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शब्दों की साधिका और शिक्षण की प्रहरी हैं भावना शर्मा जी

लेखन और शिक्षण के दायित्व को आत्मसात करने वाली एक संवेदनशील रचनाकार से संवाद

भूमिका

भावना शर्मा जी से संवाद करते हुए यह स्पष्ट होता है कि लेखन और शिक्षण केवल उनके लिए पेशा नहीं, अपितु समाज निर्माण की प्रक्रिया है। उनकी कविताएं पाठकों को भीतर तक छूती हैं और उनके विचार आज की पीढ़ी को संवेदनशीलता और दिशा प्रदान करते हैं।

उनकी तरह के शिक्षक और लेखक ही आज के समय की ज़रूरत हैं—जो शब्दों से पुल बनाते हैं, दीवारें नहीं।

परिचय

भावना शर्मा न केवल एक समर्पित शिक्षक हैं, बल्कि एक सजग लेखिका भी हैं जिनके शब्द समाज के मनोविज्ञान को छूते हैं। उनकी कविताओं और कहानियों में भावनाओं की गहराई और दृष्टिकोण की व्यापकता दोनों ही स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। उनका काव्य संग्रह 'अनहद नाद' न केवल साहित्यिक गलियारों में सराहा गया है, बल्कि विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत भी हुआ है।

उनका मानना है कि 

"जिस प्रकार सही खान-पान शरीर को पोषण देता है, उसी प्रकार शिक्षण या मार्गदर्शन यदि सही हो, तो मन और आत्मा को भी संजीवनी मिलती है।" लेखन और शिक्षण को वे जीवन का कर्तव्य मानती हैं, और वर्तमान डिजिटल युग में इन दोनों क्षेत्रों की जिम्मेदारी को और भी महत्वपूर्ण मानती हैं।"

आज हम कर रहे हैं भावना शर्मा जी से एक विशेष साक्षात्कार, जिसमें उनके लेखकीय अनुभव, शिक्षण दृष्टिकोण और सामाजिक सरोकारों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

प्रश्नोत्तर सत्र

प्रश्न 1. आपके लेखन की शुरुआत कैसे हुई? क्या कोई विशेष प्रेरणा रही?

उत्तर - "लेखन मेरे लिए आत्म-प्रकटीकरण का माध्यम रहा है। आरंभिक दिनों में डायरी लेखन से शुरू हुआ यह सफर, धीरे-धीरे कविताओं और कहानियों में ढल गया। मेरे पिता, गुरुजन और विद्यार्थियों के अनुभवों ने मुझे भीतर तक स्पर्श किया, और वही मेरी प्रेरणा बने।"

प्रश्न 2. अनहद नाद के पीछे क्या भावभूमि रही?

उत्तर - "अनहद नाद आत्मा की उस गूंज की अभिव्यक्ति है जो शोर के बीच भी मौन से संवाद करती है। इसमें जीवन, समाज, स्त्री भाव, संबंध और प्रकृति के विविध पक्षों को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। यह संग्रह मेरे विचारों का नाद है—जो भीतर से उठता है और पाठक के मन में प्रतिध्वनित होता है।"

प्रश्न 3. शिक्षण और लेखन—इन दोनों को आप कैसे संतुलित करती हैं?

उत्तर - "मेरे लिए ये दोनों पूरक हैं। शिक्षण से मुझे अनुभव और जीवनदृष्टि मिलती है, जिसे मैं लेखन में पिरोती हूं। वहीं लेखन से मिलने वाली संवेदनशीलता मुझे एक बेहतर शिक्षक बनाती है। समय प्रबंधन और आत्मानुशासन के साथ मैं दोनों भूमिकाओं को निभा पाती हूं।"

प्रश्न 4. आज की पीढ़ी को आप शिक्षण की दृष्टि से कैसे देखती हैं?

उत्तर - "आज की पीढ़ी जिज्ञासु है, लेकिन भ्रमित भी। उन्हें मार्गदर्शन की गहरी आवश्यकता है। जब तकनीक के कारण मानवीय संवाद सीमित हो गया है, तब शिक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। सही शिक्षण यदि आत्मा को छू सके, तो बच्चे केवल विद्वान नहीं, संवेदनशील भी बन सकते हैं।"

प्रश्न 5. आप विषयों का चयन कैसे करती हैं? क्या कोई विशेष मानदंड होता है?

उत्तर - "मैं अनुभव को प्राथमिकता देती हूं। जो बात मुझे भीतर से झकझोरती है, वही विषय स्वतः कलम के माध्यम से बह निकलता है। समाज, स्त्री विमर्श, रिश्ते, बचपन, समय की धार—all these are my thematic foundations."

प्रश्न 6. क्या पुरस्कार लेखन को प्रेरित करते हैं या दबाव भी बनाते हैं?

उत्तर - "पुरस्कार मुझे दिशा और आत्म-प्रमाण की अनुभूति देते हैं। वे यह याद दिलाते हैं कि मेरी कलम किसी उद्देश्य की पूर्ति कर रही है। दबाव नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी का बोध जरूर होता है कि मैं ईमानदारी से सृजन करती रहूं।"

प्रश्न 7. आपके अनुसार एक लेखक या शिक्षक का समाज में सबसे बड़ा उत्तरदायित्व क्या होता है?

उत्तर - "एक संतुलित दृष्टिकोण और संवेदनशील चेतना का विकास। लेखक और शिक्षक, दोनों समाज के दर्पण हैं। वे सोच को प्रभावित करते हैं, इसीलिए उन्हें नकारात्मकता से ऊपर उठकर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करना चाहिए।"

प्रश्न 8. आप मोबाइल युगीन पीढ़ी को किस रूप में देखती हैं?

उत्तर - "यह पीढ़ी सूचनाओं से परिपूर्ण है, लेकिन दिशा की तलाश में है। लेखन में जब वे खुद को पढ़ पाते हैं, तो जुड़ाव होता है। शिक्षक और लेखक को चाहिए कि वे तकनीक के साथ-साथ मानवीय मूल्यों की मशाल भी थामे रहें।"

प्रश्न 9. सकारात्मक सोच और स्वीकृति को आप क्यों महत्वपूर्ण मानती हैं?

उत्तर - "क्योंकि पूर्णता एक मिथ है। जब हम अपूर्णताओं को स्वीकार करना सीखते हैं, तब ही भीतर का संघर्ष शांत होता है। सकारात्मक दृष्टिकोण जीवन को सरल और समाज को सौहार्दपूर्ण बनाता है।"

प्रश्न 10. आगे की आपकी साहित्यिक और शैक्षणिक योजनाएं क्या हैं?

उत्तर - "मैं अपने अगले कविता संग्रह पर कार्य कर रही हूं, जिसमें स्त्री की बहुआयामी भावनाओं को केंद्र में रखा गया है। साथ ही शिक्षण पद्धति में मूल्य आधारित शिक्षण को लेकर एक कार्यशाला श्रृंखला की योजना है।"

सूचना स्रोत


डॉ. छाया शर्मा जी
(स्थानीय सम्पादिका)
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
अजमेर (राजस्थान)
पाठ्य उन्नयन एवं विस्तार
चैट जीपीटी 
प्रस्तुति



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