सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

स्वतंत्रता के लिए अपनी संपूर्ण आत्मा को समर्पित करने वाला योद्धा का झंडा गीत

झंडा गीत 


प्राण मित्रों भले ही गंवाना, पर न झंडा यह नीचे झुकाना।
तीन रंगा है झंडा हमारा, बीच चरखा चमकता सितारा।
शान है ये ही इज्जत हमारी, सिर झुकाती इसे हिंद सारी।
इस पर सब कुछ खुशी से चढ़ाना।
पर न झंडा ये नीचे झुकाना।
ये है आजादपन की निशानी, इसके पीछे हैं लाखों कहानी।
जिंदादिल ही हैं इसको उठाते मर्द हैं इस पै सर तक चढ़ाते।
तुम भी सारी मुसीबत उठाना।
पर न झंडा ये नीचे झुकाना।
रे! क्या भूले हो जलियांवाला, या वो डायर का इतिहास काला।
गोलियों की लगी ज़ब झड़ी थी, नींव आजादी की तब पड़ी थी।।
याद हो गर वो खूं में नहाना।
तो न झंडा ये नीचे झुकाना।।
उसने तो था न क्या जुल्म ढाया, पेट के बल पै हमको चलाया।
कोसों बच्चों को पैदल भगाया, माओं-बहनों को घर-घर रुलाया।।
याद है तुम्हें जो वह फसाना।
तो न झंडा ये नीचे झुकाना।
और अब भी न क्या हो रहा है, कौन सुख की नींद में सो रहा है।
लोग पाते न भर पेट खाना, सच्च बोलो तो है जेलखाना।।
है इसी से छिड़ा यह तराना।
होना आजाद या मिट ही जाना।।
पर यह कर लो अहद मर मिटेंगे, पर न इस व्रत से तिल भर हटेंगे।
कुछ हो यह मुल्क आजाद होगा, उजड़ गुलशन ये आबाद होगा।।
गायेंगे आज सब ये गाना।
हिन्द होगा, न अब जेल खाना।।
झंडा यह हर किले पर चढ़ेगा, इसका दल रोज दूना बढ़ेगा।
तीरो तलवार बेकार होंगे, सोने वाले भी बेदार होंगे।।
सब कहेंगे कि सर है कटाना। 
पर न झंडा ये नीचे झुकाना।।
शांत हथियार होंगे, पर वे तोड़ेंगे अरि के दुधारे।
पर भला हो जो अंग्रेज जागे, लोभ हिन्दी हुकुमत को त्यागे।।
वरना बदला है क्या यह ठिकाना।
उनसे बदलेगा सारा जमाना।
हे प्रभो! शक्ति दो वीर हों हम, टेक रक्खेंगे सर्वस्व खो हम।।
हम ही क्या, कह उठे सब जमाना, दूध देखो न माँ का लजाना।।
प्राण अपने भले ही गंवाना।
पर न झंडा ये नीचे झुकाना।

रचनाकार
विजय सिंह 'पथिक'  
(स्वतंत्रता के लिए  अपनी  संपूर्ण आत्मा को समर्पित करने वाला योद्धा।)

गीत को अंगीकृत किए जाने का विवरण

26 जनवरी 1930 को समस्त देश में स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा लेने का दिवस मनाया गया था। उस दिन भारत ने एक स्वर से घोषित किया था कि हम देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं। उस अवसर पर स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा लेते समय झंडाभिवादन गान जो सर्वत्र गाया गया, वह विजय सिंह 'पथिक' जी की ही रचना थी।

उस समय विजय सिंह 'पथिक' जी की यह चिरस्मरणीय पंक्तियाँ लाखों करोड़ों भारतीयों के गले से निकलकर भारत मे सर्वत्र गाई गई थीं। उसके बाद यह समस्त देश में कांग्रेस के कार्यक्रमों में गाया जाने लगा था। हमारे देश में सबसे पहला 'झंडा गीत' देने का श्रेय विजय सिंह 'पथिक' जी को ही जाता है।

31 दिसंबर 1929 को रात में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के लाहौर सत्र में विचार किया गया था, जिसके लिए एक बैठक आयोजित की गई थी। यह बैठक पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्‍यक्षता में आयोजि‍त की गई थी। इसी बैठक में हिस्सा लेने वाले लोगों ने पहले 26 जनवरी को 'स्‍वतंत्रता दिवस' के रूप में मनाने की शपथ ली थी, जिससे कि ब्रिटिश राज से पूर्ण स्‍वतंत्रता के सपने को साकार किया जा सके। 

26 जनवरी 1930 को पं. जवाहरलाल नेहरू के द्वारा लाहौर में रावी नदी के किनारे देश का झंडा फहराया गया और 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस मनाने की शपथ ली गई थी। इसके लिए सभी क्रांतिकारियों और पार्टियों ने एकजुटता दिखाई थी। 18 वर्ष तक इसी दिन स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता रहा।

26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव लागू होने की तिथि को महत्व देने के लिए ही 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू किया गया था। इसके बाद 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस घोषित किया गया।

प्रेषक
श्री भगवान दास एवं सचिन राठी जी
गंगोह

प्रस्तुति


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...