भूमिका
जीवन भर सीखने का सिलसिला चलता है और साथ साथ बनती है संगत और कुसंगत लेकिन इन दोनों के प्रभाव बिल्कुल विपरीत प्रकृति के होते हैं - हितकारी या फिर अहितकारी। शायद नीचे दी पंक्तियों में कुछ शब्दशिल्पियों ने यही कुछ समझाने का प्रयास किया है।
मूल टैक्स्ट
संगति और कुसंगति की
प्रकृति है विपरीत
संगति तो है संस्कारों की
जो करती है प्रवीण
कर देती है प्रवीण
नए मार्ग बनते जाते हैं
दुर्गुण धीरे धीरे ही सही
दूर होते जाते हैं
श्री हंसराज जी 'हंस' के संशोधित शब्द
संगति और कुसंगति की,
प्रकृति बड़ी है विपरीत।
संगति करती संस्कारों को,
नित नूतन और प्रवीण।
जीवन कौशल में होते जाते दक्ष,
मार्ग बन जाते हमारे समक्ष।
दुर्गुण धीरे- धीरे ही मिटते,
और! चले जाते सारे गम हटते।
श्री कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण' जी के शब्द
संगति और कुसंगति की प्रकृति है विपरीत।
संगति है संस्कारों को बढ़ा दिखावे प्रीत।
संगति करती दक्ष है सुलभ मार्ग बतलाय।
दुर्गुणों को सुसंगति देती दूर भगाय।
प्रस्तुति

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