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विश्वविद्यालय परिसर में अशोक स्तंभ की प्रतिकृति की स्थापना की मांग पर कुलपति ने दी स्वीकृति (अतीत से)

 भूमिका

आज अतीत के एक घटनाक्रम का उल्लेख यदि किया जा रहा है तो उसके मूल में कुछ स्पष्ट कर देना है। दरअसल जनपद मेरठ के एक संगठन के एक प्रयास को लेकर श्रेय जब किसी अन्य के द्वारा लिया गया तो उस संगठन के लोगों से कहा गया कि प्रयास यदि तुम्हारा था तो श्रेय आपके द्वारा क्लेम क्यों नहीं किया गया? उस संगठन के सदस्यों ने उस घटनाक्रम का विवरण अपनी मंशा बताने के ध्येय से देने का निश्चय किया और अंत में श्रेय ना लेने का फायदा संगठन को क्या हुआ यह भी स्पष्ट किया गया है।

विवरण

उत्तर प्रदेश के मेरठ के एक संगठन ने जनपद स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के गेट के निकट परिसर की खाली पड़ी जगह के सदुपयोग को ध्यान में रख पर्याप्त विचार किया। 


         विचारों में डूब तय किया कि क्या करना है विश्वविद्यालय और                     
                  ऐतिहासिक इमारत को कालजयी बनाने के लिए

पर्याप्त मंथन के बाद उसको ऐतिहासिक मेरठ नगर की ऐतिहासिकता की अभिव्यक्ति के रूप में उपयोग में लाने के उद्देश्य से संगठन से संबद्ध मेजर नारायण के निर्देशन में एक मांगपत्र तैयार किया गया। (पत्र प्रेषित दिनांक 29.06.2009)

प्रत्युत्तर विवरण

(आमंत्रण पत्रांक एस.वी.सी./17/2334, दिनांक 13.07.02009 स्पीडपोस्ट संख्या - एस.पी. EU358594385IN, समय - प्रातः दस बजे)


   तय करने के उपरांत एक मांग पत्र तैयार किया और फिर उसको अंतिम रूप 
                       देकर एक प्रतिनिधिमंडल पर विचार किया

मांगपत्र में संगठन के मंतव्य को स्पष्ट किया गया था और बिना किसी भी श्रेय की अपेक्षा किए उस संगठन की भावना से अवगत कराते हुए तत्कालीन कुलपति श्री एस.के. काक से समय लिया गया। समाज के सुयोग्य और सुशिक्षित लोगों का एक प्रतिनिधिमंडल नियत तिथि 19.07.2009 को विश्वविद्यालय परिसर में एकत्र हुआ और नियत समय पर प्रातः दस बजे विश्वविद्यालय के कुलपति श्री एस.के. काक से मिलने पहुंचा और उनके सम्मुख मांगपत्र का वाचन किया। 

                    प्रतिनिधिमंडल के सदस्य बैठक में जाने की तैयारी करते हुए

प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि इस खाली स्थान पर अशोक स्तंभ की एक प्रतिकृति स्थापित की जाए, जो भारतीय इतिहास और संस्कृति का प्रतीक है। 

वह ऐतिहासिक इमारत जिसकी प्रतिकृति प्रतिनिधिमंडल स्थापित कराने को                     उत्सुक था इस इमारत से आगंतुकों को अवगत कराने को

प्रतिनिधिमंडल ने अपनी बात को प्रभावशाली और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि अशोक स्तंभ न केवल भारत के गौरवशाली अतीत को दर्शाता है, बल्कि छात्रों और आगंतुकों को नैतिकता, एकता और धर्म के मूल्यों की भी प्रेरणा देगा। प्रतिनिधिमंडल ने यह भी कहा कि इस खाली स्थान का सदुपयोग विश्वविद्यालय की शैक्षिक और सांस्कृतिक छवि को और निखारेगा।  

                   वार्ता के दौरान मांगपत्र का वाचन करते एक सदस्य

कुलपति ने प्रतिनिधिमंडल की बात को ध्यानपूर्वक सुना और उनके प्रस्तुतिकरण की सराहना की। उन्होंने तुरंत इस प्रस्ताव को स्वीकृति दी और कहा, 

"यह विचार न केवल विश्वविद्यालय के लिए, बल्कि समाज के लिए भी प्रेरणादायक होगा। अशोक स्तंभ की प्रतिकृति स्थापित करना हमारे छात्रों और आगंतुकों के लिए ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शिक्षा का एक उत्कृष्ट स्रोत होगा।"  

कुलपति ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि वे इस परियोजना को जल्द से जल्द प्रारंभ करें और सुनिश्चित करें कि स्तंभ की स्थापना उच्च गुणवत्ता और ऐतिहासिक सटीकता के साथ हो। 

उन्होंने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों के दृष्टिकोण और उनकी रचनात्मक सोच की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की पहल से ही विश्वविद्यालय की समृद्धि और प्रतिष्ठा बढ़ती है।  

प्रतिनिधिमंडल ने कुलपति के इस सकारात्मक रवैये के लिए उनका धन्यवाद किया और इस बात पर खुशी व्यक्त की कि उनकी मांग को तुरंत स्वीकार कर लिया गया। अब विश्वविद्यालय के गेट के पास अशोक स्तंभ की प्रतिकृति स्थापित हो चुकी है, जो न केवल परिसर की शोभा बढ़ा रही है, बल्कि छात्रों और आगंतुकों को भारत की समृद्ध विरासत से जोड़ने का काम भी कर रही है। संगठन का ध्येय पूरा हो गया और श्रेय लेने की अभिलाषा संगठन की नहीं थी। उसका मंतव्य सिर्फ विश्वविद्यालय के गेट के पास की खाली स्थान को उपयोगी बनाना था जो पूरा हो चुका था। पवित्र मन से किए गए इस अभियान का लाभ संगठन को यह मिला कि उसके दो सदस्यों का मनोनयन विश्वविद्यालय की एंटी रैगिंग समिति में लगातार दो वर्ष किया गया। इस सब के लिए कुलपति महोदय को धन्यवाद प्रेषित किया गया।









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