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एक नैसर्गिक हस्ती श्री मधुसूदन शर्मा जी

भूमिका

यद्यपि यह यकीन नहीं होता लेकिन एक मानव संपदा उतनी भी दिल और मन से शुद्ध हो सकती है जितना कि एक नवजात शिशु। वह बिना किसी छल-कपट के, स्वाभाविक रूप से प्रेम, करुणा और सच्चाई से परिपूर्ण हो सकती है। ऐसा व्यक्ति जीवन को पूरी सहजता और प्राकृतिक रूप से जीता है, जहाँ न तो कोई दिखावा होता है और न ही किसी प्रकार की बनावट। वह हर परिस्थिति को उसी रूप में स्वीकार करता है जैसे प्रकृति उसे प्रस्तुत करती है, और अपने विचारों व कर्मों में पूरी ईमानदारी रखता है। प्रस्तुत साक्षात्कार नमूना है एक ऐसे ही इंसान का।

परिचय

मानव जीवन अद्‌भुत है उनके लिए जो समग्र जीवन शुद्ध अन्तःकरण के साथ व्यतीत करते हैं। साथियो। आज एक ऐसी ही हस्ती से मुलाकात करते हैं। श्री मधुसूदन शर्मा जी शुद्ध अन्तःकरण की एक ऐसी शख्सियत हैं जो किसी की भी मदद कर उल्लास से स्वतः ही भर उठते हैं। शायद यही कारण है कि उनका परिवार निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। जीवन में शिष्टाचार की भूमिका को समझने वाले समस्त आयु वर्गों में सहज भाव से घुलमिल जाने वाले इस सज्जन महानुभाव से आइये आज मुलाकात करते हैं।

               कचहरी के प्रशासनिक अमले में सम्मिलित शख्सियत
बातचीत

प्रश्न १. सर, आपका जीवन को लेकर क्या नजरिया है?
उत्तर - "जीवन परमपिता परमात्मा की मानव को अद्भुत देन है। इसको संरक्षित करके जीवन को विशेषतायुक्त बना लेना पूजा ही की श्रेणी में आता है। अवगुणों को जानसमझकर उन पर काबू पाना भी इसी श्रेणी का प्रयास है। परमपिता परमात्मा का स्मरण सदैव करते हुए मानव मात्र को सदैव उनका कृतज्ञ होना चाहिए। जीवन का फलसफा यही है कि सभी आयु वर्गों, धर्मों, जातियों व नस्लों में प्रेम भाव हो और एकात्मकता का भाव हो। यही मेरा जीवन नजरिया है।
प्रेम से भगवान भी वश में हो जाते हैं जैसे कि मीरा ने परमपिता परमात्मा के प्रति भाव अपने प्रेम के ही व्यक्त किए हैं।"

प्रश्न 2. आपकी आयु आज ९४ वर्ष हो चुकी है। आपके परिजनों में अलग अलग आयु के लोग हैं। क्या आप सभी को अपनी बात समझा और उनकी बातें समझ पाते हैं? 
उत्तर - "मेरा मानना है कि कम बोलना अर्थात् मितभाषी होना ही सर्वोत्तम विकल्प है। प्रेमानुभूति से उत्तम कुछ भी नहीं मितभाषी होते हुए प्रेम और अनुराग से तमाम विषम स्थितियों को काबू किया जा सकता है। जीवन में सबको समझना और सबको समझाना ही श्रेष्ठतम स्थिति है जिसमें मितभाषी होकर सब कुछ पाया जा सकना संभव है।"

प्रश्न ३. मानवीय नीयत को लेकर जीवन की कोई घटना आपको यदि ध्यान में आती हो तो बतलाएं?
उत्तर - "मेरठ में एक कलेक्टर टी जॉर्ज जोसेफ की नियुक्ति हुई। शासन हित को लेकर उनसे वार्ता होती रहती थी जिससे वो मेरे शासन हितकारी सुझावों को वरीयता देने लगे तथा चीजों को समझने भी लगे। मेरा मानना है कि किसी भी विषय को लेकर ऐसी नीयत ना रखें कि किसी को दुःख की या कष्ट की अनुभूति हो। ना जाने कितने मामलों में मैंने अपने स्तर से ही चीजों को नियमित करने का प्रयास किया। 

प्रश्न 4. जीवन में अपनों से विछोह होने के बावजूद भी कैसे स्वयं को संभालें? 
उत्तर - "जीवन अनमोल है इसको यदि हम जान और समझ लें तो  हम अपने को संभाल भी सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों को जीवन मंत्र भी दे सकते हैं ताकि प्रभुलीला के विछोह पक्ष भावी पीढ़ियां भी निष्प्रभावी  रहें। विछोह नियमित जीवन-मरण प्रक्रिया का अंग है जिसको समझकर उसके हानिकर पक्ष से बचते हुए स्वस्थ रहा जा सकता है।
सूचना स्रोत
श्री मधुसूदन शर्मा जी

प्रस्तुति






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