भूमिका
बुद्धि और कल्पना की शक्ति से मनुष्य ने कभी का असंभव संभव कर दिखाया। उसी रचनात्मकता का एक अद्भुत परिणाम है कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जिसे वास्तविक बुद्धि ने जन्म दिया। परंतु कुछ प्रश्न खड़े हुए कि
"क्या यह सृजन अपने सृजनकर्ता से श्रेष्ठ हो सकता है? क्या मशीनें मनुष्य की संवेदनाओं, भावनाओं और मौलिक चिंतन को पार कर सकती हैं?"
'विवेक/ज्ञान' कविता उत्तराखंड के प्रख्यात कवि कृष्णदत्त शर्मा कृष्ण की उस जिज्ञासा और सत्य की खोज को दर्शाती है, जिसमें उन्होंने वास्तविक और कृत्रिम बुद्धि के मध्य के अंतर को स्पष्ट करने का यथासंभव प्रयास किया है। अपने शब्दों के माध्यम से वह जनता को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि कृत्रिम बुद्धिमता केवल मानव बुद्धि की छाया है, न कि उसका विकल्प। यह कविता मनुष्य की मौलिकता, संवेदनशीलता और अद्वितीय सोच को रेखांकित करते हुए इस सत्य को स्थापित करती है कि कृत्रिमता कभी वास्तविकता से ऊपर नहीं हो सकती।
कविता
ईश्वर ने मानव बुद्धि में भरा ज्ञान का है भण्डारा।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।
जन्मजात ही मानव अपनी बुद्धि अपने संग लाता है।
किन्तु अपनी बुद्धि को वो प्राप्त ज्ञान से भर पाता है।
ज्ञान सभी को ईश्वर देते पर सोया कुछ इसको रखते।
किन्तु कुछ जाग्रत इसे कर एक अमोली सा रस चखते।
बिना ज्ञान के मानव जग में फिरता रहता मारा-मारा।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।।१।।
कृत्रिम बुद्धिमता ने किन्तु आज जगत में डेरा डाला।
जो विवेक हमने पाया था उस पर ही है घेरा डाला।
कृत्रिम बुद्धि को भी हमने अपने ज्ञान ध्यान से पाया।
फिर भी मानव कृत्रिमता के पीछे दौड़ दौड़ हर्षाया।
मूल ज्ञान बिन कृत्रिमता को मिल नहीं सकता कहीं किनारा।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।।२।।
कृत्रिम बुद्धि भी तो जग में रूप एक है मात्र ज्ञान का।
इससे महत्व कहाँ कम होगा उस ईश्वर के दिये ज्ञान का।
कृत्रिमता तो कृत्रिम होती ये जग को धोखा दे सकती।
भले सबल हो जाये कितना जगह ज्ञान की नहीं ले सकती।
कृत्रिमता पर अधिक न रीझो कहीं डुबो ना दे मँझ धारा।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।।३।।
कृत्रिम भाव कभी मानव के नहीं किसी को जग में भाये।
कृत्रिम भावों को लम्पटता सदा सुधिजन कहते पाये।
कितने आविष्कार हुए हैं ये भी आविष्कार मात्र है।
स्वयं ज्ञान की दिखलाई ये एक नवल सी राह मात्र है।
कृत्रिमता को अपनाओ पर नहीं बनाओ इसे सहारा।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।।४।।
कृत्रिमता से फिर भी जग में कोई अछूता नहीं दीखता।
कोई कृत्रिम भाव समेटे मानव जग में दिखा रीझता।
आत्मविश्वास जब भी खोता है बुद्धि को पहले हर लेता।
फिर तो उसको अपने रंग में कोई भी आकर रँग लेता।
सदा करो उपयोग ज्ञान का नहीं बनाओ इसे नकारा।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।।५।।
कृत्रिमता की विधा देश में पहले से अपनाते आये।
कृत्रिम खलबच्चा निर्मित कर गायें भैंस दूहते पाये।
कृत्रिमता का ज्ञान जगत को भारत ने ही सिखलाया है।
दूर विदेशों में भारत से प्रेरित हो ये अपनाया है।
ज्ञान बिखेरा भारत ने ही पूर्ण विश्व में सबसे न्यारा।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।।६।।
कृत्रिम बुद्धि कुछ नहीं होती बुद्धि तो बुद्धि होती है।
ज्ञान और बुद्धि से ही तो मानव की शुद्धि होती है।
ए.आई. का शोर मचा है मानो ज्ञान मनुज का खोया।
प्रकृति को जब-जब छेड़ा मानव शीश पकड़कर रोया।
कृत्रिम हो निर्माण कोई भी मिला ज्ञान के आगे हारा।।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।।७।।
कृत्रिम सुन्दरता के पीछे मानव देखा दौड़ लगाता।
लेकिन असली सुन्दरता लख मानव खुद ही दिखा लजाता।
मूल रूप में बुद्धि के तो कृत्रिम बुद्धि नहीं आ सकती।
कृत्रिम बुद्धि गीता जैसे अमर बोल भी नहीं गा सकती।
कृत्रिम स्वर्ण हिरन जैसा ही खोल यह मानव ने धारा।
सदा ज्ञान के संबल से ही चलता आया ये जग सारा।।८।।
रचयिता
कृष्णदत्त शर्मा 'कृष्ण'
प्रस्तुति


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