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तीर्थराज श्रीसम्मेद शिखर पावन वंदना (एक अविस्मरणीय यात्रा वृत्तांत)

भूमिका

भारत और पाकिस्तान में प्राचीन जैन धर्म की अनेकानेक यादगारें हैं और उनमें से भारत में एक के दर्शन करने के उपरांत इस धर्म के अनुयायी श्री संदीप जी ने उस यात्रा का सचित्र वृत्तांत भेजा तो हृदय गदगद हो उठा इस प्रयास में निहित लेखक के मनोभावों को महसूस करके।

विवरण

"बीस तीर्थंकर मुक्ति गये,

जिनको शत-शत बार प्रणाम।

गंगा सम अति निर्मल है,

तीर्थ श्रीसम्मेद शिखर धाम।।"

आस्थावान मनुष्य लौकिक जीवन में आध्यत्मिकता के बहुत निकट होता है। अपनी आत्मा की शुद्धि एवम् निर्मलता के लिए प्रतिदिन अपने आराध्य की श्रद्धापूर्वक भक्ति-आराधना करना उसके दैनिक जीवन की दिनचर्या में इस तरह शामिल हो जाता है कि उस परम पिता की प्रतिमा अथवा प्रतिकृति के दर्शन किये बिना आत्म संतुष्टि नहीं होती।

इसी कड़ी में तीर्थों की यात्रा (वंदना) करना सभी धर्मों (जैन, बौद्ध, हिन्दू , मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई) के ग्रन्थों में एवम् उपदेशों में प्रधानतया उल्लेखित है।

जैन धर्म के अनेकानेक तीर्थ क्षेत्र भारत में ही नहीं अपितु विश्व के अन्यान्य देशों में भी स्थापित हैं। जहाँ जिनशासन (जैन शासन) के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ) से अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (24 तीर्थंकरों) के अति प्राचीन, अति भव्य एवम् नूतन अतिशयकारी जिनमंदिर एवम् जिनालय स्थापित हैं।

अगर बात करें स्वदेश भारत की तो उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक विश्व प्रसिद्ध  जिनालयों (जैन मंदिर) की बहुतायतता दृष्टिगोचर होगी।

इन्हीं जैन मन्दिरों की विश्व प्रसिद्ध श्रंखलाओं में दिलवाड़ा जैन मंदिर अरावली श्रृंखला (राजस्थान), खजुराहो जैन मंदिर, खजुराहो (मध्य प्रदेश), पालिताना जैन मंदिर, शत्रुंजय पर्वत (गुजरात), गोमतेश्वर जैन मंदिर (कर्नाटक), रणकपुर जैन मंदिर अरावली श्रृंखला (राजस्थान), गिरनार पर्वत (गुजराज) एवम् तीर्थराज श्रीसम्मेद शिखर (झारखंड) प्रमुख हैं।

जिनागमानुसार जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों की मोक्ष स्थली श्रीसम्मेद शिखर ही है। 

जीवन में एक बार इस तीर्थ की वंदना (यात्रा) करना सभी जैन श्रावक-श्राविकाओं के लिए अनिवार्य मानी गई है।

जैन कुल में जन्म लेने के अति महान सौभाग्य से मेरी आस्था एवम् श्रद्धा जिनेंद्र देव के प्रति सदैव रही है।

इस आस्था के प्रति मेरे परिवार (माता-पिता, भाई-बहिन) की स्वधर्म के प्रति भक्ति एवम् श्रद्धापूर्ण दिनचर्या से मुझे अभिप्रेरणा प्राप्त हुई।फलस्वरूप जिनेंद्र देव के सिद्धांतों एवम् उपदेशों को पढ़ना एवम् उन्हें अंगीकार करके उनके अनुरूप आचरण करने की ओर अग्रसर होता चला गया।

सत्य, अहिंसा, दया, अपरिग्रह, सहयोग आदि आवश्यक नियमों का यथाशक्ति पालन करने के पथ पर बढ़ने लगा एवम् समय की अनुकूलता के अनुरूप तीर्थस्थलों की आध्यात्मिक यात्रा (वंदना) समय-समय पर करने लगा। ऐसे में जैन धर्म के सर्वोच्च एवम् तीर्थराज नाम से विश्वविख्यात श्रीसम्मेद शिखर अतिपावन, अद्वितीय, अतिशयकारी, अद्भुत, 20 तीर्थंकरों की मोक्षस्थली पर्वत की यात्रा का स्वप्न संजोने लगा।

