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नाटक 'साहस'

 नाटक: साहस  

(लेखिका: डॉ. नाज़ परवीन)  

पात्र 

सोफिया – संघर्षशील और साहसी महिला  

समीर – सोफिया का पति, बेटे की चाह रखने वाला।  

सलमा खाला – पड़ोस की बुजुर्ग महिला।  

आसमा – सलमा खाला की बेटी।  

कायनात – सोफिया की बड़ी बेटी।  

अन्य सहायक पात्र – मोहल्ले के लोग, समीर की माँ, डॉक्टर, गाँववाले। 

अंक एक 

खुशी और यादें

(मंच पर हल्की रोशनी, सोफिया मोहल्ले में लड्डू बाँट रही है। सलमा खाला बाहर बैठी हैं।)

सोफिया: (हाथ में लड्डू का थैला लिए) लो सलमा खाला, आज कायनात की पहली सैलरी आई है! बड़े पीर साहब की फ़तेहा कराई थी, ये उसी के लड्डू हैं।  

सलमा खाला: (हंसते हुए) ला बेटी, बड़ी मेहनत की है तूने। दो लड्डू आसमा के लिए भी दे जा, वो स्कूल से आने वाली होगी।  

सोफिया: (मुस्कुराते हुए) हाँ खाला, ये लीजिए। वो हमेशा कहती थी कि उसे भी कायनात आपा जैसा बनना है।  

सलमा खाला: बेटा, ये लड्डू कायनात के पापा ने बनवाए हैं?  

सोफिया: हाँ खाला, देशी घी से बने हैं।  

सलमा खाला: (हैरान होकर) कौन? समीर?? वो कब से इतना समझदार हो गया? मुझे तो आज भी याद है, कैसे तुझे तंग करता था…  

(मंच पर रोशनी मंद होती है, सोफिया अतीत की ओर चली जाती है। फ्लैशबैक शुरू होता है।)

अंक दो 

अतीत के घाव  

(रोशनी गहरे पीले रंग की, घर का दृश्य। सोफिया और समीर के बीच बातचीत हो रही है।)  

समीर: (गुस्से से) फिर बेटी हुई? तुझे दवा दी थी ना, फिर भी?  

सोफिया: (सहमी हुई) मैंने क्या किया, ये तो खुदा की मर्जी है।  

समीर:(गुस्से से) मर्जी? मैं बेटा चाहता था! देख लेना, अबकी बार बेटा ही होगा।  

(मंच पर सोफिया के संघर्षों को दिखाया जाता है – समीर के ताने, मारपीट, बेटियों के जन्म पर उसका अकेलापन।)

सोफिया:(आँसू पोंछते हुए) अल्लाह को बेटियाँ पसंद हैं… मैं इन्हें पढ़ाऊँगी, काबिल बनाऊँगी।  

(फ्लैशबैक खत्म, रोशनी फिर से सामान्य हो जाती है। सोफिया लड्डू बाँटते हुए सोच में पड़ जाती है।) 

अंक तीन 

संघर्ष और जीत 

(समय बीतता है, कायनात बड़ी हो चुकी है। मंच पर समीर और सोफिया बहस कर रहे हैं।) 

समीर: कायनात अलीगढ़ नहीं जाएगी! गाँव की लड़कियाँ इतनी दूर नहीं पढ़तीं!  

सोफिया: (साहस से) वो जाएगी! उसे पढ़ना है, और मैं उसे रोकूंगी नहीं!  

(समीर गुस्से में चला जाता है, लेकिन सोफिया कायनात का दाखिला अलीगढ़ में करवा देती है। समय बीतता है, कायनात बड़ी कंपनी में नौकरी पा लेती है।)  

(अंतिम दृश्य – समीर अखबार लेकर दौड़ता हुआ आता है।)  

समीर (खुश होकर):देखो सोफिया! कायनात की फोटो अखबार में छपी है! हमारा नाम भी लिखा है!  

सोफिया (आँखों में आँसू) : अल्हम्दुलिल्लाह… मेरी बेटी ने नाम रोशन कर दिया।  

(आसमा दौड़ती हुई आती है।) 

आसमा:मुझे भी देखना है! कायनात आपा की फोटो दिखाइए!  

सलमा खाला: सोफिया, अबकी बार आसमा को भी अलीगढ़ भेजना। मुझे भी इसे अपने पैरों पर खड़ा करना है।  

(सोफिया मुस्कुराते हुए समीर के साथ घर की ओर बढ़ती है। पर्दा गिरता है।)

समाप्त।

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