भूमिका
"न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं।
जो बोलूं सच तो चकनाचूर हो जाऊँ।"
सच की कसौटी पर खरा उतरना और निडरता से उसे अभिव्यक्त करना आसान नहीं होता। लेकिन कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनके जीवन और विचार दोनों ही सच की रोशनी में निखरते हैं। ऐसी ही एक विलक्षण शिक्षाविद् हैं – डॉ. छाया शर्मा, जिन्होंने शिक्षा को केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन की साधना माना। अजमेर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमि पर वर्षों तक सेवारत रहकर उन्होंने न केवल विद्यार्थियों को दिशा दी, बल्कि समाज में परिवर्तन के लिए भी नारी चेतना, पर्यावरण संरक्षण और साहित्य सृजन जैसे क्षेत्रों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।
परिचय
डॉ. छाया शर्मा, एक शिक्षिका, साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में राजस्थान के अजमेर नगर की एक प्रेरणास्पद शख्सियत हैं। जन्म 3 अप्रैल 1962 को हुआ और शिक्षा में एम.ए., एम.एड. एवं पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। आपने शिक्षा विभाग, राजस्थान में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य करते हुए शिक्षा को एक साधना के रूप में अपनाया। उनका मानना है कि
“राजकीय सेवा मेरे लिए केवल पेशा नहीं, बल्कि प्रभु उपासना का एक माध्यम रही है।”
मात-पिता, गुरु, मित्र और परिवार को प्रेरणा स्रोत मानते हुए उन्होंने बालिका शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में विशेष कार्य किया। लेखन, चित्रकारी, नृत्य-संगीत उनकी प्रिय रुचियाँ हैं।
आपकी रचनाएँ गीत, कविता, लेख और लघुकथा विधाओं में सामने आई हैं और 'निर्झरिणी' (2023) एवं 'बाल उपवन' (2025) जैसी काव्य पुस्तकों ने विशेष पहचान बनाई है। साहित्यिक मंचों और सामाजिक संगठनों में सक्रिय भूमिका निभाते हुए आप अंतर्राष्ट्रीय ब्राह्मण मंच महिला प्रकोष्ठ की जिलाध्यक्ष, ब्रजभाषा साहित्य अकादमी की मनोनीत सदस्य और अजमेर लेखिका मंच की सदस्य हैं। शिक्षक दिवस 2019 पर आकाशवाणी जोधपुर से आपकी वार्ता का प्रसारण हुआ।
आपको राज्य स्तरीय उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान (2017) सहित अनेक विभागीय प्रशस्तियाँ प्राप्त हुईं। साहित्य के क्षेत्र में भी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। समाजसेवा में ‘एक पेड़ सात जिंदगी’ अभियान के अंतर्गत 151 वृक्ष लगाकर 200 से अधिक घरों को हस्तलिखित पाती भेज कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
हिंदी भाषा और राष्ट्र के प्रति आपकी भावना स्पष्ट है –
“बिन भाषा कैइया हुए इन धड़ री पहचान।
हिंदी भाषा रे बिना यो क्यारो हिंदुस्तान।”
टीचिंग कौशल पर बातचीत
प्रश्न 1: शिक्षा को आपने पेशा न मानकर पूजा क्यों माना?
उत्तर: "शिक्षा मेरे लिए कभी भी महज नौकरी नहीं रही। यह एक आध्यात्मिक अनुभव रहा है, जिसमें मैंने प्रत्येक छात्र में उस परम सत्ता को देखा है। जब हम बच्चों को पढ़ाते हैं, तो हम केवल ज्ञान नहीं दे रहे होते, बल्कि उनके जीवन मूल्यों की नींव रख रहे होते हैं। यह प्रक्रिया मुझे पूजा जैसी ही शुद्ध लगती है – जहाँ गुरु और शिष्य का संबंध अध्यात्म और समर्पण पर आधारित होता है।"
प्रश्न 2: अध्यापन में आप किन शिक्षण विधियों को विशेष रूप से प्रभावी मानती हैं?
उत्तर: "मेरे अनुभव में, शिक्षा तभी सार्थक होती है जब वह बालक की रुचि, अनुभव और जीवन से जुड़ी हो। मैंने कक्षा में गतिविधि आधारित शिक्षण को प्राथमिकता दी—जैसे समूह कार्य, पोस्टर मेकिंग, गीत, नाटक और संवाद के माध्यम से। इन विधियों ने न केवल सीखने को आनंददायक बनाया बल्कि बच्चों की रचनात्मकता और आत्मविश्वास भी विकसित किया।"
प्रश्न 3: एक आदर्श शिक्षक में किन गुणों का होना आवश्यक है?
उत्तर: "एक आदर्श शिक्षक में करुणा, धैर्य, अनुशासन और सतत आत्मविकास की प्रवृत्ति होनी चाहिए। केवल विषय विशेषज्ञ होना पर्याप्त नहीं, शिक्षक को स्वयं एक उदाहरण बनना होता है। जब विद्यार्थी आपके व्यवहार और आचरण से प्रेरणा लेते हैं, तब आप सच्चे अर्थों में शिक्षक बनते हैं।"
प्रश्न 4: विद्यालय प्रबंधन में आपने क्या विशेष प्रयास किए जिससे आदर्श विद्यालय की छवि बनी?
