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वीरांगना रामप्यारी गुर्जरी व तैमूर लंग का संघर्ष

शोधार्थी - ज्योति (इतिहास विभाग, MAHGU)



शोध निर्देशिका - डॉ. सुचिता उपाध्याय (MAHGU)

शोध सार

भारतवर्ष में रामप्यारी गुर्जरी का नाम सदैव सुनहरे अक्षरों में वीरांगनाओं में लिखा जाएगा क्योंकि भारतवर्ष में जब भी तैमूर लंग के आक्रमण का इतिहास बताया जाएगा उसमें गुर्जर सेनापति जोगराज के साथ रामप्यारी गुर्जरी ने भी तैमूर लंग की लाखों की सेना को कैसे भारत से खदेड़ा यह तथा उनकी वीरता को भी बताया जाएगा।

रामप्यारी गुर्जरी का जन्म चौहान गोत्र के गुर्जर परिवार में सहारनपुर स्थित गुर्जरगढ़ में हुआ था। वह बचपन से ही साहसी थीं तथा अपने पिता के साथ अन्य गांवों में पहलवानों के कौशल देखने जाती थीं।

वह प्रसिद्ध योद्धा पहलवान जोगराज गुर्जर, जो कि पथरी गांव से थे, से प्रभावित थीं व उन्हें अपना गुरु मानती थीं और नियमित रूप से व्यायाम व अभ्यास करती थीं। उन्होंने जोगराज की भाँति विवाह न करके अन्य महिलाओं को वीर व निडर बनाने का काम कर राष्ट्र पर सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

रामप्यारी गुर्जरी जोगराज पहलवान के आशीर्वाद से महिलाओं को बरछा, भाला, मल्ल विद्या व तलवार आदि चलाने का प्रशिक्षण देने लगीं व उन्होंने चालीस हजार वीरांगनाओं की सेना भी तैयार की तथा उनकी सेनापति बनीं।

सन् 1398 ई० में जब तैमूर लंग ने भारत में घुस दिल्ली तक कब्जा कर लाशों के ढेर लगा दिए थे तब उसके मेरठ पहुंचने पर उससे लड़ने लिए जोगराज, हरबीर सिंह गुलिया, गुलियावली बाढली तथा रामप्यारी गुर्जरी ने अस्सी हजार पुरुष योद्धाओं व चालीस हजार महिलाओं की सेना तैयार की, जो तीन टुकड़ियों में बंटकर कार्य करती थी। उसने तैमूर लंग से भिड़कर उसकी लाखों की सेना को हजारों में बदल दिया तथा उसे भाला मार घायल कर भागने को मजबूर कर दिया।

कुछ समय बाद उस जख्म की वजह से ही उसकी मृत्यु भी हो गई। रामप्यारी गुर्जरी के रणकौशल से तैमूर भी अचंभित रह गया था। चालीस हजार की महिला सेना में गुर्जर, जाट, अहीर, राजपूत, हरिजन, वाल्मीकि, त्यागी व अन्य जातियों की वीर महिलाएं थीं।

शब्द कुंजी - वीरांगना, तैमूर लंग, भारत, योद्धा।

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