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समर्पण, साहित्य और संस्कृति की अमिट साधिका हैं डॉ. कमला गोकलानी

एक विशेष संवाद

भूमिका

साहित्य के क्षेत्र में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो न केवल शब्दों से साहित्य का निर्माण करते हैं, बल्कि अपने जीवन से एक समर्पित धारा को आकार देते हैं। डॉ. कमला गोकलानी ऐसी ही एक जानी-मानी हस्ती हैं, जिन्होंने सिंधी और हिंदी साहित्य में समान रूप से अपनी अद्भुत लेखनी और संपादन कौशल से एक विशेष स्थान अर्जित किया है। वे एक कुशल लेखिका, अध्यापिका, संपादिका और अनुवादक हैं जिनका साहित्यिक सफर प्रेरणा का प्रतीक है।

डॉ. गोकलानी ने एम.ए., पीएच.डी. (सिंधी), एम.ए. हिंदी और एम.एड. जैसे कई विषयों में उच्च शिक्षा प्राप्त की है। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी उन्होंने हासिल किया है। वे स. पू. चौ. राजकीय महाविद्यालय, अजमेर में आचार्य पद से सेवानिवृत्त हुईं और महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर के सिंधू शोध पीठ की पूर्व उपनिदेशक रही हैं।

उनकी अब तक इकसठ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें से कई को राष्ट्रीय और प्रांतीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। उनकी अनुवाद कला का उत्कर्ष 2010 में साहित्य अकादमी द्वारा कबीर ग्रंथावली के काव्यानुवाद के लिए प्राप्त राष्ट्रीय पुरस्कार में परिलक्षित होता है।


बातचीत

प्रश्न: डॉ. गोकलानी, आपका साहित्यिक सफर अत्यंत प्रेरणादायक रहा है। इस दिशा में आपकी यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?

उत्तर: "बचपन से ही भाषा और साहित्य के प्रति एक स्वाभाविक आकर्षण था। सिंधी मेरा मातृभाषा है, पर हिंदी से भी आत्मीय रिश्ता रहा। पढ़ाते-पढ़ाते और अनुवाद करते-करते जब भावनाएं और विचार शब्दों में ढलने लगे तो लेखन स्वाभाविक बन गया।"

प्रश्न: आपने 61 पुस्तकें लिखीं, जिनमें अनेक को सम्मानित किया गया। आपकी लेखन प्रक्रिया क्या है?

उत्तर: "मेरी लेखन प्रक्रिया अनुभव और अध्ययन के समन्वय पर आधारित है। विषय से जुड़ाव, संदर्भों की प्रामाणिकता, और पाठक की जिज्ञासा — इन तीनों को मैं सदैव ध्यान में रखती हूँ। जब विषय मन को छूता है, तब शब्द स्वयं आकार लेने लगते हैं।"

प्रश्न: 'रिहाण', 'वरदाई', 'रचना', 'आत्म दर्शन' जैसी पत्रिकाओं का वर्षों तक संपादन करना एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। आपको क्या प्रेरित करता रहा?

उत्तर: "संपादन मेरे लिए केवल पत्रिकाएं निकालना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संवाद को जीवित रखना था। नई प्रतिभाओं को मंच देना, लोक चेतना को शब्द देना — यही मेरा ध्येय रहा। 1998 से 'सिंधी साहित्य सुरभि' का संपादन आज तक कर रही हूँ, यह निरंतरता मेरे साहित्यिक जीवन की पहचान है।"

प्रश्न: आपने कबीर के काव्य का काव्यानुवाद किया, जिसे साहित्य अकादमी ने भी सम्मानित किया। उस अनुभव को साझा करें।

उत्तर: "कबीर को समझना और उन्हें अपने शब्दों में ढालना आत्मा से संवाद जैसा अनुभव था। उनका भाव लोक की भाषा में गूढ़ दर्शन कहता है। मेरा प्रयास रहा कि वह अर्थ ज्यों का त्यों पाठक तक पहुँचे।"

प्रश्न: इतने सम्मानों और पुरस्कारों के बीच, आपको सबसे ज्यादा आत्मसंतोष किस उपलब्धि से मिलता है?

उत्तर: "जब कोई पाठक कहता है कि मेरी किसी पुस्तक ने उनके सोचने के तरीके को बदला या उन्हें किसी कठिन परिस्थिति में सहारा दिया, तब लगता है कि मेरी लेखनी सार्थक हो गई।"

प्रश्न: नई पीढ़ी को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?

उत्तर: "भाषा और संस्कृति से जुड़ाव को बनाए रखें। तकनीक जरूरी है, पर जड़ों से रिश्ता भी आवश्यक है। साहित्य संवेदना का सेतु है — उसे थामे रहें, पढ़ें, लिखें और अपने अनुभवों को शब्दों में ढालें।"




सूचना स्रोत
डॉ. छाया शर्मा
         (स्थानीय सम्पादिका) 
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
अजमेर (राजस्थान)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
चैट जीपीटी 
प्रस्तुति 














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