सौभाग्य से जीवन के 44 बसन्त बीत जाने पश्चात हाल ही में 21 नवम्बर 2024 को इस सुखद यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ। यह सौभाग्य प्रदान किया जैन धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा, भक्ति एवम् पूर्ण समर्पण भाव रखने वाले जैन संघ के अति समर्पित भावाचार से अनुरंजित नैनवा जैन समाज ने। नैनवा जैन समाज के सान्निध्य में लगभग 500 जैन श्रावक श्राविकाओं के संघ में सामूहिक रूप से यात्रा सम्पन्न हुई।

जयपुर जंक्शन से 22 नवम्बर की रात्रि को ट्रेन द्वारा यात्रा की शुरुआत हुई। लगभग 22 घण्टे की ट्रेन यात्रा करने के पश्चात 23 नवम्बर की अर्कोद्धरात्रि मैं अपने परिवार (पत्नी, दो पुत्रों) मित्रों एवम् सहधर्मी बंधुओं के साथ हम सभी श्रीसम्मेद शिखर तेरा पंथी धर्मशाला में पहुँचे जहाँ रात्रि विश्राम किया।

24 नवम्बर की सुबह नित्य कार्य से निवृत्त होकर उसी स्थान पर धरातलीय छोटे, बड़े, विशाल, भव्य एवम् अद्भुत एक दर्जन से अधिक जिनालयों एवम् अनेकानेक ससंघ विराजमान जैन मुनियों (साधु-साध्वियों) के दर्शन लाभ प्राप्त किये। इस दिन पूरा समय वहीँ व्यतीत किया।

अगले दिन 25 नवम्बर को श्रीसम्मेद शिखर पर्वत की वंदना (यात्रा) की समस्त पूर्व तैयारियां 24 नवम्बर को हो गईं। 

सम्पूर्ण पर्वत की यात्रा की सीमा लगभग 28 से 30 किलोमीटर थी। जिसे पैदल चलकर दुर्गम पहाड़ी चढ़ाई के साथ पूर्ण किया जाना था ।

इस यात्रा में सबसे अचंभित बात यदि कोई थी तो यह कि बच्चे, जवान एवम् बूढ़े (आयु 5 वर्ष से 70 +) के सभी यात्री शामिल थे। जिनमें इस यात्रा को पूरा करने का अदम्य साहस प्रस्फुटित हो रहा था।

जो शारीरिक क्षमता खो चुके थे उनके लिए डोली (पालकी) से यात्रा पूरी किये जाने की सुविधा लिये श्रवण कुमार (श्रमिक जो अपने कंधों पर पालकी लादकर यात्रा करवाने का कार्य करते हैं) उपलब्ध थे।

24 नवम्बर 2024 मध्य रात्रि पश्चात तकरीबन रात्रि 2 : 30 बजे मैंने टॉर्च की रोशनी का सहारा लेकर अपने परिवार (पत्नी एवम् दो पुत्रों) एवम् सहधर्मी सहचरों के साथ यात्रा प्रारम्भ की।

सर्वप्रथम पर्वत की तलहटी में स्थित क्षेत्ररक्षक देव क्षेत्रपाल बाबा के दर्शन कर यात्रा सफलता के लिए आत्मशक्ति प्रबलता एवम् शारीरिक सामर्थ्य का आशीर्वाद एवम् यात्रा पूर्णता की मन्नत माँगी। क्षेत्रपाल बाबा के चरणों में नारियल अर्पित किया।

णमोकार मंत्र (जैन धर्म के पंच परमेष्ठी को नमस्कार मंत्र) का जाप करते हुए कड़कड़ाती ठंड में पर्वत की दुर्गम चढ़ाई पर अग्रसर होते चले गए। अँधियारी रात में ढलान भरे मार्गों जंगली मार्ग में पहली बार चलना जहाँ बड़ा आनंदित एवम् रोमांचित कर रहा था वहीं एक अंजाना भय मन को डरा भी रहा था।

मगर आस्था एवम् विश्वास की अटूट रस्सिका के सहारे सबके सब बढ़े जा रहे थे। यात्रा मार्ग में साथ चलने वाले डोलिदार (पालकी से यात्रा कराने वाले) चल रहे थे। जिस विकट, परिषयपूर्ण (पीड़ादायक) एवम् कड़कड़ाती सर्द हवाओं से ठिठुरा देने वाली सर्दी में मार्ग पर हम स्वयं का बोझ उठाने में असहज महसूस कर रहे थे। उस मार्ग पर अपने कंधों पर यात्री बोझ लेकर चलना कितना पीड़ादायक है यह मैंने प्रत्यक्ष पहली बार महसूस किया।

