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शिव की सती और सती के शिव

 शिव की सती, सती के शिव


करके शिव से हठ सती, बिन बुलाए पिता घर जाती है...

सुनती है अपशब्द पिता से, तिरस्कार पति का सभा में पाती है...

भरी सभा के इस नीच कृत्य पर, पिता सहित, सबको फटकार लगाती है...

क्यूं बात पति की ना मानी, सती ग्लानि और पश्चाताप से भर जाती है...

पीहर में हुए इस अपमान को, सती सह नहीं पाती है...

स्वयं पिता दक्ष ने ही, किया तिरस्कार पति का, सती क्रोधाग्नि में जल उठती है...

पति के मानमर्दन से आहत सती, उसी क्षण प्राणाहुति यज्ञ में दे देती है...

ऐसा करके वह सुकुमारी, प्रतिशोध अपमान का पिता से ले लेती है...

सती के यज्ञ में जल जाने पर, शिवगण वीरभद्र ने ऐसा तांडव मचाया...

शीश काट दिया दक्ष प्रजापति का, सब देवों को भी दण्ड सुनाया...

दे दी प्राणाहुति, सती ने यज्ञ में सुनकर भोले दौड़े आते हैं...

धू-धू करके,जलती सती को यज्ञ वेदी से शिव बाहों में उठाते हैं...

तीनों लोकों में हाहाकार मच जाता है, तब जब शिव वियोगी हो जाते हैं...

अधजले शव को लेकर शिव भोले, सती की विरह में डूब जाते हैं...

गतिविधि सृष्टि की, सब ठप्प पड़ गई...

यह जान सृष्टिपालक विष्णु, सुदर्शन चक्र चलाते हैं...

सती के शव के करके इक्यावन टुकड़े, तुरंत धरा पर गिराते हैं...

जो टुकड़ा जिस जगह गिरा धरा पर वह शक्तिपीठ कहलाया है...

प्रेम हमेशा अजर अमर है, शिव ने जग को प्रमाण सहित बतलाया है...

सृष्टि ने और शिव अनुयायियों ने भी इस संकेत को समझा है...

सती के विरह में वियोगी शिव, अंतिम अवशेष सती भस्म को अपने अंगों पर सजाते हैं...

मुंड माला जो धारण की शिव ने उसकी भी अलग कहानी है...

वह सती से लेकर शिवा के बीच के सब जन्मों की निशानी है...

१०७ जन्मों तक शिव ने शिवा को वरण किया नहीं...

इतने वर्षों तक शिव ने भी, शिवा का स्थान किसी अन्य को दिया नहीं...

बात पति की ना सुनकर, सती ने दारुण दुःख सहे...

विछोह हुआ पिया से उसका, पिया भी जन्मों-जन्मांतर तक रुष्ट हुए...

कथा का सार यही है मित्रो/बहनो...

बिन बुलाए पिता घर भी ना जाना...

पति आज्ञा की अवेहलना करके, पीहर में अपना मान कभी मत डिगाना...

ब्याही-ठ्याही लड़की का, मान पीहर भी तभी करे...

जब उसके लिए, पति की आज्ञा, सदैव सर्वोपरि रहे...

शायद इन्हीं भूलों के करने से, शिव सती से रुष्ट हुए, जिसका सती ने जन्मों-जन्मांतर तक भुगतान किया...

भूलवश सती से, एक और भूल हुई थी, राघव की परीक्षा लेने हेतु, सती ने, मां सीता का रूप धरा था...

तब से ही शिव ने सती को मन ही मन त्याग दिया...

सारी कोर कसर तब पूरी हो गई, जब सती ने बिना बुलाए पिता के यज्ञ में जाने का शिव से हठ किया...

यह सब तो नियति के खेल थे, जो सारे प्रपंच रचे गए...

समय आ गया था, शिव सती विरह का, ताकि जग को अमर प्रेम का संदेश मिले...

शिवा के धैर्य, लगन और निष्ठा-त्याग ने, अंततः,शिव को हठ त्यागने को विवश किया...

शिवा का प्रण था शिव को पाना, जिसका शिव ने मान किया...

१०८वें जन्म में अंततः शिवा ने, शिव को पति रूप में, फिर से प्राप्त किया...

रचनाकार

© सोनिया सिंह 'जागृति'✍️

संपादिका, उलझन सुलझन (लेडीज विंग)

सहारनपुर

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