महिलाओं की भूमिका और शिक्षा सुधार पर काम करना चाहती हूँ। साथ ही मैं उन युवाओं को मार्गदर्शन देना चाहती हूँ जो हाशिए पर रह गए समुदायों की कहानियों को सामने लाना चाहते हैं।"

समापन

श्रीमती ज्योति भड़ाना का कार्य यह दर्शाता है कि शोध, रचनात्मकता और समाज सेवा एक साथ चल सकते हैं। वे न केवल एक विदुषी हैं, बल्कि समाज के इतिहास को आवाज देने वाली एक समर्पित लेखिका भी हैं। उनके विचार और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनेंगे।*

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