चलते-चलते कभी रुकना, फिर चलना लक्ष्य था कि गन्धर्व एवम् शीतल नाला (श्रीसम्मेद शिखर पर्वत से निकलने वाले पावन झरना) पार कर जाएं। इसी आस में सबके सब बढ़ते गए एवम् दूर से ही गन्धर्व नाले में बहते निर्मल शीतल जल के बहने की कलकल ध्वनि कानों को ध्वनित करने लगी थी।

ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते जाते त्यों-त्यों झरनों से बहते शीतल जल की कलकल ध्वनि ओर तीव्र होती जाती और शीतल नाला, गन्धर्व नाला (दो पावन झरने जिन्हें इन नामों की संज्ञा दी गई है) पर कुछ पल ठहर कर लगभग 9 किलामीटर पर्वत के घुमावदार मार्ग पर निरन्तर चलने के पश्चात जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर श्री पारसनाथ जैन मंदिर (चोपड़ा कुंड) के दर्शन किये जहाँ जिनेंद्र देव के प्रातः कालीन मस्तकाभिषेक चर्या पूर्ण की गई।

इसी पावन मन्दिर पर कुछ पल प्रथम विश्राम प्राप्त किया। इस भव्य मंदिर के विश्रामस्थल पर सेवार्थ उपस्थित सेवा प्रदाताओं ने गरमागर्म काढ़ा (गुड़, काली मिर्च, अदरख, तुलसी एवम् अन्य जड़ी बूटियों से निर्मित एक प्रकार का पीड़ा एवम् दर्द निवारक औषधीय गर्म पेय) पिलाकर सभी की थकान को दूर किया एवम् आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा प्रदान की।

विश्राम पश्चात पुनः निरंतर बढ़ते-चढ़ते पर्वत के समतल स्थल 24 तीर्थंकरों के गणराज गौतम गणधर जी की चरण स्थली प्रथम टोंक (टोंक से तात्पर्य पहाड़ के ऊपरी समतल शिखर या दर्शन का स्थल) जहाँ तीर्थंकर के मोक्ष धाम पर चरण छतरी मौजूद थी।

इस समय हम धरातल से तकरीबन 1000 मीटर की ऊंचाई एवम् 9 किलोमीटर की लंबी चढ़ाई पार चुके थे। जहाँ से जमीन का कोई छोर नजर आना सम्भव नहीं था। पहली बार धरातल से इतना ऊपर उठे थे हम।

चारों ओर विशालतम सुरम्य मनमोहक पहाड़ी श्रंखलाओं में घनघोर आच्छादित अनेकानेक प्रकार की वनस्पतियों के बीच जो घिरे थे हम।

कभी चढ़ाई, कभी ढलान, कभी दुर्गम रास्ते तो कभी भयानक विकट मोड से गुजरते हुए रुकते-चलते, चलते-ठहरते क्रमशः जैन धर्म के 17वें, 21वें, 18वें, 19वें, 11वें, 9वें, 6ठवें, 2वें तीर्थंकर प्रभु कुंथुनाथ, नमिनाथ, अरहनाथ, मल्लीनाथ, श्रेयासनाथ, पुष्पदंत नाथ, पदम् प्रभु, मुनिसुव्रतनाथ मोक्षस्थली होते हुए हम जैन धर्म के 8वें तीर्थंकर चन्द्र प्रभु के उन्नत शिखर (धरातल से 1350 मीटर लगभग 4430 फिट ऊँचाई) पर प्रातः 9 :15  पहुँचे। यहाँ प्रकृति की अद्वितीय अद्भुत सौन्दर्यता बरबस ही मन को मोहित कर देने वाली थी। आसमान के बादल हमसे कुछ ही ऊंचाई पर नजर आ रहे थे।

