भूमिका
विज्ञान और साहित्य – दो ध्रुव प्रतीत होने वाले क्षेत्र, जिनमें साधारणतः कोई एक ही साधक उत्कृष्टता की ऊँचाई छू पाता है। लेकिन जब एक ही व्यक्तित्व में इन दोनों धाराओं का अद्भुत संगम हो, तो वह व्यक्तित्व प्रेरणा का स्रोत बन जाता है।
आज हम एक ऐसे ही विशिष्ट व्यक्तित्व से रूबरू हो रहे हैं, जिन्होंने चिकित्सा-जगत में अपने शोध व शिक्षण से नई दिशा दी, और साथ ही साहित्य-जगत में भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति के माध्यम से संवेदनशीलता का विस्तार किया।
परिचय
डॉ. महिमा श्रीवास्तव, स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं एनाटाॅमी विभाग, जेएलएन मेडिकल कॉलेज, अजमेर में सीनियर प्रोफेसर व पूर्व विभागाध्यक्ष (एनाटॉमी) हैं। एम.बी.बी.एस., एम.एस. (गायनी एंड ऑब्स) और एम.एस. (एनाटॉमी) जैसी उच्चतम शैक्षणिक योग्यताओं के साथ आपने रोगियों की सेवा व उच्चस्तरीय चिकित्सा-शिक्षा द्वारा कुशल व समर्पित चिकित्सकों के निर्माण को जीवन का आधार बनाया।
साथ ही, आपकी साहित्यिक यात्रा भी उतनी ही सशक्त है। आपके काव्य संग्रह 'आस के जुगनू' का प्रकाशन राजस्थान साहित्य अकादमी के सहयोग से हुआ। पांच सौ से अधिक रचनाएँ हिन्दी और अंग्रेज़ी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।
द्वैध दक्षता का परिचय
डॉ. महिमा श्रीवास्तव उन विरल व्यक्तित्वों में हैं, जिन्होंने ज्ञान और भाव दोनों को समान भाव से जिया।
एक ओर चिकित्सा की संवेदनशीलता और अकादमिक अनुशासन है,
तो दूसरी ओर साहित्य का रचनात्मक उन्मेष।
इन दोनों क्षेत्रों में उनका कार्य इस मंत्र को प्रतिध्वनित करता है:
"जो करना है, सब ही उच्च कोटि का।"
व्यक्तित्व निर्माण पर बातचीत
प्रश्न 1: आप चिकित्सा और साहित्य – दोनों में कैसे संतुलन बना पाती हैं?
उत्तर: "समय का सही नियोजन और आत्म-प्रेरणा ही मूल कुंजी है। मैंने हर क्षेत्र को अपनी पूरी निष्ठा से जिया। जब आप अपने कार्य से प्रेम करते हैं, तो समय खुद स्थान बना लेता है।"
प्रश्न 2: आपकी दिनचर्या में व्यक्तित्व विकास का क्या स्थान है?
उत्तर: "आत्म-विकास के लिए मैं प्रतिदिन कुछ न कुछ पढ़ती हूँ, लिखती हूँ और आत्म-विश्लेषण करती हूँ। व्यक्ति का विकास आत्मचिंतन से होता है, न कि केवल उपलब्धियों से।"
प्रश्न 3: क्या साहित्य ने आपको एक डॉक्टर के रूप में अधिक संवेदनशील बनाया?
उत्तर: "अवश्य। साहित्य ने मुझे रोगी के भीतर के मन को पढ़ने में मदद की। चिकित्सा में तकनीक के साथ करुणा भी चाहिए, और वह मुझे मेरी लेखनी ने दी।"
प्रश्न 4: क्या आपको कभी ऐसा लगा कि साहित्य और चिकित्सा विरोधाभासी हैं?
उत्तर: "नहीं, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। विज्ञान सत्य की खोज है, और साहित्य उस सत्य की अनुभूति।"
प्रश्न 5: आपने किस मूल्य को जीवन में सर्वोपरि माना?
उत्तर: "उत्कृष्टता और ईमानदारी – जो भी किया, पूरे मन से और सर्वोत्तम रूप में किया।"
प्रश्न 6: क्या आपने अपने मेडिकल विद्यार्थियों में भी यह भावना विकसित की?
उत्तर: "हाँ, हमेशा उन्हें यही सिखाया कि चाहे शोध हो या सेवा, उद्देश्य ऊँचा और प्रयास पूर्ण हो।"
प्रश्न 7: रचनात्मकता को कैसे जीवंत बनाए रखा?
उत्तर: "भावनाओं को बाँधने के बजाय प्रवाहित होने दिया। जब समय मिला, मन को कागज़ पर उतार दिया। यह प्रवाह ही रचनात्मकता है।"
प्रश्न 8: नई पीढ़ी को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर: "किसी भी कार्य को साधारण न समझें। आपका दृष्टिकोण ही उसे असाधारण बनाता है। 'उच्च कोटि' का संकल्प लें, भले वह कार्य छोटा ही क्यों न हो।"
प्रश्न 9: आपकी लेखनी में विषयों की विविधता कैसे आती है?
उत्तर: "मैंने जीवन के हर अनुभव को ग्रहण किया – चिकित्सा, समाज, स्त्री-विमर्श, मानवीय रिश्ते – सब मेरे लेखन के स्रोत हैं।"
प्रश्न 10: क्या सफलता का कोई सूत्र आपके अनुभव में है?
उत्तर: कहा गया है कि -' ऐम एट हैवन एंड यू विल गैट अर्थ' अर्थात् यदि आकाश छूने का उद्देश्य रखेगें तो कम से कम धरा पर तो पैर टिका सकेगें।
अतः
"श्रेष्ठ जीवन उद्देश्य, निरंतर साधना, आत्मानुशासन और परिश्रम – ये वो चार स्तंभ हैं, जिनसे कोई भी और किसी भी क्षेत्र में ऊँचाई पाई जा सकती है।"
सूचना स्रोत
डॉ छाया शर्मा जीपाठ्य उन्नयन और विस्तार
चैट जीपीटी
प्रस्तुति


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें