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साहित्य सृजन की समर्पित साधिका श्रीमती रंजना माथुर से एक विशेष बातचीत

भूमिका

श्रीमती रंजना माथुर का साहित्यिक जीवन एक जीती-जागती प्रेरणा है — जो यह सिखाता है कि लेखन केवल शब्दों का खेल नहीं, आत्मा की पुकार है। उनके भावी उपन्यासों और संग्रहों का हिन्दी साहित्य जगत में स्वागत होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।

परिचय

साहित्य एक अनंत यात्रा है, जिसमें शब्द केवल भाव नहीं, बल्कि चेतना के बीज बनकर उगते हैं। ऐसे ही साहित्य की बगिया को अपने विविध विधाओं के पुष्पों से सुगंधित करने वाली हैं श्रीमती रंजना माथुर — एक ऐसी सृजनधर्मी लेखिका, जिनकी लेखनी में अनुभव की परिपक्वता, भावनाओं की सघनता और जीवन की सरलता समान रूप से गूंजती है। उज्जैन की बड़नगर तहसील में जन्मी, अजमेर में बीएसएनएल की रिटायर्ड ऑफिस सुपरिटेंडेंट रह चुकीं रंजना जी, न केवल कविता, कहानी, संस्मरण, और उपन्यास जैसी विविध विधाओं में सिद्धहस्त हैं, बल्कि साहित्यिक आयोजनों और मंचों की प्रेरक शक्ति भी हैं।

उनकी कृतियाँ ‘खुशबू अहसासों की’, ‘मुट्ठी भर ज़िन्दगी’, ‘मुस्कुराते शब्दों का आकाश’ जैसे नामों से साहित्य जगत में अपनी विशेष पहचान बना चुकी हैं।

आइए, जानते हैं उनके साहित्यिक जीवन की प्रेरणाएं, संघर्ष, उपलब्धियाँ और भावी योजनाएं, स्वयं उनकी जुबानी।



बातचीत
प्रश्न 1: रंजना जी, सबसे पहले आपके लेखन-संसार में वापसी की प्रेरणा के विषय में जानना चाहेंगे। क्या वह कोई विशेष क्षण था जिसने फिर से कलम उठाने को प्रेरित किया?

उत्तर: "जी, लेखन से मेरा जुड़ाव तो बाल्यकाल से ही था। विवाह पूर्व कुछ कहानियाँ और लेख प्रकाशित भी हुए। लेकिन विवाह और फिर सरकारी सेवा के दायित्वों ने लेखन को थोड़ी देर के लिए विराम दे दिया। परंतु माँ सरस्वती की कृपा कहिए या भीतर का ज्वार, सेवानिवृत्ति के बाद समय मिला और लेखन फिर से आत्मा की आवाज़ बन गया। यह वापसी किसी जागरण की तरह थी — भीतर के भावों ने खुद ही रास्ता बना लिया।"

प्रश्न 2: आपकी पहली प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘खुशबू अहसासों की’ से लेकर अब तक का रचनात्मक सफर कैसा रहा?

उत्तर: "बहुत ही समृद्ध और आत्मिक रूप से संतुष्टि देने वाला। ‘खुशबू अहसासों की’ ने मुझे पाठकों के निकट लाकर खड़ा किया। फिर साझा संग्रहों, ग़ज़लों, लघुकथाओं और कहानियों में आत्म-प्रकाशन से लेकर मंचीय प्रस्तुतियों तक एक गहन जुड़ाव बना। हर विधा में लिखना अपने आप में चुनौती रहा, लेकिन हर शब्द ने मुझे गढ़ा और संवारा।"

प्रश्न 3: आपने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लेखन किया है — कविता, गीत, ग़ज़ल, लघुकथा, उपन्यास आदि। किस विधा से आपको विशेष आत्मीयता है?

