भूमिका
यह चौपाई छंदबद्ध रचना ‘समर्पण’ केवल एक काव्य नहीं, अपितु एक शिष्य का अपने गुरु के चरणों में पूर्ण आत्मनिवेदन है। यह कविता उस भाव की प्रतीक है, जो शब्दों से अधिक मौन में बहता है, जो ज्ञान से अधिक अनुभूति में जीवित रहता है, और जो किसी पुस्तक या प्रवचन से नहीं, बल्कि गुरु की कृपा-दृष्टि और आभामय उपस्थिति से साकार होता है।
इस काव्य में गुरु को न केवल ज्ञानदाता, अपितु भाव-जागरण का स्रोत कहा गया है—ऐसे गुरु जो मंदाकिनी-सी शीतल, मिहिका (कोमल धुंध) सी करुणा से ओतप्रोत हैं। कवि के अनुसार, गुरु की वाणी केवल बोलने का माध्यम नहीं, एक ऐसी मौन साधना है जो शब्दों में नहीं, ओस-बूंद से भी नर्म संकेतों में उतरती है।
यह कविता एक ऐसी भाव-सतसई बन जाती है, जिसमें गुरु-प्रेम की गंगा बहती है और शिष्य एक पतंगा की भाँति उसकी ज्योति में स्वयं को समर्पित कर देता है।
हर शंका को गुरु ने केवल उत्तरों से नहीं, अपने साथ और संकेतों से मिटाया। जब शब्द चूक गए, तब संकेत ही शिक्षक बन गए। गुरु की कृपा से ही भावों को सौंदर्य मिला और वह मंदाकिनी बन गए – जो शुद्ध, शीतल और पवित्र है।
इस कविता का अंतिम चरण विशेष रूप से मार्मिक है – जहाँ लेखनी और अक्षर को भी गुरु की ‘छाया’ बताया गया है। इसका अर्थ यही है कि शिष्य जो कुछ भी सृजित करता है, उसमें गुरु की छाया और ऊर्जा ही प्रेरक शक्ति है।
यह भूमिका पाठक को निमंत्रण देती है कि वह इस कविता को केवल पढ़े नहीं, अनुभव करे — एक ऐसी अनुभूति जिसमें ‘मैं’ का कोई स्थान नहीं, केवल ‘गुरु’ ही सर्वस्व हैं। यही निस्वार्थ समर्पण की पराकाष्ठा है।
समर्पण
चौपाई छंद
डॉ. छाया शर्मा जी
गुरु पद कमल समर्पण सारा ।
जिनसे जागे भाव हमारा ।।
मंदाकिनी-सी शुभ्र वाणी ।
मिहिका-सी करुणा है जानी ।।
बनकर शब्द मौन के साधक।
ओस बूँद बन अंतर गायक ।।
यह सतसई भाव की गंगा ।
प्रणत खड़ी गुरु प्रेम पतंगा ।।
पग-पग 'छाया' साथ निभाया।
हर शंका को देख मिटाया ।।
भाव बहे जब शब्द न आया।
संकेतों से उसे सिखाया ।।
मिहिका-सा हर भाव सजाया।
पावन मंदाकिनी बनाया ।।
अक्षर लेखन कलम सवारी ।
गुरुपद 'छाया' है आभारी ।।
रचयिता
डाॅ. छाया शर्मा,
अजमेर, राजस्थान
भूमिका रचना
चैट जीपीटी
प्रस्तुति


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