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हिन्दी साहित्य की भावप्रवण धारा की प्रतिनिधि हैं विनीता निर्झर जी

भूमिका 

साहित्य न केवल शब्दों का खेल है, बल्कि यह संवेदनाओं का सजीव चित्रण भी है। जब कोई रचनाकार समाज की धड़कनों को अपने शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत करता है, तो वह केवल कविता नहीं रचता—वह एक आत्मीय संवाद की शुरुआत करता है। विनीता निर्झर जी ऐसी ही एक सशक्त साहित्यकार हैं, जिनकी लेखनी जीवन के विविध रंगों, समाज की परतों और भावनाओं की बारीकियों को सहज रूप में प्रस्तुत करती है। यह साक्षात्कार उनके जीवन, विचारों और साहित्यिक यात्रा को समझने का एक विनम्र प्रयास है।

👩‍🎓 परिचय 

हिन्दी साहित्य की भावप्रवण धारा में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित करने वाली विनीता निर्झर जी का जन्म 2 अगस्त 1959 को हुआ। समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर (एम.ए. प्रीवियस) शिक्षा प्राप्त विनीता जी की साहित्यिक यात्रा गहन संवेदनाओं, सामाजिक चेतना और सृजनशीलता से परिपूर्ण है। उनके लेख व कविताएं नवज्योति, दैनिक भास्कर, आजकल, राजस्थान पत्रिका, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं।

उनकी रचनात्मक प्रतिभा को देशभर की अनेक साहित्यिक संस्थाओं ने सम्मानित किया है। समरस साहित्य सृजन संस्थान भारत, मंज़िल ग्रुप साहित्य मंच दिल्ली, माहेश्वरी साहित्यकार मंच, नवज्योति संकीर्तन मंच जैसे मंचों से उन्हें लाल बहादुर शास्त्री साहित्य रत्न सम्मान, सर्वश्रेष्ठ समीक्षक, मातोश्री सम्मान, एडमिन सम्मान, कोरोना साहित्यकार योद्धा सम्मान जैसे अनेक अलंकरण प्राप्त हुए हैं।

विनीता जी की रचनाएं छह साझा संकलनों—‘मचान’, ‘वाग्देवी नेह निर्झर’, ‘नीले गगन के तले’, ‘महकते स्पंदन’-1 एवं 2, ‘प्रेम पुष्प’—में प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही, उनके दो व्यक्तिगत काव्य संग्रह—‘ये तारे’ एवं ‘धूप कितनी तेज़ है’, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के सहयोग से प्रकाशित हुए हैं। छंद विधा पर केंद्रित उनकी पुस्तक ‘आओ छंद को जानें’ साहित्य जगत में गहरी रुचि रखने वालों के लिए एक सराहनीय प्रयास है।

वर्तमान में वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर सक्रिय सदस्य और पदाधिकारी के रूप में रचनात्मक गतिविधियों में संलग्न हैं। साहित्य में उनकी निष्ठा, समर्पण और निरंतर सृजनशीलता प्रेरणादायक है।

🖋️ विनीता निर्झर जी से बातचीत

प्रश्न 1. आपकी लेखनी में संवेदना और समाज के बीच संतुलन किस रूप में झलकता है?

उत्तर: "मेरी रचनाएं समाज की विसंगतियों और मानवीय भावनाओं का चित्रण करने का माध्यम हैं। जब मैं लिखती हूं, तो उसमें एक सामान्य मनुष्य की पीड़ा, आशा, संघर्ष और संवेदनाएं स्वाभाविक रूप से समाहित हो जाती हैं। लेखन मेरे लिए आत्माभिव्यक्ति ही नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है।"

प्रश्न 2. कविता लेखन में छंद और मुक्तछंद—आप किस शैली को अधिक प्रभावी मानती हैं, और क्यों?

उत्तर: "दोनों शैलियाँ अपने-अपने स्थान पर प्रभावशाली हैं। छंदबद्ध कविता में अनुशासन होता है, और वह लयात्मक सौंदर्य प्रदान करती है, जबकि मुक्तछंद में विचारों की उड़ान को अधिक खुलापन मिलता है। मेरी लेखनी दोनों रूपों में प्रवाहित होती है, परंतु छंद लेखन मेरे आत्मीय अधिक है।"

प्रश्न 3. जब आप किसी सामाजिक विषय पर लिखती हैं, तो विषय चयन की प्रक्रिया कैसी होती है?

