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अपनी प्रतिभा से शिक्षा और साहित्य क्षेत्र को समृद्ध कर देने वाली प्रतिभा हैं लता जी

भूमिका

बचपन में पिता का साया उठ जाने से उनके प्रति संवेदनाएँ स्वाभाविक रूप से अधिक गहरी हो जाती हैं। इसी भावना को आत्मसात करते हुए सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. लता अग्रवाल 'तुलजा' ने अपनी लेखनी के माध्यम से पिता को समर्पित अनेक रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाली डॉ. लता अग्रवाल अब तक लगभग नब्बे पुस्तकें रच चुकी हैं, जिनमें उपन्यास, कथा संग्रह, लघुकथा संग्रह और काव्य संग्रह सम्मिलित हैं।  


बातचीत

प्रश्न १. लता जी आप कहां रहती हैं और अभी आप कहां पर कार्यरत हैं?

उत्तर - "मैं अभी भोपाल में रहती हूं और इग्नू की क्लासेस लेती हूं पहले बी-एड. कॉलेज में प्रिंसिपल थी। मैं कविताएं और उपन्यास लिखती हूं।"

 प्रश्न २. आप कौन-कौन से विषय पढ़ाती हैं?

 उत्तर - "मैं एजुकेशन और हिंदी साहित्य की क्लासेस लेती हूं।"

प्रश्न ३.  आपकी किताबों के विषय में कुछ बताएं?

उत्तर - "अब तक मेरी लगभग नब्बे पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें से लगभग पंद्रह सोलह पुस्तकें शिक्षा की बी-एड कोर्स में भी चल रही हैं और मैंने पाठ्यक्रम भी बनाए हैं। किन्नर समाज पर मेरी छह पुस्तकें आ चुकी हैं। उनको ध्यान में रखकर मैंने शोध कार्य भी किया है। उनके साथ रहकर उनकी समस्याओं के बारे में लिखा है। मेरे साहित्य को लगभग चालीस विद्यार्थियों ने अपने शोध कार्य में प्रयुक्त किया है। इनमें मंगलामुखी पुस्तक और बुलबुल कथा संग्रह प्रमुख  हैं जो कि किन्नरों के ऊपर है।"

प्रश्न ४. आपने किस विषय में पीएच-डी. की है?

उत्तर - "मैंने हिंदी साहित्य की समकालीन कविताओं में पीएच-डी की है भोपाल के बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय से।"

प्रश्न ५. किन्नर समाज पर पुस्तकें लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?

उत्तर - "मैं एक बार बस में जा रही थी। वह बस पूरी भरी हुई थी लेकिन मैंने देखा कि एक सीट खाली है। किसी के साथ जब उन्होंने मुझे बैठने के लिए कहा तो मैं वहां बैठ गई। कुछ देर बाद मुझे समझ में आया कि मेरे साथ एक किन्नर बैठी है। इसलिए उस सीट पर कोई नहीं बैठ रहा था, लेकिन मुझे उनकी मानवता देखकर अच्छा लगा। मैंने उन्हें धन्यवाद किया तो उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या आपको मेरे साथ बैठने में कोई परेशानी नहीं है। तो मैंने उत्तर में कहा कि 'नहीं'। आपने मुझे सीट उपलब्ध कराई। मुझे तो आपका धन्यवाद कहना चाहिए और मेरे मन में जो अंतर्द्वंद्व था किन्नरों को लेकर वह शांत हुआ और मुझे लगा कि वे भी बहुत अच्छे हो सकते हैं। हमें उनसे डरना या घबराना नहीं चाहिए। रास्ते में उससे मेरी दोस्ती हो गई। हमने खूब सारी बातें करीं और सारी बस में लोग मुझे देख रहे थे लेकिन मुझे उससे कुछ भी फर्क नहीं पड़ रहा था क्योंकि मुझे पता था मैं जो कर रही हूं सही कर रही हूं एवं उसके बाद मैंने उन्हीं के ऊपर अपनी पहली कहानी लिखी जिसका नाम था 'बुलबुल' क्योंकि उनका नाम बुलबुल था और उसके बाद मैंने किन्नर समस्याओं पर छह पुस्तकें लिखीं और मेरी उनसे मेरी बहुत अच्छी दोस्ती हो गई।"

प्रश्न ६. आपकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तकें कौन-कौन सी हैं?

उत्तर - "मेरी सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों में मंगलामुखी, बुलबुल (कथा संग्रह), दु:शला, हवाई चप्पल वाला हीरो, और कलयुग का पार्थ आदि पुस्तकें हैं। इसके अलावा भागवत गीता के पाठों को भी मैंने सरल भाषा में लिखा है जिससे बच्चे उसको आसानी से पढ़ सकें। मध्य प्रदेश में भी मैंने बहुत सारा लेखन कार्य किया और मेरी काफी पुस्तकें कोर्स वर्क में लगी हुई हैं।"

प्रश्न ७. दु:शला पुस्तक आपने कैसे लिखी, क्योंकि उसके बारे में बहुत ही काम की लेखन सामग्री है? 

उत्तर - "यह एक काल्पनिक पुस्तक है कि अगर मैं दूसरा वाला की जगह होती तो मैं क्या-क्या करती या मेरे मन में कौन-कौन सी इच्छाएं जागृत होतीं क्योंकि दु:शला कौरवों की बहन थी। सौ भाइयों की अकेली। उसके बावजूद भी महाभारत में उसका उल्लेख बहुत कम है। इसीलिए मैंने अपनी कल्पनाओं के अनुसार इस उपन्यास को लिखा है।"

ज्योति जी,

आपका और उलझन सुलझन का हार्दिक धन्यवाद। आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा और मेरी अनंत शुभकामनाएं कि आप ऐसे ही लेखन कार्य करती रहें और हम आप एक दूसरे से कुछ ना कुछ सीखते रहें।

साक्षात्कार सृजक

ज्योति भड़ाना


सम्पादिका, उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
फरीदाबाद (हरि)
प्रस्तुति




टिप्पणियाँ

  1. ज्योति जी से हुई परिचर्चा के अच्छे अंश आपने प्रकाशित किए हैं। आपका प्रयास सराहनीय है,कारण इससे समाज के कई ऐसे साहित्यकार,गुंजन जो राजनीति से दूर हैं उन्हें आप समाज के समक्ष लेकर आयेंगे।
    इस परिचर्चा में संभवतः तकनीकी के रहते कुछ त्रुटियां रह गई हैं ,आशा है आप उन्हें सुधार लेंगे। बहुत साधुवाद।

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