भूमिका
जीवन की राहों में जब सहारा छूट जाता है, तो मन असमंजस में पड़ जाता है—क्या हम अकेले चल पाएंगे? यह कविता 'थामी नहीं अंगुलियाँ' उसी संघर्ष, आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की कहानी कहती है। यह उन लम्हों को उजागर करती है जब किसी ने हमारा हाथ नहीं थामा, लेकिन हमने खुद को संभालना सीखा। यह सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि एक प्रेरणा है कि कठिनाइयों के बीच भी हम अपनी राह खुद बना सकते हैं।
यह रचना हर उस व्यक्ति के जज़्बे को सलाम करती है, जिसने बिना किसी सहारे के भी अपनी मंज़िल तक पहुँचने का साहस दिखाया।
कविता 'थामी नहीं अंगुलियाँ'
चढ़ी है सीढ़ियाँ
जितनी भी मैंने, अपने ही दम
अवरोधों ने ठेला है मुझको चोटिल हुई बार - बार
कभी छटपटाई, चोटों को सहलाया
आँखों को भिगोया
चोटों पर दुःख पाया
उठकर सहलाए हैं
खुद अपने घाव
कदमों को अपने बना बैसाखी
खुद ही खड़ी हुई
जहाँ हूँ, जितनी भी हूँ
अपने दम से हूँ
थामी नहीं अंगुलियाँ
किसी की मैंने।
हर सफलता पर मेरी
काटी गई चिकोटी
हुए हैं नाजायज हमले
मुझ पर, अनेक बार
तर्क - कुतर्क के
फेंककर पत्थर
आहत किया गया मुझे
आक्रोशित हुई कई बार
मन - मस्तिष्क क्रोधित भी हुआ
विरक्ति का भाव उपजा
हौसले के बल
फिर- फिर खड़ी हुई
जहाँ हूँ, जितनी भी हूँ
अपने दम से हूँ
थामी नहीं अंगुलियाँ
किसी की मैंने।
देकर मानसिक चोट
जब - तब किया अनर्थक प्रयास
मुझे निष्क्रिय बनाने का
नाम ओ निशान मिटाने का
मन की दीवारों को
मेरी गिराने का
जमीन से मगर जुड़े रहे कदम
बन्द दरवाजों को
दम अपने ठेला है मैंने
कठोर परिश्रम से
तब कहीं जाकर
विचारों की उड़ान भरी है
जहाँ हूँ, जितना भी हूँ
अपने दम से हूँ
थामी नहीं अंगुलियाँ
किसी की मैंने
रचनाकार
डॉ. लता अग्रवाल 'तुलजा '
भोपाल (मध्य प्रदेश)
प्रस्तुति




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