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“स्वावलंबन की उड़ान: भारती राठौड़ की आत्मनिर्भरता की यात्रा”

भूमिका

दोस्तो! प्रस्तुत बातचीत एक ऐसे इंसान से है जिसने अपने भविष्य को अर्थपूर्ण बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास किया और आखिरकार उनको सफलता भी मिली। आइये मिलते हैं भारती राठौड़ जी से और जानने समझने का प्रयास करते हैं कि हम कैसे अपने जीवन को संवार सकते हैं। 

 🌿 साक्षात्कार

“स्वावलंबन की उड़ान

भारती राठौड़ की आत्मनिर्भरता की यात्रा”

प्रतिभागी: भारती राठौड़ ‘अनुरागी मन’

स्थान: अजमेर

प्रस्तावक: संवाददाता (प्रश्नकर्ता) उलझन सुलझन की 

              स्थानीय संपादिका डॉ छाया शर्मा जी

🔹 परिचय (संवाददाता द्वारा)

संवाददाता:

नमस्कार भारती जी, सबसे पहले हमारे साक्षात्कार के लिए समय देने हेतु आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। आप न केवल एक लेखिका हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता की प्रेरणा भी हैं। आज हम आपके साथ आपके जीवन के उन पहलुओं पर चर्चा करेंगे जहाँ आपने स्वयं को नए सिरे से गढ़ा।

🔹 प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

प्रश्न 1: भारती जी, आप स्वयं को 'जिद्दी परिंदा' और 'जूनूनी' कहती हैं। इस आत्म-परिचय की भावना कहाँ से उत्पन्न हुई?

उत्तर:

"जब जीवन आसान नहीं होता, तब ज़िद और जुनून ही हथियार बनते हैं। मुझे शुरू से ही साधारण चीज़ों में रुचि नहीं थी। मुश्किलें जब आईं, मैंने उन्हें स्वीकारा और चुनौती के रूप में लिया। शायद इसीलिए मैं खुद को 'जिद्दी परिंदा' मानती हूँ — जो बार-बार गिर कर भी उड़ने को तैयार रहता है।"

प्रश्न 2: आपने 17 वर्ष की उम्र में विवाह किया और उस समय आप सिर्फ़ बारहवीं में थीं। क्या आपने सोचा था कि आप दोबारा पढ़ाई की ओर लौटेंगी? 

उत्तर:

"सच कहूं तो उस समय कुछ भी तय नहीं था। जिम्मेदारियों में खुद को खो दिया था, पर मन में एक आवाज़ हमेशा रहती थी कि मुझे कुछ और करना है। जब बेटा नवीं में पहुंचा, तब मैंने सोचा कि अब मेरे सपनों की भी बारी है। वहीं से फिर शुरुआत हुई।"

🔹 शिक्षा की पुनः यात्रा

प्रश्न 3: आपने इतिहास, हिंदी साहित्य और मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर किया, फिर बी.एड. किया। यह सफर कैसा रहा?

उत्तर:

"बहुत कठिन, लेकिन बहुत संतोषजनक भी। कई बार उम्र के कारण उपेक्षा होती थी, कभी खुद पर संदेह होता था। लेकिन पढ़ाई ने मुझे आत्मबल दिया। खासकर मनोविज्ञान ने मुझे समझाया कि खुद को समझना सबसे ज़रूरी है।"

प्रश्न 4: क्या कभी ऐसा समय आया जब लगा कि अब नहीं हो पाएगा?

उत्तर:

"हां, कई बार लगा। जब घर के काम, बच्चे की पढ़ाई और अपनी क्लास का समय एकसाथ आता था, तब लगता था कि शायद यह मुमकिन नहीं। लेकिन एक कविता कहती हूँ –

"थक के बैठ जाऊँ अगर, तो मंज़िल दूर हो जाती है।

जुनून अगर न हो तो, हर राह अधूरी रह जाती है।"

🔹 लेखन और मंच से जुड़ाव

प्रश्न 5: अजमेर लेखिका मंच से जुड़ना आपके लिए कैसा अनुभव रहा?

उत्तर:

"इस मंच ने मुझे मेरी पहचान दी। पहले मैं सिर्फ लिखती थी, अब मैं सुनी भी जाती हूँ। यहाँ जुड़कर मैंने पाया कि मेरी भावनाएँ सिर्फ मेरे लिए नहीं, औरों के लिए भी मायने रखती हैं।"

प्रश्न 6: 'मेरे साहिब ए क़लम' पुस्तक में आपने ग़ालिब के जीवन को प्रस्तुत किया। यह जिम्मेदारी कैसी रही?

उत्तर:

"बहुत गहरी और भावनात्मक। ग़ालिब को समझना और फिर उन्हें शब्दों में ढालना आसान नहीं था। पर वो मेरा प्रिय विषय था। यह काम करते हुए ऐसा लगा मानो मैं ग़ालिब की आत्मा से संवाद कर रही हूँ।"

🔹 आत्मनिर्भरता और करियर

प्रश्न 7: आप उत्कर्ष क्लासेज़ में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। इस भूमिका में क्या अनुभव रहा?

