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समाजसेवा के लिए सदैव तत्पर रही प्रतिभा श्री भंवर सिंह जी

भूमिका

शिक्षक समाज का निर्माता होता है, जिसका मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को न केवल शैक्षिक ज्ञान प्रदान करना है, बल्कि उन्हें जीवन के विभिन्न पहलुओं के लिए तैयार करना भी है। एक शिक्षक अपने ज्ञान, अनुभव और मूल्यों के माध्यम से छात्रों में नैतिकता, अनुशासन, रचनात्मकता और आत्मनिर्भरता विकसित करता है। आज की शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छात्रों को तर्कसंगत सोच, समस्या समाधान, नैतिक जिम्मेदारी और सामाजिक योगदान के लिए तैयार करने पर भी केंद्रित है। शिक्षक अपने मार्गदर्शन से विद्यार्थियों को भविष्य की चुनौतियों का सामना करने और एक सफल, जागरूक तथा जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देते हैं।  

एक शिक्षक न केवल ज्ञान का संचारक होता है, बल्कि वह एक मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत और समाज के उज्जवल भविष्य का निर्माता भी होता है।

विवरण

साथियो! आज हमारे मध्य हैं शिक्षाविद श्री भंवर सिंह जी, जिन्होंने अंग्रेजी भाषा में अपने ज्ञान से अनेकानेक बालकों का भविष्य संवारा। श्री सिंह समाज में मानव संपदाओं के बीच पर्याप्त समय व्यतीत करके मानवीय आचार व्यवहार की गहरी समझ रखते हैं। एक शिक्षाविद जो समाज के लिए एक सामाजिक संपत्ति बन गया। अपनी दूरंदेशी से यह मानव संपदा एक ऐसे दूरदर्शी के रूप में विकसित हुई, जो शिक्षा को रूपांतरित करने और समुदायों को ऊपर उठाने के लिए समर्पित होता है। ज्ञान के प्रसार के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के साथ, वे नवीन शिक्षण विधियों, समावेशी प्रथाओं और मूल्य-आधारित शिक्षा के माध्यम से व्यक्तियों को सशक्त बनाते हैं। साक्षरता, कौशल विकास और समानता जैसी सामाजिक चुनौतियों का समाधान करके, वे अंतराल को पाटते हैं और जनमानस को आजीवन सीखने को प्रेरित करते हैं। उनका प्रयास कक्षाओं से परे जाकर सामाजिक जागरूकता, नैतिक जिम्मेदारी और सतत विकास को बढ़ावा देता है, जो अंततः एक प्रगतिशील और जागरूक समाज का निर्माण करता है। तो आइए समझने का प्रयास करते हैं एक बेहद अनुभवी शिक्षाविद से जीवन प्रवाह को।


