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समाज में विशिष्ट पहचान रखने वाले श्री मोहनलाल जी वर्मा

 परिचय 

आज हमारे साथ जुड़े हैं एक ऐसी शख्सियत, जिन्होंने सामाजिक चेतना, पत्रकारिता, श्रमिक आंदोलनों और सांस्कृतिक नेतृत्व—हर क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। हम बात कर रहे हैं मोहनलाल वर्मा जी की, जो राजस्थान की राजधानी जयपुर निवासी हैं।

18 सितंबर 1950 को जन्मे वर्मा जी ने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर शिक्षा अर्जित की और प्रारंभिक कार्यकाल में निजी क्षेत्र के इंजीनियरिंग उद्योग से जुड़े रहे। परंतु उनका असली सफर वर्ष 1973 से शुरू हुआ, जब उन्होंने भारतीय मजदूर संघ के माध्यम से ट्रेड यूनियन आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई।

साहित्य, पत्रकारिता और समाज सेवा में गहन रुचि रखने वाले मोहनलाल जी वर्ष 1991 से पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। ब्रह्म ज्ञान विद्यापीठ, पुणे द्वारा उन्हें विद्या वाचस्पति की मानद उपाधि से सम्मानित किया जा चुका है।

वर्ष 1981 से गुर्जर समाज के संगठनों में उनकी निरंतर सक्रियता रही है। वर्तमान में वे राजस्थान गुर्जर महासभा में प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष तथा गुर्जर इतिहास, साहित्य एवं भाषा शोध संस्थान में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं।

इसके अतिरिक्त, प्रदेश वरिष्ठ नागरिक परिसंघ में वे प्रदेश महामंत्री हैं, और वर्ष 2008 से देव चेतना नामक मासिक पत्रिका का संपादन व प्रकाशन जयपुर से कर रहे हैं।

मोहनलाल वर्मा जी न केवल एक लेखक, संपादक और विचारक हैं, बल्कि एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता और सांस्कृतिक संरक्षक भी हैं। आइए, उनके जीवन और अनुभवों से जुड़ी कुछ प्रेरक बातें समाज पर आधारित कुछ प्रश्नों के माध्यम से जानते हैं—सीधे उन्हीं की ज़ुबानी।


बातचीत

प्रश्न 1. सर, क्या आपको लगता है कि समाज के सभी वर्गों के नागरिक अपने कर्तव्यों के साथ दायित्वों को भी पूर्ण रूप में समझ पाने में सक्षम हैं? 

उत्तर - "आपके प्रश्न में ही उत्तर अंतर्निहित है, हमारे देश में अभी तक सभी नागरिक लोकतंत्र को ही ठीक प्रकार से नहीं समझ पाए है। अपने अधिकार और कर्तव्य को समझना और उसके अनुरूप दायित्व निर्वाह करना बहुत दूर की बात है। जब तक व्यक्ति दूसरे की  असुविधा को नहीं समझ पाता है,तब तक अपने कर्तव्य को समझ पाना बहुत मुश्किल है। हमारे देश में 90% लोग सिर्फ अपने हित को देखते हैं,उन्हें समाज और राष्ट्र से कोई सरोकार नहीं है।"

प्रश्न 2. क्या समाज में जाति, धर्म या वर्ग के अतिरिक्त किसी अन्य आधार पर भी भेदभाव होता आपने पाया है?

उत्तर - "जाति धर्म और वर्ग के अतिरिक्त हैसियत, गरीबी और अमीरी तथा जीवन स्तर को लेकर भी लोगों में भेदभाव है।"

प्रश्न 3. सर, क्या समाज में महिलाओं या कम प्रभाव वालों को बराबरी का दर्जा मिल पाता है?

उत्तर - "सामान्यतः नहीं मिल पाता है।"

प्रश्न 4. क्या बच्चों, युवाओं और वृद्धों को गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक और स्वास्थ्य सेवाएं सहज रूप से बिना भेदभाव के उपलब्ध हैं?

उत्तर - "कानून की दृष्टि में तो है,लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से नहीं है।"

प्रश्न 5. सर, क्या सर्व समाज को जीवन की प्राथमिकताओं को तय करने में  आप सक्षम मानते हैं?

