भूमिका
बचपन जीवन की नींव है, एक ऐसा चरण जहाँ जिज्ञासा, सपने और असीम कल्पनाएँ अपने चरम पर होती हैं। यही वह समय होता है जब एक बच्चा संसार को खोजता है, जीवन के हर पहलू—विज्ञान, कला, भावनाओं और महत्वाकांक्षाओं—को स्पर्श करता है और अपने भविष्य की आधारशिला रखता है। लब्धप्रतिष्ठ कवि श्योराज जी की प्रस्तुत कविता बचपन के महत्व को उजागर करती है और आश्चर्य से भरा वह समय दर्शाती है जहाँ नन्हे मन संभावनाओं को बुनते हैं और आगे के सफर की तैयारी करते हैं। मासूमियत और खोज से भरी इन पंक्तियों के माध्यम से यह कविता दर्शाती है कि कैसे हर विचार, हर सपना और हर प्रश्न जीवन की यात्रा को आकार देता है।
चौपाई छंद
बचपन
बचपन में देखे जो सपने
सब लगते थे तब वो अपने।
बोझ नहीं था दिल पर इतना
आज पड़ा है सिर पर जितना।
खेल खेल में पढ़ते जाना
आगे बढ़ना मौज उड़ाना।
दोस्तों संग खुशी मनाना
मन में था जो करते जाना।
मनभावन सब करना यहां तक कि चीखना चिल्लाना भीदादी कहती रोज कहानी
जो लगती थी हमें सुहानी।
दादा का प्यारा था पोता
लगता उनको हरियल तोता।
बचपन संघर्षों में बीता
कहलाया है वो ही चीता।
सब कुछ हमें सिखाता बचपन
सपने नये दिखाता बचपन।
रचनाकार
श्योराज बम्बेरवाल 'सेवक'
मालपुरा






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