उत्तर:

"यह भूमिका मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण रही है। करेंट अफेयर्स जैसी चीज़ों को सरल भाषा में प्रस्तुत करना, छात्रों के लिए उपयोगी बनाना — यह रचनात्मकता और जिम्मेदारी दोनों मांगता है। इसने मेरी लेखनी को भी और निखारा।"

प्रश्न 8: आपने तीन बार RAS मुख्य परीक्षा दी। इतने बड़े प्रतियोगी स्तर पर प्रयास करना अपने आप में बड़ी बात है। आपकी प्रेरणा क्या थी?

उत्तर:

"प्रेरणा थी — खुद को साबित करना। यह सिर्फ नौकरी पाने का मामला नहीं था, यह अपने आत्म-सम्मान की लड़ाई थी। हर बार जब मेरा चयन नहीं हुआ, मैंने सीखा कि कुछ नया और बेहतर करने की ज़रूरत है।"

🔹 भावनात्मक पक्ष और संवेदनशीलता

प्रश्न 9: आपके लेखन की शुरुआत आपके पिताजी के निधन पर हुई। क्या कविता आपके लिए भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनी?

उत्तर:

"बिलकुल। मेरी पहली कविता थी –

'अब नहीं रहता अपने जन्मदिन का इंतज़ार मुझको...

क्योंकि उसे मनाने वाले पापा अब नहीं रहे।'

यह लिखते हुए मैंने जाना कि कलम सिर्फ शब्द नहीं, संवेदनाएं भी बहाती है। उसके बाद से कविता मेरी आत्मा का हिस्सा बन गई।"

प्रश्न 10: आप एक श्वान प्रेमी हैं। क्या आपके जीवन में पालतू जानवरों की कोई विशेष भूमिका रही है?

उत्तर:

"जी हाँ, जानवर खासकर कुत्ते, मुझे बिना शर्त अपनाते हैं। उनकी निष्ठा, उनका प्रेम बहुत शुद्ध होता है। जब मैं थकी होती हूँ, तो उनका साथ मुझे संबल देता है।"

प्रश्न 11: आप कहती हैं, “मैं समाजसेविका नहीं हूँ, लेकिन सामने कोई ज़रूरतमंद आ जाए तो मदद करती हूँ।” क्या ये भी आत्मनिर्भरता का हिस्सा है?

उत्तर:

"निश्चित रूप से। आत्मनिर्भरता सिर्फ खुद तक सीमित नहीं होती, यह दूसरों को भी सशक्त बनाने की भावना रखती है। जब हम दूसरों की मदद कर सकते हैं, तो ये भी हमारी ताक़त का प्रमाण है।"

🔹 समापन और प्रेरणा

प्रश्न 12: आज की युवा महिलाओं के लिए, जो खुद को गढ़ना चाहती हैं, आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर:

"मैं यही कहूंगी — खुद को मत भूलो। हालात चाहे जैसे हों, कभी अपनी पहचान से समझौता मत करो। पढ़ाई, हुनर और आत्मसम्मान — यही स्त्रियों की असली शक्ति है।"

प्रश्न 13: भविष्य में आप खुद को कहाँ देखती हैं?

उत्तर:

"मैं चाहती हूँ कि मेरी लेखनी और मेरा जीवन दोनों ही औरों के लिए प्रेरणा बनें। चाहे सरकारी नौकरी हो या लेखन का नया मुकाम — मैं सीखना और आगे बढ़ना नहीं छोड़ना चाहती।"

प्रश्न 14: "स्वावलंबन" आपके लिए क्या मायने रखता है?

उत्तर:

"मेरे लिए स्वावलंबन का अर्थ है — "खुद को इस रूप में स्वीकार करना, जिसमें आप दूसरों पर निर्भर न रहकर खुद के फैसले ले सकें।" ये एक प्रक्रिया है, जो निरंतर चलती रहती है।"

🌸 समापन

भारती राठौड़ ‘अनुरागी मन’ की कहानी सिर्फ़ संघर्षों की दास्तान नहीं है — ये साहस, आत्मबोध और निरंतर प्रयास की मिसाल है। उन्होंने साबित किया है कि जब इरादा मजबूत हो, तो परिस्थितियाँ रास्ता रोक नहीं सकतीं — वो खुद रास्ता बन जाती हैं।

बकौल भारती जी

"मैंने 2016 से 2020 तक अजमेर की कोचिंग्स में शिक्षा मनोविज्ञान पढाया है.... कोरोना के समय कोचिंग्स बंद होने पर मैंने उत्कर्ष इंस्टीट्यूट जॉइन किया...और यूट्यूब पर मेरा खुद का चैनल बनाया 

Bharti Rathore Ma'am Utkarsh 

नाम से जिस पर मेरे मोटिवेशनल विडियोज भी हैं और सिंगिंग भी।"

सूचना स्रोत

डॉ. छाया शर्मा जी (स्थानीय संपादक)
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
अजमेर (राजस्थान) 
पाठ्य विस्तार
चैट जीपीटी 
प्रस्तुति







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