भूमिका
जीवन को दिशा देने और दशा सुधारने में परस्पर संबंध महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। और! ये संबंध यदि सकारात्मक भावना के साथ निभाने पर वातावरण को सुगंधित और सुखद कर देते हैं। एक ऐसे ही दृष्टांत का विवरण यहां पर दिया जा रहा है जो निश्चय ही पाठक वर्ग को प्रभावित करेगा।
विवरण
मेरे पिताजी श्री समय सिंह पुत्र स्व. श्री जिले सिंह एक सीधे- साधे ईश्वर मे विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के मुजफ्फरनगर जनपद के खतौली ब्लाक के भटौडा नाम के गांव में 11-05-1942 में हुआ था। वो एक कृषक परिवार से ताल्लुक रखते थे।
हमारी माता स्व. श्रीमती श्यामकली देवी मेरठ जनपद की मवाना तहसील के माछरा ब्लाक के अन्तर्गत गढ़ रोड पर स्थित हसनपुर कलां गांव के स्व. श्री रामचन्द्र जी की पुत्री थीं।
हम अपने माता-पिता की तीन संतान हैं, मेरी बड़ी बहन कृष्णा, मैं (अशोक चौधरी/कुमार) और मेरा छोटा भाई महेश कुमार।
हमारे मामा जी का परिवार साक्षर था। हमारे मामा जी श्री निर्भय सिंह व श्री सिब्बू सिंह सरकारी अधिकारी थे तथा शहर में निवास करते थे। उनकी जीवन शैली से प्रभावित होकर हमारी माता जी के अथक प्रयास तथा नाना व नानी जी के अथक सहयोग से हम भी सन् 1977 में मेरठ की नेहरू नगर कालोनी की गली नंबर एक में अपना मकान बनाकर रहने लगे थे तथा शहरी नागरिक बन गये थे।
ग्रामीण से शहरी नागरिक बनने का सफर काफी दिलचस्प व संघर्ष भरा था। मेरे नाना जी का परिवार यूं तो एक कृषक परिवार ही था, परंतु वह किसानों में अगडे थे। मेरे नाना जी के मकान का दरवाजा लखोरी ईंटों का बना हुआ था, जिसे देखकर यह प्रभाव पडता था कि यह पुराना सम्पन्न परिवार है।
सन् 1965 में मेरा जन्म हुआ था। मेरे परिवार में महिलाओं की कमी थी। मेरी दोनों बुआ शादीशुदा थीं तथा मेरी दादी की मृत्यु मेरी माताजी की शादी के कुछ माह बाद ही हो गई थी। दादी जी की मृत्यु के समय मेरी एक बुआ की शादी भी नहीं हुई थी। इस कारण मेरा जन्म मेरे नानाजी के यहाँ ही हुआ था। जब मेरी माताजी मुझे लेकर मेरे गांव पहुची,तब मेरे गांव से मेरे जन्म की सूचना की रस्म निभाने के लिए हमारा नाई मेरे नाना जी के यहाँ पहुचा, तब मेरे नाना जी ने हमारे नाई की बड़ी खातिरदारी की तथा चलते समय भेंटस्वरूप 251 रुपये दिए। उस मंदे जमाने में यह बड़ी रकम थी। जब मेरी ताऊ जी ने हमारे नाई से पूछा कि रिश्तेदार कैसे हैं। तब नाई ने कहा कि जितने की आपकी पूरी जमीन है, उतनी कीमत का तो आपके रिश्तेदार का दरवाजा है। इस पर मेरे ताऊ जी ने उसकी पिटाई भी कर दी थी। हमारे पास 65 बीघा जमीन थी, ताऊ बोले क्या दरवाजा 65 बीघा जमीन के बराबर का है। खैर नाई ने अतिश्योक्ति अलंकार का प्रयोग कर दिया था। मेरे ताऊ जी ने गुस्से में कह दिया कि देखेंगे छूछक ट्रक भरकर आयेगा क्या? मेरे नाना जी को यह बात मेरी माता जी के माध्यम से पता चल गई। मेरे नाना जी ने उस समय बेड, सोफा सेट, रेडियो, अनाज की टंकी, बडा सन्दूक आदि सामान ट्रक में भरकर, ट्रक से ही छूछक भेज दिया।
मेरे नाना जी के यहाँ सन् 1972-73 के आसपास घर पर शौचालय बना हुआ था, जो उस समय एक किसान के यहाँ होना, परिवार की अग्रणी स्थिति की ओर संकेत करता था। मेरी नानी जी, जिनका नाम प्रहलादो देवी था, माछरा ब्लाक के भड़ौली गांव के निवासी श्री बहादर सिंह कसाना की पुत्री थीं। जैसा मेरी नानी जी बताती थीं कि उनके पिताजी पशुओं (गाय, भैंस) की बीमारी दूर करने की देशी दवाई के जानकार थे। उनके द्वारा ही मेरी नानी जी को भी यह तकनीक ज्ञात थी। मैंने स्वयं देखा कि मेरी नानीजी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त पशुओं को कान व पूंछ की नस बींधकर तथा देशी दवाई की दो तीन खुराक में ही ठीक कर देती थीं। इस कारण नानीजी का आसपास के कई गांवों में बड़ा आदर था। नानी जी कोई डिग्री प्राप्त डाक्टर नही थीं, परंतु उनकी दवाई डिग्री प्राप्त डाक्टरों पर भारी पडती थी। इस कारण नानीजी उस पुराने समय में एक आर्थिक रुप से सशक्त महिला थीं।
यही कारण रहा कि मेरे नानाजी एक माध्यम दर्जे के किसान होने के बावजूद भी अपने आसपास के बड़े किसानों से बहतर थे। हमारे मेरठ में स्थापित होने में हमारी नानी जी का बहुत बड़ा योगदान था। हमारे पिताजी और दादाजी शहर में रहने के पक्षधर नहीं थे। वो गांव में ही अपनी खेती किसानी बढाना चाहते थे, परंतु हमारी माताजी शहरी जीवन की पक्षधर थीं। इस स्थिति में शहर में सम्पत्ति खरीदने में मेरे पिताजी की कोई रुचि नहीं थी। सन् 1972 में मेरी माता जी ने अपने बल पर मेरठ में 200 वर्ग गज का एक प्लाट गढ़ रोड पर स्थित नेहरू नगर कालोनी में खरीद लिया, जिसकी कीमत उस समय 12000 रुपये थी। इन 12000 रुपयों में हमारे पिताजी ने कोई योगदान नहीं दिया था। सब धन मेरी माता जी ने लगाया था। मेरी माता जी का कोई व्यवसाय नही था। अतः किसी ना किसी रूप में यह धन मेरे नाना जी व नानी जी की कृपा से प्राप्त था। सन् 1974 में इस प्लाट की नींव भरी गई। उसमें आधा सहयोग हमारे पिताजी ने दिया था, करीब 5-7 हजार रुपए। सन् 1976 में इस प्लाट पर बिल्डिंग बनी, जिसमें 90000 रुपये खर्च हुए। इसमें मेरे पिताजी की ओर से 15000 रुपयों का सहयोग रहा था। सन् 1978 में मकान की फिनिशिंग हुई, इसमें पूरा खर्च मेरे पिताजी ने दिया था,जो करीब 25000 रुपये था। इस प्रकार हम शहरी नागरिक बन मेरठ में रहने लगे थे।
सूचना स्रोत
श्री अशोक चौधरी
प्रस्तुति



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