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सर्वजन के लिए उपयोगी संस्मरण

भूमिका

संस्मरण केवल बीते पलों का वर्णन नहीं होते, यह अनुभवों की ऐसी अमूल्य धरोहर हैं जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती है। एक व्यक्ति का जीवन जितना निजी होता है, उतना ही सार्वजनीन भी—उसके संघर्ष, उपलब्धियाँ, असफलताएँ और विचार दूसरों के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं। यही कारण है कि संस्मरणों को पढ़ना केवल किसी की कहानी जानना भर नहीं है, बल्कि स्वयं को समझने और जीवन के नए दृष्टिकोण प्राप्त करने की प्रक्रिया है।

डॉ. सूरज सिंह नेगी का यह संस्मरण 'सर्वजन के लिए उपयोगी, हर खासोआम के लिए हितकारी' इसी भावभूमि से उपजा है। 

 
       प्रशासनिक अधिकारी प्रगति के अवसर तैयार करने का काम करते हैं।

इसमें अनुभवों का सार, संवेदनाओं की गहराई और परिस्थितियों का यथार्थ है, जो हर पाठक को कहीं न कहीं अपने जीवन से जुड़ा हुआ महसूस कराएगा। यह संस्मरण न केवल व्यक्तित्व का दर्पण है, बल्कि समाज और समय की भी झलक प्रस्तुत करता है।

पाठक जब इस संस्मरण में डूबेंगे, तो पाएँगे कि यह केवल पढ़ने योग्य नहीं बल्कि आत्मसात करने योग्य है—जो सोचने को विवश करेगा, संवेदना जगाएगा और जीवन के प्रति नई और हितकारी दृष्टि देगा।

सर्वजन के लिए उपयोगी संस्मरण 

हर खासोआम के लिए हितकारी 

डॉ. सूरज सिंह नेगी

राजकीय सेवा में कार्य के दौरान नित नए अनुभव होते हैं। विशेषकर राजस्व प्रशासन में कार्य करते समय जिम्मेदारियों की विविधता और भी बढ़ जाती है। विभागीय लक्ष्यों की प्राप्ति के साथ-साथ क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखना, आमजन के सुख-दुःख में सहभागी बनना और उन्हें सरकार की संवेदनशीलता का अनुभव कराना एक लोकसेवक की महत्वपूर्ण भूमिका बन जाती है।

 
       एक प्रशासनिक अधिकारी का कार्य के दौरान 
                    का व्यस्तता का समय

प्राकृतिक आपदाएँ, दुर्घटनाएँ, सांप्रदायिक झगड़े या फिर किसी अन्य विभाग की कमी या भूल से उत्पन्न आक्रोश—सबसे पहले राजस्व प्रशासन के अधिकारी को ही सामना करना पड़ता है। आरंभ में यह सब कठिन और अखरने वाला प्रतीत होता है, परंतु शीघ्र ही यह अहसास हो जाता है कि यही हमारे चयन का मूल उद्देश्य है। फिर इन सब कार्यों को करते हुए समय कब निकल जाता है, पता ही नहीं चलता।

जब उम्र के एक पड़ाव पर पीछे मुड़कर देखते हैं तो अनगिनत घटनाएँ और अनुभव—कुछ खट्टे, कुछ मीठे—मानसपटल पर जीवंत हो उठते हैं। ये अनुभव हमें उस अतीत में ले जाते हैं जहाँ हमने लोगों के साथ समय बिताया था। वहाँ खून के रिश्ते न सही, परंतु निस्वार्थ संबंध बन जाते हैं, जो जीवनभर यादों में संजोए रहते हैं। उन चेहरों की मुस्कराहट, आँखों का विश्वास और आत्मीयता ही वह ऊर्जा है जो यह एहसास कराती है कि हमारा प्रयास सही दिशा में था। किसी उच्चाधिकारी की प्रशंसा या आंकड़ों से बढ़कर, लोकसेवक के कार्य का वास्तविक मापदंड यही है कि क्या जिन लोगों के लिए हम काम करते हैं, उनके चेहरे पर संतोष और संतुष्टि झलकती है या नहीं। यदि हमारे काम से उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाए तो यही सबसे बड़ी उपलब्धि है।

