भूमिका
जीवन में जब भी कोई ध्येय निश्चित कर काम आरंभ होता है तो ईश्वर की कृपा तो मानो बरसती है। एक ऐसी ही सहयोगी प्रकृति की मानव संपदा सोनिया सिंह जी (संपादिका, उलझन सुलझन, सहारनपुर, लेडीज विंग) की रचना यहां पर प्रस्तुत की जा रही है जो सहारनपुर में हमारी गतिविधियों का महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
कविता 'हमारा मन'
हमारा मन भी ना.… हजारों चाहतें रखता है...
एक पल में यह आसमान छू लेना चाहता है
और! अगले ही पल यह सागर की गहराई को नाप लेता है...
विचारशील मनकभी तितलियों से रंग चाहिए इसको, तो कभी भंवरों सी उमंग...
इसमें झील का ठहराव भी है और नदी का वेग भी...
कभी लहरों की तरंग लुभाती है इसे, तो कभी हवाओं की महक...
कभी जेठ की दुपहरी की तपिश भी सताती नहीं इसे,
और कभी बारिश की एक बूंद को तरस जाता है ये...
प्राकृतिक विसंगतियांकभी सारे रिश्ते इसे खोखले-बेमतलब से लगते हैं
और
कभी एक ही शख्स में इसे सारे रिश्ते दिख जाते हैं...
हमारा मन भी ना... गजब मिट्टी का बना है...
हंसने के लिए इसे हुज़ूम चाहिए
और
रोने के लिए बस एक कंधा ही काफी है...
भावनाओं के आवेगसुना है मन, सबसे तेज दौड़ता है,
सबसे जल्दी बदलता है,
सेकेंडों में फिसलता है,
गतिमान मनलगने को तो सुनसान वीराने में भी लग जाये,
और
उकताने पर आये तो दुनिया की तमामतर शोखियों से भी उकता जाये....
हंसी-ठिठोली के बीच में भी,
यह कभी-कभी खुद को तन्हा पाता है...
और! कभी-कभी तन्हाइयों में भी, यह जश्न मनाता है...
यानि मन वैरागी भी है और अनुरागी भी...
मन मनमौजी भी है और हठयोगी भी...
मन उन्मादी भी है और मन कर्मयोगी भी...
अभिमानी भी मन ही है और स्वाभिमानी भी...
मन ही कायर भी है और सूरमा भी...
मन हजारों ख्वाहिशों को दबा लेता है
और कभी मासूम बच्चे की तरह छोटी सी हसरत पर मचल जाता है...
यानि सारा खेल ही मन का रचा है,
मन ऐसा रज़ाकार है जो अनेकानेक रूप दिखाता है,
अपनों को पराया तो परायों को अपना भी बना लेता है...
इसके आगे ना दुनियादारी ठहरे, ना ही रिश्तेदारी...
ना रस्मो रिवाज इसे बांध सके, ना ही समझदारी...
ना हुज्जतबाज़ी समझ आये इसे, ना ही सौदेबाज़ी...
ना ये नफा देखे ना ही नुकसान...
कभी मस्त मलंग तो कभी एकदम वीरान....
रचनाकार
© सोनिया सिंह 'जागृति'✍️ (संपादिका)
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
सहारनपुर










सच में मन बहुरूप है रचनाकार ने इसे बहुत अच्छे से कविता में पिरोया है।
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