बातचीत

प्रश्न १. गुरुजी आप जीवन के झंझावातों के मध्य उसको किस रूप में पाते हैं?
उत्तर - "मैं अपने समग्र जीवन को एक गजब के संघर्ष के रूप में पाता हूं और इसी इसी को दृष्टिगत रख मैं एक अंग्रेजी कहावत को अक्सर कहता हूँ कि 
"Life is nothing without struggle."
सेवा क्षेत्र में जाने का निर्णय एक खांटी कृषक परिवार के सदस्य यानि मैंने मेरी अर्धांगिनी के सुझाव और प्रेरणा से लिया। उस निर्णय के अनुरूप मैं सेवा क्षेत्र से जुड़ा और ना जाने कितने खट्टे मीठे अनुभव जीवन के हुए। मैं अपने जीवन को संघर्ष के रूप में इसलिए पाता हूं क्योंकि मेरे पास जब काउंसलिंग की किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं थी तब मेरे सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी चाचा श्री श्याम सिंह ने मुझको सेवा क्षेत्र में जाने की सलाह मेरी शैक्षणिक सफलताओं को ध्यान में रखकर दी थी।"
प्रश्न २. गुरुजी आपको अपने जीवन का कौन सा दायित्व सबसे प्रिय लगा और क्यों? 
उत्तर - "इस संदर्भ में मेरा कहना है कि मुझको अध्यापन कार्य दायित्व सबसे बेहतर लगा जिसमें मुझे असंख्य बालकों का जीवन संवारने का सौभाग्य तो मिला ही साथ ही अपने बालकों का भविष्य निर्मित करने के लिए भी पर्याप्त समय मिला और कौशल भी। इसके मूल में मुख्य कारण यह था कि मैंने अपने विद्यार्थी काल में तमाम अभावों को तो देखा ही था साथ ही मैंने अपने परिजनों की मुझमें निहित आशाओं को भी महसूस किया था। मेरी मां हों या मेरे चाचा, मेरे पिता हों या मेरे भाई-बहिन अथवा मेरी अर्धांगिनी। सबकी अनंत अपेक्षाएं मुझसे थीं तो मैं किसी भी रूप में उनको निराश नहीं करना चाहता था और अगली पीढ़ियों के लिए भी मार्ग बनाना चाहता था।"
प्रश्न ३. गुरु जी आप एक पति व पिता के रूप में अपनी सफलता को कैसे देखते हैं?
उत्तर - "मैं यदि अपना आकलन करूँ, तो इन दोनों दायित्वों के अतिरिक्त भी अन्य अधिकाँश दायित्वों का निर्वहन करने में मैं पूर्णतया सफल रहा हूँ। अपनी पत्नी की आशाओं, अपेक्षाओं तथा सुझावों को सर्वाधिक मान देकर तथा बालकों के लिए उनके सर्वोत्तम भविष्य के लिए आधार बनाकर। यह सब मुझको एक अनूठा संबल देता है और अपनी अर्धांगिनी से विछोह के बाद भी यदि मैं कभी उनका स्मरण करता हूँ तो पाता हूं कि वह ही मेरा आकलन अपने जीवनकाल में एक समर्पित जीवन साथी के रूप में करती थीं। इसी कड़ी में उनके दिए हुए संस्कार मेरे बालकों के समर्पित भाव में मुझको दृष्टिगोचर होते हैं।"
प्रश्न ४. आपके जीवन का कौन-सा पक्ष सर्वाधिक आनंददायी था जिसमें आपको सर्वाधिक संतुष्टि की अनुभूति हुई?
उत्तर - "पारिवारिक दायित्वों को समर्पित भाव से निभाने के मध्य
बालकों को शिक्षित करने की व्यस्त दिनचर्या में से समाज सेवा के लिए समय निकालकर कार्य करना मुझको ना केवल सर्वाधिक आनंद की अनुभूति देता था बल्कि अन्य समस्त संबंधित पक्षों को संतुष्ट रखने में भी मददगार था। विगत बावन वर्ष पूरी तरह समाज सेवा के लिए समर्पित रहे। शारीरिक अक्षमताओं की निरंतर वृद्धि के बावजूद अभी भी सामाजिक जरूरतों को पूरी करने के लिए तत्पर रहता हूं।"
प्रश्न ५. आपने अपने जीवन का पर्याप्त समय सामाजिक कार्यों में व्यतीत किया है तो आपको सामाजिक कार्यों में राजनीति की तथा राजनीतिक क्षेत्र में सामाजिक घुसपैठ के संदर्भ में क्या कहना है?
उत्तर - "सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र यद्यपि अलग अलग हैं फिर भी दोनों पूरक ही हैं और इन दोनों क्षेत्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकने में सक्षम व्यक्ति ही दोनों क्षेत्रों में सफल हो सकता है! मेरा निजी मत यह है कि इन दोनों के मध्य की बेहद महीन पर अंतर की दीवार को बनाए रखकर ही सामाजिक क्षेत्र में परस्पर सामंजस्य से काम किया जाए।"
प्रश्न ६. गुरुजी, आप प्रत्येक किस्म के मानव संसाधनों के मध्य रहे हैं तो कृपा कर विस्तार से बताएं कि किस श्रेणी की मानव संपदाओं के साथ काम करना सबसे आसान है?
उत्तर - "इस संदर्भ में मेरा मानना है कि समाज में माध्यम वर्ग की मानव संपदाओं के साथ काम करना सर्वाधिक सरल है क्योंकि इस वर्ग में अत्यधिक महत्वाकांक्षा नहीं होती और इसके साथ सामंजस्य स्थापित करना सर्वाधिक सरल है।"
प्रश्न ७. भावी जीवन के लिए क्या कार्य योजनाएं आपके मस्तिष्क में हैं?
उत्तर - "मेरे मस्तिष्क में एक ऐसी लाइब्रेरी निर्मित करने की कार्ययोजना है जिसमें उन्नत तरीके से अध्ययन की व्यवस्था के साथ साथ काउंसलिंग की व्यवस्था भी करा दी जाए। अमर शहीद धन सिंह कोतवाल की स्मृति में भवन निर्माणाधीन है। उसी में एक कमरे को इस कार्ययोजना के लिए समर्पित करने का यथासंभव प्रयास रहेगा।"
सूचना स्रोत
श्री भंवर सिंह जी
प्रस्तुति






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