उत्तर - "प्रत्येक व्यक्ति सक्षम हो सकता है, उसमें सक्षम होने की संभावनाएं है, किंतु हमारे यहां की सामाजिक एवं राजनीतिक संरचना इस दिशा में कोई कार्य योजना व्यवहार में अभी तक लागू नहीं कर पाई है।"

प्रश्न 6. क्या के निष्पक्ष या तटस्थ ना रह जाने के पीछे आप क्या मुख्य कारण मानते हैं?

उत्तर - "हमारा परिवेश शिक्षा और संस्कार।"

प्रश्न 7. क्या समाज में नैतिक के साथ साथ अनैतिक मूल्यों को बढ़ावा देकर नए प्रयोग करने की आहट आपको आती है?

उत्तर - "नैतिकता तर्क और कानून से नहीं लाई जा सकती है? नैतिकता बोध और व्यवहार का विषय है। आज  तथाकथित भूमंडलीकरण के युग में तकनीकी आविष्कारों ने मनुष्य को एक उपयोगी मशीन के रूप में रूपांतरित कर दिया है।"

प्रश्न 8. क्या पर्यावरण के साथ साथ समाज में नैतिकता को बल देने वाले मूल्यों को संरक्षण देने के प्रयासों को वर्तमान समाज द्वारा महत्व दिया जाता है?

उत्तर - "यथार्थ में तो हम पर्यावरण शब्द का सही शब्दार्थ व्यवहार में नहीं जा पा रहे हैं। औद्योगिक प्रदूषण, भूमि प्रदूषण, वायुमंडल प्रदूषण तक ही हमारी सोच सीमित है, उसके समाधान के लिए हम मात्र कुछ कानून बनाने और पौधारोपण का दिखावा करने के अतिरिक्त अभी तक कोई ठोस कार्य योजना नहीं बना पाए हैं। पर्यावरण के अंतर्गत पृथ्वी ग्रह का संपूर्ण पर्यावरण आ जाता है, वर्तमान समय में सबसे बड़ी समस्या सामाजिक प्रदूषण की है, इससे भी कहीं अधिक प्रदूषण हमारी शिक्षा और संस्कारों में हो रहा है।"

प्रश्न 9. "क्या आदर्श समाज निर्मित करने के प्रयास हो रहे हैं?" क्या विश्व भर में कहीं भी आपको ऐसा होता दिखता है?

उत्तर - "कुछ सामाजिक धार्मिक आध्यात्मिक संगठनों द्वारा प्रयास किया जा रहे हैं। भारत में गायत्री परिवार, रामकृष्ण परमहंस मिशन, महर्षि अरविंद के द्वारा निरूपित "दिव्य मानव अवतरण"की अवधारणा पर भी उनके अनुयायियों द्वारा कार्य किया जा रहा है। इस संबंध में भारतवर्ष आध्यात्मिक - दार्शनिक प्रस्थापना कई है, इनमें से कुछ सकारात्मक प्रयास भी कर रही है। हमारे यहां सामाजिक विज्ञान एवं मनोविज्ञान पर जितना भी साहित्य उपलब्ध है, उस पर भारतीय दार्शनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से पुनरावलोकन एवं पुनर्लेखन की आवश्यकता।"

प्रश्न 10. क्या समाज के नागरिक समाजसेवा और सामूहिक दायित्वों के प्रति सजग आपको लगते हैं?

उत्तर - "बहुत से लोग हैं।"

प्रश्न 11. क्या युवाओं को अपनी प्रतिभा और ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाने के अवसर मिल रहे आपको दिखते हैं?

उत्तर - "सकारात्मक और नकारात्मक भाव हमारे एक ही चित्त में उत्पन्न होते हैं, सर्वप्रथम युवाओं को स्वयं को समझने की आवश्यकता है, इस आवश्यकता की पूर्ति पर ही जीवन ऊर्जा का सही दिशा में  व्यय किया जाना संभव है।

जहां तक अवसरों का प्रश्न है? अवसर मिलते नहीं है प्राप्त किए जाते हैं।"

सूचना प्रदाता

श्री मोहनलाल वर्मा जी

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प्रस्तुति



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