उत्तर: "मैं अपने आसपास की घटनाओं, अनुभवों और समाज की वास्तविकता को गहराई से महसूस करती हूँ। विषय मेरे अंतर्मन में स्वतः जन्म लेते हैं। जब कोई विचार भीतर लंबे समय तक संवाद करता है, तो वह एक दिन कविता या लेख के रूप में बाहर आता है।"

प्रश्न 4. आपको ‘धूप कितनी तेज़ है’ संग्रह में सबसे प्रिय रचना कौन-सी लगती है और उसके पीछे की प्रेरणा क्या थी?

उत्तर: "इस संग्रह की कविता ‘मन की छाँव’ मेरे दिल के बेहद करीब है। यह रचना जीवन की कठोर सच्चाइयों के बीच आशा की उस छाँव की बात करती है, जो हर इंसान अपने भीतर संजोए रहता है।"

प्रश्न 5. साहित्यिक मंचों से जुड़े अनुभवों ने आपके लेखन को किस प्रकार समृद्ध किया है?

उत्तर: "इन मंचों ने मुझे एक व्यापक पाठकवर्ग दिया, साथ ही अन्य रचनाकारों से संवाद और सीखने का अवसर भी। उनकी प्रतिक्रिया, आलोचना और प्रोत्साहन ने मेरी लेखनी को निखारा है।"

प्रश्न 6. एक रचना को आप पूर्ण कब मानती हैं? क्या उसमें आत्मसंतुष्टि जरूरी है या पाठक की प्रतिक्रिया?

उत्तर: "दोनों ही पहलू महत्वपूर्ण हैं। मेरे लिए जब कोई रचना मेरी आत्मा से जुड़ती है और मुझे भीतर तक स्पर्श करती है, तो वह पूर्ण होती है। लेकिन पाठकों की प्रतिक्रिया मुझे नई दृष्टि देती है और लेखन की दिशा तय करती है।"

प्रश्न 7. कविता में प्रतीकों और बिंबों के प्रयोग को आप किस दृष्टि से देखती हैं?

उत्तर: "प्रतीक और बिंब कविता को गहराई और सौंदर्य देते हैं। वे विचारों को दृश्य रूप में प्रस्तुत करने का माध्यम हैं। इनका प्रयोग जितना सटीक और स्वाभाविक होता है, उतना ही प्रभाव पाठक पर पड़ता है।"

प्रश्न 8. वर्तमान डिजिटल युग में साहित्य की भूमिका और लेखन के प्रभाव में आपको क्या बदलाव महसूस होते हैं?

उत्तर: "डिजिटल युग ने साहित्य को व्यापक पहुँच दी है, परंतु इसकी गहराई कहीं-कहीं कम होती दिखती है। सोशल मीडिया पर त्वरित लेखन बढ़ा है, पर शिल्प और विचार की परिपक्वता कहीं-कहीं खो जाती है। फिर भी यह एक नवविकास की दिशा है।"

प्रश्न 9. युवा रचनाकारों को आप क्या प्रमुख सलाह देना चाहेंगी जो स्थायी लेखन में मार्गदर्शन दे सके?

उत्तर: "लेखन में धैर्य और अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। सतत अभ्यास, साहित्य का गहन अध्ययन और आत्ममंथन से ही स्थायी लेखन सम्भव है। लेखन केवल भावुकता नहीं, एक साधना है।"

प्रश्न 10. क्या आपके लेखन का कोई उद्देश्य या संदेश है जिसे आप साहित्यानुरागियों तक विशेष रूप से पहुँचाना चाहती हैं?

उत्तर: "मेरा लेखन मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं और सामाजिक समरसता को स्वर देने का प्रयास है। मैं चाहती हूँ कि मेरी रचनाएं पाठकों के मन को छुएं और उन्हें सोचने के लिए प्रेरित करें—यही मेरे लेखन का उद्देश्य है।"

सूचना स्रोत



डॉ. छाया शर्मा

(सम्पादिका, उलझन सुलझन, लेडीज विंग, अजमेर)

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