भूमिका
साथियो! हमारा भारत विशाल होने के साथ-साथ अपने में कुछ अद्भुत विविधताएं समाहित किए हुए है। यदि नकारात्मकता को त्यागकर कुछ मौलिक प्रयास किए जाएं तो यह पर्यटकों के आकर्षण का अद्भुत केंद्र बन जाएगा। आइए जानते हैं कि एक राज्य राजस्थान में कितनी विविधता द्रष्टव्य होती है।
विवरण
भारत न केवल अपने खूबसूरत नजारों के लिए जाना जाता है, बल्कि अनोखी और अनूठी प्रथाओं और संस्कृति के कारण भी। इस देश का राजस्थान राज्य जहां नारी जन्म को लेकर बेरुखा दिखने के लिए कुख्यात है तो यहीं पर देवमाली गांव को प्राकृतिक और नैसर्गिक रखने का और किसी बच्ची के जन्मने पर १११ वृक्ष रोपित करने जैसा संकल्पों को करने और उनको प्राणपण से निभाने वाले लोग भी। यहां ऐसी अनोखी और अनूठी जगहें स्थित हैं, जिनकी वजह से राज्य के साथ साथ देश भर को विश्व में जाना जाता है। हर अनोखे स्थान की अपनी अनूठी कहानी है। राजस्थान में एक पिपलांत्री नामक गांव है, जहां कन्याओं के जन्मने पर ढोल नगाड़े बजाए जाते हैं। इतना ही नहीं प्रकृति का आभार व्यक्त करते हुए हर्ष और उल्लास के साथ यहां १११ पौधे भी रोपे जाते हैं।
ऐसा ऐसे हुआ
इस प्रथा की शुरुआत गांव के सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल की एक बच्ची की मौत के साथ हुई।
पूर्व स्थिति
संगमरमर के अत्यधिक खनन के कारण यह क्षेत्र कभी पानी की कमी और वनों की कटाई से प्रभावित था। अतः स्थिति से निपटने के लिए श्याम सुंदर पालीवाल के नेतृत्व स्थानीय समुदाय ने कन्याओं के जन्मने पर १११ वृक्ष रोपने की परम्परा शुरू की, जिसका बाद में अनुसरण किया जाने लगा। इसने महिलाओं के खिलाफ सामाजिक पूर्वाग्रहों को कम करने के प्रयासों को भी सकारात्मक गति दी।
वर्तमान स्थिति
इस ग्रामीण क्षेत्र में अब तक चालीस लाख से अधिक वृक्ष रोपित किए जा चुके हैं, जिससे भूजल स्तर लगभग आठ सौ-नौ सौ फुट ऊपर उठा है और जलवायु में तीन-चार डिग्री तक शीतलता महसूस की गई है। साथ ही स्थानीय जैव विविधता में भी सुधार आया है। वहीं, कन्या भ्रूण हत्या जैसी घटनाओं में भी यह प्रयास कमी लाने में कारगर साबित हो रहा है।
परिणाम
देशी प्रजातियों के वृक्षारोपण ने स्थानीय स्तर पर रोजगार भी उत्पन्न किए हैं, खासकर महिलाओं के लिए काम उपलब्ध कराया है।
उच्चतम न्यायालय ने भी की प्रशंसा
एक मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि भारत में हजारों समुदाय-संरक्षित वन हैं जिन्हें पवित्र वन कहा जाता है। व्यापक नीति के तहत पर्यावरण मंत्रालय को प्रत्येक राज्य में पवित्र वनों के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के लिए एक योजना विकसित करनी चाहिए और सर्वेक्षण में उनके क्षेत्र, स्थान और सीमा की पहचान होनी चाहिए। वहीं कृषि गतिविधियों, मानव निवास, वनों की कटाई या अन्य कारणों से इसके आकार में कोई कमी न आने देना सुनिश्चित करना चाहिए। पीठ ने कहा कि राजस्थान के पिपलांत्री गांव जैसे मॉडल दर्शाते हैं कि समुदाय संचालित पहल किस तरह सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने में कारगर साबित हो सकती है। यह मॉडल पूरे देश में लागू किए जाने की जरूरत है। राष्ट्रीय वन नीति, 1988 का उल्लेख करते हुए पीठ ने बताया कि यह वनों में प्रथागत अधिकार रखने वाले लोगों को वन पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा और सुधार में मदद के लिए प्रोत्साहित करने के महत्व को रेखांकित करती है, क्योंकि वे अपनी जरूरतों के लिए इन वनों पर निर्भर हैं।
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