उत्तर: "हर विधा अपनी जगह खास है, लेकिन कविता और लघुकथा मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती हैं। कविता मेरे भावों की धारा है और लघुकथा मेरे विचारों की तीव्र अभिव्यक्ति। दोनों ही में आत्मा झलकती है — एक में सौंदर्य, दूसरी में सार।"

प्रश्न 4: आपकी ग़ज़लों का संग्रह 'मुस्कुराते शब्दों का आकाश' एक अनूठा नाम है। क्या आप इसकी रचना-प्रक्रिया पर कुछ प्रकाश डालेंगी?

उत्तर: "ग़ज़ल मेरे लिए शब्दों की मुस्कान हैं। जीवन की तल्ख़ सच्चाइयों को जब शेर के रूप में संजोया, तो मुझे लगा कि ये शब्द केवल दर्द नहीं बाँटते, मुस्कुराना भी सिखाते हैं। संग्रह का नाम उसी भावभूमि से उपजा। इसमें जीवन, समाज और रिश्तों की बारीकियों को ग़ज़लों के माध्यम से कहने का प्रयास किया है।"

प्रश्न 5: आपका उपन्यास ‘वह भीगी रात’ प्रकाशकाधीन है। क्या आप इसके विषयवस्तु और प्रेरणा के बारे में कुछ बताना चाहेंगी?

उत्तर: "‘वह भीगी रात' का कथानक पुनर्जन्म की एक ऐसी अनूठी प्रेम कथा का है जो अधूरी रह कर अनेक आकस्मिक घटनाओं के माध्यम से अपने पुनीत प्रेम रूपी निर्झरिणी - जलधि  मिलन को साकार करने को उत्कंठित है। निश्छल पावन प्रेम पर सदैव ईश्वरीय कृपा होती है, किन्तु पथ सदैव कंटकाकीर्ण होता है।"

प्रश्न 6: आपने अनेक सम्मान और पुरस्कार प्राप्त किए हैं। इनमें से कौन-सा सम्मान आपको सबसे अधिक स्मरणीय लगता है?

उत्तर: "हर सम्मान अपने आप में प्रेरणास्रोत है, लेकिन मुंशी प्रेमचंद सम्मान - 2022 और संस्कार भारती की लघुकथा प्रतियोगिता में प्रथम स्थान मेरे लिए विशेष हैं। ये न केवल मेरे लेखन की स्वीकृति थे, बल्कि मुझे और बेहतर लिखने की ऊर्जा भी देते हैं।"

प्रश्न 7:आप वर्तमान में कई साहित्यिक संस्थाओं से भी जुड़ी हैं। ‘शब्द सागर’ की स्थापना के पीछे क्या उद्देश्य रहा?

उत्तर: "‘शब्द सागर’ की स्थापना मैंने अजमेर में इसलिए की कि यहाँ के प्रतिभावान रचनाकारों को एक मंच मिले — जहाँ वे मुक्त भाव से रचना करें, साझा करें और सृजन से समाज को जोड़ सकें। यह मंच केवल साहित्यिक गतिविधियों का नहीं, आत्मिक संवेदनाओं का भी केंद्र है।"

प्रश्न 8: आप आज के युवाओं को लेखन के क्षेत्र में किस तरह की प्रेरणा देना चाहेंगी?

उत्तर: "मैं यही कहूँगी कि लेखन केवल कला नहीं, साधना है। शब्दों से समाज को आकार देना है, केवल मनोरंजन नहीं करना। युवा पीढ़ी को जीवन के यथार्थ से जुड़े विषयों पर संवेदनशीलता के साथ लिखना चाहिए और मातृभाषा हिन्दी को गर्व के साथ अपनाना चाहिए।"

सूचना स्रोत


डॉ छाया शर्मा (सम्पादिका)
उलझन सुलझन (लेडीज विंग), अजमेर (राजस्थान)
पाठ्य उन्नयन एवं विस्तार
चैट जीपीटी 
प्रस्तुति

















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