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"रचनात्मकता और संवेदनशील दृष्टिकोण के कारण विशेष पहचान वाले हैं श्री राजेश कुमार भटनागर

भूमिका 

भारतीय साहित्य जगत में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो अपनी रचनात्मकता और संवेदनशील दृष्टिकोण के कारण विशेष पहचान बनाते हैं। राजेश कुमार भटनागर एक ऐसे ही बहुआयामी व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन साहित्य और सेवा दोनों के समर्पण का उदाहरण है। वे न केवल एक कुशल प्रशासक रहे, बल्कि एक संवेदनशील कथाकार, कवि और अनुवादक भी हैं, जिनकी लेखनी ने सामाजिक सरोकारों को स्वर दिया है।

परिचय 

राजेश कुमार भटनागर, सुपुत्र श्री ए.भी.एल. भटनागर, एम.कॉम. (व्यवसाय प्रशासन) व एम.ए. (इतिहास) की शैक्षणिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ, राजस्थान लोक सेवा आयोग, अजमेर के सहायक सचिव पद से 2021 में सेवानिवृत्त हुए।

सन् 1979 में उनकी पहली कहानी आकाशवाणी, जयपुर से प्रसारित हुई और तब से अब तक वे 80 से अधिक कहानियों, नाटकों और अनेक काव्य रचनाओं के सृजनकर्ता बन चुके हैं। पांच कहानी संग्रह, विविध राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएं, अनुवाद कार्य और अनेक सम्मान उनके समर्पण और रचनात्मकता के साक्ष्य हैं।

वे न केवल साहित्यिक मंचों पर सक्रिय हैं, बल्कि उन्होंने साहित्यिक संस्थाओं की स्थापना कर नवोदित रचनाकारों के लिए भी मंच निर्मित किया है।

दोहरी उत्कृष्टता – प्रशासनिक और साहित्यिक 

राजेश भटनागर का जीवन दो ध्रुवों पर समरस रूप से प्रवाहित होता रहा—एक ओर प्रशासनिक क्षेत्र में अनुशासन, उत्तरदायित्व और नियोजन का अनुकरणीय उदाहरण, वहीं दूसरी ओर साहित्य में भाव, अभिव्यक्ति और सामाजिक सरोकार का उदात्त संवेदन। यह संतुलन उनके व्यक्तित्व निर्माण की मूल कुंजी भी है।

व्यक्तित्व निर्माण पर बातचीत

प्रश्न १. एक साहित्यकार और प्रशासक के रूप में आपने अपने व्यक्तित्व को कैसे संतुलित रखा?

उत्तर: "मैंने समय प्रबंधन और आत्म-अनुशासन को प्राथमिकता दी। साहित्य मेरी आत्मा है और प्रशासन मेरी कर्मभूमि रही। दोनों क्षेत्रों में ईमानदारी से कार्य करते हुए मैंने अपने अनुभवों को एक-दूसरे की पूरक शक्ति बनाया।"

प्रश्न २. आज के युवाओं में आत्मविश्वास की कमी क्यों देखी जाती है?

उत्तर: "इसका मुख्य कारण सामाजिक तुलना, अधूरी जानकारी और धैर्य की कमी है। यदि युवा आत्मविश्लेषण करें और आत्मबल विकसित करें तो उनका आत्मविश्वास स्वतः प्रबल होगा।"

प्रश्न ३. साहित्य का व्यक्तित्व निर्माण में क्या योगदान होता है?

उत्तर: "साहित्य व्यक्ति को संवेदनशील, सहनशील और विचारशील बनाता है। यह न केवल आत्मा को समृद्ध करता है, बल्कि सामाजिक चेतना भी विकसित करता है।"

प्रश्न ४. प्रशासकीय सेवा से आपकी लेखनी को क्या दिशा मिली?

उत्तर: "प्रशासनिक सेवा ने मुझे जीवन के विविध रंगों और मानवीय व्यवहार की गहराइयों से रूबरू कराया, जिसे मैंने अपनी कहानियों और कविताओं में संवेदनाओं के साथ पिरोया।"

प्रश्न ५. आपको किन गुणों ने इतने सम्मान दिलवाए?

उत्तर: "ईमानदारी, निरंतरता और संवेदनशील दृष्टिकोण। मैं हर कार्य को अंतिम तक समर्पण से करता हूं। यही मेरे जीवन और लेखन की विशेषता रही।"

प्रश्न ६. आप नवोदित लेखकों को क्या सलाह देना चाहेंगे?

उत्तर: "पढ़ते रहें, लिखते रहें और आत्म-मंथन करते रहें। प्रशंसा की प्रतीक्षा किए बिना रचना करते रहें, क्योंकि साहित्य अंततः आत्मा की आवाज़ है।"

प्रश्न ७. साहित्यिक नेतृत्व कैसे विकसित किया जा सकता है?

उत्तर: "केवल लेखन नहीं, बल्कि दूसरों को मंच देना, संवाद करना, और साहित्यिक मूल्यों को संरक्षित करना ही सच्चा नेतृत्व है।"

प्रश्न ८. आपकी दृष्टि में सफलता का मापदंड क्या है?

उत्तर: "सफलता वह है, जिससे आत्म-संतोष प्राप्त हो। यदि आप अपने कार्य से आत्मिक प्रसन्नता अनुभव करते हैं, तो आप सफल हैं।"

प्रश्न ९. रचनात्मक लेखन में अनुशासन कितना महत्वपूर्ण है?

उत्तर: "अत्यधिक महत्वपूर्ण। बिना अनुशासन के रचनात्मकता बिखर जाती है। रोज़ थोड़ा-थोड़ा लिखने की आदत ही एक बड़ा लेखक बनाती है।"

प्रश्न १०. आपके अनुसार आज के साहित्य की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

उत्तर: "सतही लेखन की प्रवृत्ति और साहित्य का बाजारवाद। साहित्य को संवेदना और जिम्मेदारी का माध्यम बनाए रखना आज सबसे बड़ी चुनौती है।"

राजेश जी की सूचना

साथ में एक म्यूजिकल कराओके ग्रुप साज और आवाज जयपुर और अजमेर का भी संस्थापक अध्यक्ष हूं । 🙏🙏हारमोनियम, ढोलक, बांसुरी बजाना मेरा शौक है

सूचना स्रोत

डॉ छाया शर्मा

पाठ्य उन्नयन और विस्तार

चैट जीपीटी 

प्रस्तुति



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