ऐसा लग रहा था कि हमने स्वर्ग को छू लिया है। ऐसा अद्भुत मनोहारी दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा था जिसका वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है। यह वह स्थल है जहाँ पहुँचकर सम्पूर्ण यात्रा का अर्द्धभाग पूर्ण होता है। यहॉं से ठीक विपरीत दिशा में अंतिम मोक्षस्थली 23वें तीर्थंकर श्री पारसनाथ भगवान की मोक्षस्थली पर्वत शिखर (यात्रा पूर्णता स्थल) पर इतनी ही दूर और तय करना शेष थी, जो एक सूक्ष्म बिंदु के समान धुंधली सी आकृति के रूप में दिखाई दे रही थी। जिस तरह धरती से आसमान में चमकने वाले विशालकाय तारे अति सूक्ष्म दिखाई पड़ते है उसी तरह श्वेत धवल मन्दिर का शिखर दिखाई पड़ रहा था। आते जाते सैंकड़ों भक्तों की कतारें यात्रा मार्ग को सुशोभित कर रहे थे।

कुछ समय यहॉं रुककर फिर कदम बढ़ चले आगे की ओर। यह अभी यात्रा का मध्य पडाव ही पूरा हुआ था।

यहाँ से हमें इतना ही और चलना एवम् उतरना था जितना चलकर आये थे। सांस फूलने लगी थी पैरों में दर्द और कम्पन होने लगे थे।

बच्चे बार-बार कहने को मजबूर थे - अभी और कितना चलना है? और! हम बार-बार उनको हिम्मत देते हुए बस आ ही गये थोड़ा और चलना है की दिलासा देकर उनको आगे बढ़ाते चल रहे थे।

कभी वो आगे निकल जाते तो, कभी पीछे रह जाते।

मगर एक आस्था, एक अजीबो गरीब आत्मशक्ति हमें थामे हुई थी।

और! हम हौसले के साथ बढ़ते गए चलते गए। प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव, 10वें शीतलनाथ, 14वें अनन्तनाथ, 3सरे सम्भव नाथ, 12वें वासुपूज्य, 4थे अभिनन्दन प्रभु तीर्थंकरों की वंदना करना आत्मिक सुखानुभूति प्रदान कर रहा था। सबकी निगाह थी जल्दी से भव्य एवम् विशाल जल मन्दिर के दर्शन हो जाएं एवम् कुछ देर विश्राम प्राप्त हो। अक्सर यहाँ डोली (पालकी) उठाने वाले चावल-दाल के भोज से अपनी क्षुधा को शांत करते हैं।

रास्ते के विहंगम दृश्यों ने हमारी थकान एवम् शारीरिक पीड़ा को कुछ कम किया तो दूसरी ओर जंगल के प्राणियों में सबसे चंचल स्वभाव वाले लाल मुंह के बंदरो की अठखेलियों ने बच्चों, बूढों और जवानों सभी का मनोरंजन भी खूब किया। फिर बढ़ चले कदम आगे और क्रमशः भगवान धर्मनाथ, सुमतिनाथ, शीतलनाथ, महावीर स्वामी, सुपार्श्वनाथ, विमलनाथ, अजितनाथ, नेमिनाथ के चरण कमलों की भक्तिपूर्ण अर्चना करके लगभग दोपहर बाद 1:45 बजे अंतिम मोक्षस्थली 23वें तीर्थंकर भगवान पारसनाथ जिनालय पर पहुँचकर यात्रा पूर्ण करके आत्म सुखानुभूति प्राप्त की।

जिनेंद्र देव की स्तुति की, उन्हें धन्यवाद किया।

यहाँ के जिनालय की भव्यता एवम् विशालता सबका मन मोह रही थी।

यह यात्रा मेरे जीवन की प्रथम श्रीसम्मेद शिखर यात्रा थी, जो मुझे अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक याद रहेगी।

आज भी यात्रा के वृत्तांत मन को आनन्दित कर देते हैं।

सामूहिक यात्रा का यह प्रथम अवसर मेरे लिए बहुत ही आनंददायक रहा।

मैं कोटि कोटि नमन करता हूँ यात्रा समिति के उन सभी कर्णधारों को जिन्होंने सभी यात्रियों के खाने, पीने, ठहरने की समुचित व्यवस्थाएं प्रदान करने में दिन रात पूरी ऊर्जा लगाकर प्रत्येक यात्री को अपनी निस्वार्थ सेवाएं प्रदान कीं एवम् इतने विशाल समूह में श्रीसम्मेद शिखर वंदना को पूर्ण करने में सहयोग प्रदान किया।

चित्रदीर्घा 









सूचना स्रोत

सन्दीप कुमार जैन

ग्राम पोस्ट ककोड, तहसील उनियारा 

जिला टोंक (राज )

m .9214873968


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