भूमिका
भारतीय बाल रंगमंच, सामाजिक नाट्य आंदोलन और साहित्यिक चेतना के क्षेत्र में जिन व्यक्तित्वों ने उल्लेखनीय योगदान दिया है, उनमें उमेश कुमार चौरसिया एक विशिष्ट नाम है। वे न केवल प्रयोगधर्मी नाट्य लेखक और कुशल निर्देशक हैं, बल्कि एक ऐसे शिक्षाशास्त्री भी हैं जिन्होंने रंगमंच को बच्चों की नैतिक शिक्षा, व्यक्तित्व निर्माण और समाजोत्थान का माध्यम बनाया।
राजस्थानी और हिंदी दोनों भाषाओं में समान अधिकार से सृजन करने वाले चौरसिया जी की लेखनी में लोक, बालमन, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक जड़ों की गहरी अनुभूति दिखाई देती है। उनके नाटक जहाँ एक ओर बालकों के मन में संस्कार और विवेक की नींव रखते हैं, वहीं दूसरी ओर समाज को विचार और संवेदना की भूमि पर संवाद करने के लिए प्रेरित करते हैं।
परिचय
अड़तीस वर्षों से रंगकर्म में सक्रिय उमेश कुमार चौरसिया भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से पंजीकृत नाट्य लेखक हैं। वे राजस्थान साहित्य अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के मानद सदस्य रह चुके हैं। उनके लिखे नाटकों का मंचन न केवल देशभर में हुआ है, बल्कि दूरदर्शन और आकाशवाणी जैसे राष्ट्रीय मंचों से भी प्रसारित हुआ है। 50 से अधिक प्रकाशित पुस्तकों में 27 बाल साहित्य की श्रेणी में हैं।
एनसीईआरटी सहित अनेक संस्थाओं के लिए लगातार कार्य करते हुए उन्होंने शिक्षा, कला और समाज के बीच की खाई को रचनात्मकता से पाटने का कार्य किया है।
बातचीत
प्रश्न 1: आपकी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर: "मेरी साहित्यिक यात्रा एक छात्र के रूप में शुरू हुई थी। शुरुआत कविता और गीत से हुई, लेकिन रंगमंच ने मुझे अपनी ओर विशेष रूप से आकृष्ट किया। मेरा पहला बाल नाटक 1987 में लिखा गया था, जिसे एक विद्यालय ने मंचित किया। बच्चों की मासूम प्रतिक्रियाओं और शिक्षकों की सराहना ने मुझे इस दिशा में गंभीरता से काम करने की प्रेरणा दी।"
प्रश्न 2: बाल नाटक और साहित्य की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ?
उत्तर: "मुझे हमेशा लगता रहा कि यदि समाज को बदलना है तो बालमन से शुरुआत करनी होगी। बच्चा जो मंच पर करता है, वही जीवन में दोहराता है। बाल नाटक उसके संस्कारों का पहला पाठ बन सकता है। इसीलिए मैंने रंगमंच को शिक्षा का माध्यम बनाया।"
प्रश्न 3: आपके अनुसार रंगमंच की सामाजिक भूमिका क्या है?
उत्तर: "रंगमंच एक आईना है जो समाज को उसका वास्तविक चेहरा दिखाता है। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जागरण का साधन है। विशेषतः बाल रंगमंच बच्चों को आत्मविश्वास, संवाद कौशल और नैतिक सोच प्रदान करता है।"
प्रश्न 4: आपके नाटकों में विवेकानन्द, बापू, शिवाजी जैसे प्रेरक पात्र बार-बार क्यों आते हैं?
उत्तर: "क्योंकि ये आदर्श व्यक्ति नहीं, विचार हैं। मैं चाहता हूँ कि बच्चे महापुरुषों को इतिहास नहीं, अपने जीवन का हिस्सा मानें। इन पात्रों के माध्यम से मैं जीवन के मूल्य, साहस और कर्तव्यबोध को सरल भाषा में प्रस्तुत करता हूँ।"
प्रश्न 5: आप दो भाषाओं में लेखन करते हैं। इस अनुभव को कैसे परिभाषित करेंगे?
उत्तर: "राजस्थानी मेरी मातृभाषा है और हिन्दी मेरी अभिव्यक्ति की शक्ति। दोनों में लिखना मुझे एक अलग तरह की संतुलित दृष्टि देता है। क्षेत्रीय संस्कृति और राष्ट्रीय सोच को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करता हूँ।"
प्रश्न 6: एनसीईआरटी और अन्य अकादमियों से जुड़ाव ने आपकी लेखनी को कैसे समृद्ध किया?
उत्तर: "इन संस्थाओं ने मुझे राष्ट्रीय फलक पर सोचने और काम करने का अवसर दिया। मुझे समझ में आया कि लेखन को केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक उपयोगिता की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए।"
प्रश्न 7: आपकी कई पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल हुईं। लेखन करते समय आप किन बातों का ध्यान रखते हैं?
उत्तर: "मैं कोशिश करता हूँ कि भाषा सरल हो, भावनाएँ सच्ची हों और पात्र ऐसे हों जिनसे बच्चा खुद को जोड़ सके। विषय वस्तु में प्रेरणा हो, लेकिन बोरियत नहीं। बच्चों को सीख मिले, मगर उपदेशात्मकता से दूर रहूँ — यह मेरा मूल मंत्र है।"
प्रश्न 8: आज के समय में बाल साहित्य और नाटक की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उत्तर: "तकनीक और मोबाइल की दुनिया में बच्चों की रुचि तेजी से बदल रही है। चुनौती यह है कि हम अपनी कथ्य शैली को इतना रोचक बनाएं कि बच्चे फिर से किताब और रंगमंच की ओर लौटें।"
प्रश्न 9: समाजोत्थान और व्यक्तित्व निर्माण के लिए रंगकर्म को आप कैसे उपयोगी मानते हैं?
उत्तर: "रंगमंच बालक को आत्मविश्लेषण और आत्मविश्वास सिखाता है। वह शब्दों से संवाद करता है, भावनाओं से जुड़ता है और मंच से समाज के लिए सोचता है। यही वह निर्माण है, जिसकी आज समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है।"
प्रश्न 10: नवोदित लेखकों और रंगकर्मियों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर: "मूल्यों से समझौता मत कीजिए। जो भी रचें, वह समाज को कुछ दे। लेखन या मंचन सिर्फ प्रसिद्धि के लिए नहीं, उत्तरदायित्व के लिए करें। मेहनत करें, पर मौलिकता के साथ। समय बदलेगा, लेकिन सत्य और संवेदना हमेशा सराही जाएगी।"
समापन टिप्पणी
उमेश कुमार चौरसिया एक ऐसा नाम हैं, जो साहित्य और रंगमंच को केवल कला नहीं, समाज परिवर्तन की प्रक्रिया मानते हैं। उनकी सृजन यात्रा, विचारशीलता और समाजोन्मुख दृष्टि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
सूचना स्रोत
डॉ छाया शर्मा
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
चैट जीपीटी
प्रस्तुति



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