उत्तर: "मैंने विद्यालय को परिवार की तरह चलाने का प्रयास किया, जहाँ हर शिक्षक, छात्र और अभिभावक की सहभागिता हो। संवाद, सहयोग और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा दिया। पारदर्शिता और उत्तरदायित्व ने कार्यक्षमता को बढ़ाया, जिससे हमारी संस्था को आदर्श विद्यालय की मान्यता प्राप्त हुई।"
प्रश्न 5: नैतिक शिक्षा देने के लिए आपने क्या विशेष पहल की?
उत्तर: "मैंने हर प्रार्थना सभा को एक जीवन-पाठशाला के रूप में प्रयोग किया। प्रतिदिन एक नैतिक कहानी, प्रेरणादायक उद्धरण या विद्यार्थी से ही संवाद के ज़रिये आत्ममूल्य और संस्कार जाग्रत किए। नैतिकता कोई अलग पाठ्यक्रम नहीं है; यह शिक्षक के व्यवहार और शिक्षण में ही समाहित होनी चाहिए।"
प्रश्न 6: 2017 में प्राप्त ‘उत्कृष्ट शिक्षक’ सम्मान आपके लिए क्या मायने रखता है?
उत्तर: "यह सम्मान मेरे लिए केवल व्यक्तिगत गौरव नहीं बल्कि मेरे विद्यालय, विद्यार्थियों और साथियों की संयुक्त उपलब्धि है। यह मुझे निरंतर प्रयास करने और नई पीढ़ी के लिए कुछ विशेष कर गुजरने की प्रेरणा देता है। यह विश्वास की मुहर है कि हमने शिक्षा को सच्चे मन से निभाया।"
प्रश्न 7: आपने लेखन और शिक्षण दोनों को कैसे संतुलित किया?
उत्तर: "लेखन मेरे भीतर की सृजनात्मकता की आवाज़ है, जबकि शिक्षण वह ज़मीन है जहाँ मेरे विचारों की जड़ें हैं। मुझे लगता है कि शिक्षक जितना पढ़ता और सोचता है, उतना ही उसकी शिक्षण शैली समृद्ध होती है। मैंने लेखन को न केवल आत्म-अभिव्यक्ति के लिए बल्कि समाज को जागरूक करने के लिए माध्यम बनाया।
प्रश्न 8: डिजिटल शिक्षा के युग में शिक्षक की क्या भूमिका रह जाती है?
उत्तर: "तकनीक शिक्षण का सहयोगी है, लेकिन शिक्षक का स्थान कभी नहीं ले सकती। आज के दौर में शिक्षक को तकनीक से सुसज्जित जरूर होना चाहिए, परंतु उसमें संवेदना, चरित्र निर्माण और प्रेरणा देने की क्षमता भी होनी चाहिए। तकनीक सूचना देती है, शिक्षक दिशा देता है।"
प्रश्न 9: एक शिक्षक को समाज में कैसी भूमिका निभानी चाहिए?
उत्तर: "शिक्षक समाज का दर्पण होता है और मार्गदर्शक भी। वह समाज में जागरूकता फैलाने, रूढ़ियों को तोड़ने, और नयी सोच को स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बालिका शिक्षा, वृक्षारोपण, नारी सशक्तिकरण जैसी गतिविधियाँ केवल विद्यालय की सीमा तक नहीं रुकनी चाहिए।"
प्रश्न 10: आज के नवयुवक शिक्षकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर: "मैं यही कहना चाहूँगी कि आप शिक्षण को नौकरी नहीं, सेवा समझें। हर छात्र के भीतर एक विश्व छिपा होता है – उस तक पहुँचने का प्रयास करें। बच्चों को केवल अंक नहीं, उद्देश्य दें। आपके शब्द, व्यवहार और दृष्टिकोण से ही अगली पीढ़ी आकार लेती है। इस जिम्मेदारी को गर्व और गंभीरता से निभाइए।"
लेखिका की पाती
आदरणीय भाईसाहब,
सादर प्रणाम।
💐💐🙏🙏
"शब्द कभी-कभी छोटे पड़ जाते हैं, जब दिल से निकला आभार उन्हें ढँकना चाहे।"
आप सभी सुधीजनो और सम्मानित सहयोगियों का हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ, जिन्होंने मेरी जीवन-यात्रा, विचारों और कार्यों को समझा, सराहा और साझा किया।
जब मैंने शिक्षा को केवल एक विषय नहीं, बल्कि साधना और सामाजिक बदलाव का माध्यम माना, तब आपके विश्वास और साथ ने मेरे पथ को और भी उज्ज्वल कर दिया।
नारी चेतना, पर्यावरण संरक्षण और साहित्य सृजन—इन तीनों क्षेत्रों में मेरी छोटी-सी भूमिका को आपने जिस आत्मीयता और सम्मान से स्वीकारा, वह मेरे लिए प्रेरणा का शाश्वत स्रोत रहेगा।
विशेष रूप से, “न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं।
जो बोलूं सच तो चकनाचूर हो जाऊँ।”
— इस आत्मस्वीकृति में आपने जो संवेदना महसूस की, वह मुझे और भी निडर, और भी प्रतिबद्ध बनाती है।
मैं अंतर्संबंध जैसे सार्थक मंच की भी आभारी हूँ, जिसने मेरे विचारों को शब्द देकर समाज तक पहुँचाया।
आप सभी के स्नेह, समर्थन और विश्वास के लिए एक बार पुनः कोटिशः धन्यवाद।
आपका साथ मेरी शक्ति है।
सादर,
डॉ. छाया शर्मा
सूचना स्रोत
डॉ छाया शर्मा
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
चैट जीपीटी
प्रस्तुति


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