            समझाने के उपरांत प्राप्त प्रणाम से उल्लसित एक अधिकारी

एक अनुभव – 'प्रशासन गाँव के संग' अभियान

3 अक्टूबर 2004 को मैंने तहसील मालपुरा में कार्यभार ग्रहण किया। उसी समय प्रशासन गाँव के संग अभियान चल रहा था। इस अभियान में प्रत्येक ग्राम पंचायत मुख्यालय पर राजस्व ही नहीं, अन्य विभागों के अधिकारी भी पहुँचकर आमजन की समस्याओं का मौके पर ही समाधान करने का प्रयास करते थे।

इन शिविरों में मैंने अनुभव किया कि जाति और मूल निवास प्रमाण पत्र प्राप्त करने हेतु विद्यालयीन बच्चों की लंबी कतार लग जाती थी। उस समय ये प्रमाण पत्र आज की तरह डिजिटल हस्ताक्षर से जारी नहीं होते थे, बल्कि हस्ताक्षर और मुहर लगाकर ही जारी किए जाते थे। परिणामस्वरूप बच्चे कभी पटवारी, कभी ग्राम विकास अधिकारी, कभी फोटोस्टेट मशीन संचालक या स्टाम्प विक्रेता के पास भागते रहते थे। कई बार पूरा दिन इसी में व्यतीत हो जाता था और आर्थिक बोझ भी बढ़ता था।

इस स्थिति का समाधान निकालने हेतु एक नई कार्यप्रणाली अपनाई गई। सभी विद्यालयों को निर्देशित किया गया कि शिविर दिवस से पूर्व कक्षावार सूची तैयार की जाए, जिसमें विद्यार्थी का नाम, पिता का नाम, कक्षा, जाति और गाँव का विवरण अंकित हो। इस सूची को पटवारी, ग्राम विकास अधिकारी और प्रधानाध्यापक द्वारा प्रमाणित किया जाए। शिविर दिवस पर यह सूची और पहले से भरे हुए प्रमाण पत्र विद्यालय के अध्यापक या स्टाफ द्वारा प्रस्तुत किए जाएँ। शिविर समाप्ति पर सभी प्रमाण पत्रों पर हस्ताक्षर और मुहर लगाकर उसी दिन विद्यालय प्रशासन को लौटा दिए जाएँ।

इस प्रयोग के परिणाम अत्यंत सकारात्मक रहे। बच्चे अब दिन भर धक्के खाने से मुक्त हो गए। अभिभावकों को आर्थिक राहत मिली। उच्चाधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, विद्यालय प्रशासन और सबसे बढ़कर आमजन ने इस पहल की सराहना की। सबसे बड़ी खुशी यह थी कि बच्चों के चेहरे पर संतोष और सहज मुस्कान दिखाई दी। इस पद्धति को मैंने आगे के पदस्थापनों में भी अपनाया और हर जगह परिणाम आशातीत रहे।

निष्कर्ष

दरअसल लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा तभी साकार होती है जब हमारे कार्यों के केंद्र में आमजन की पीड़ा और समस्याएँ हों। नियमों की मर्यादा में रहते हुए यदि हम उनके त्वरित समाधान की दिशा में प्रयास करें तो योजनाएँ केवल कागज़ों में कैद न रहकर वास्तविक रूप से जनता तक पहुँचती हैं।

फील्ड में वही योजना सफल होती है जो जनता को राहत पहुँचाए और जिसके परिणाम को आमजन महसूस कर सके। यही लोकसेवक के जीवन का सार है—जनता की मुस्कान और संतोष, जो किसी भी सरकारी सेवा की सबसे बड़ी सफलता है।

सृजक

डॉ सूरज सिंह नेगी (एस.डी.एम.)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




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