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द्वन्द्वरहित माहौल का निर्माण

भूमिका

समाज में यदि नकारात्मकता व्याप्त है तो ज़रा सी बात भी द्वंद्व का कारण बन सकती है लेकिन मानव संसाधन यदि निभाऊ प्रकृति के हैं तो वो निरंतर द्वंद्वरहित ऐसा मार्ग तलाशने को तत्पर रहते हैं और यकीन मानिए मार्ग मिल भी जाता है। एक ऐसा ही विवरण यहां पर आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है!

द्वन्द्वरहित माहौल का निर्माण

उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद में परीक्षितगढ़ ब्लॉक का सिकंदरपुर ग्राम घरेलू अपशिष्ट की नालियों के पानी को लेकर विवादों में रहता था। ग्राम का प्रत्येक परिवार इस समस्या का निदान खोजने में व्यस्त था तो विविध प्रयासों के मध्य गांव की महिलाओं ने गंभीर प्रयास किया, पहले तो नलों के आगे छोटे-छोटे गड्ढे खोदे और बाद में एक दो से आरम्भ होकर लगभग छह सौ की आबादी वाले गांव के प्रत्येक घर में किचेन गार्डन बन गया और अपशिष्ट जल को प्रबंधित करने की मजबूरी को ही गांव की महिलाओं ने ताकत में बदल दिया। आज गांव की महिलाएं विविध सब्जियां घर के लिए उगाती हैं और पर्याप्त मात्रा में होने पर उत्पादन की अतिरिक्त मात्रा को बाजार में बेच देती हैं। नारीशक्ति का यह प्रयोग भारतीय कहावत 'आम के आम और गुठलियों के दाम' को सही मायने में चरितार्थ कर रहा है।


इसमें कोई दो राय नहीं  कि नारी शक्ति प्रकृति प्रदत्त अपने गुण 'संसाधनों का समुचित संपूर्णता के साथ उपयोग और उपभोग' कैसे किया जाये, उन्हें बेहतरीन तरीके से क्रियान्वित करके अपनी शख्सियत को समय-समय पर परिभाषित और प्रतिष्ठित करती रही है। नारी सदैव हमेशा ही बिगड़ें हुए को संवारना जानती है,बिखरे हुए को समेटना जानती है,घर-परिवार, रिश्ते-संस्कार,मूल्य-प्रतिमान, प्रथा-परंपरा, रीति-रिवाज इत्यादि कैसे नई पीढ़ी में स्थापित करने है शायद उससे बेहतर उक्त कार्य को कोई अन्य कर भी नहीं सकता।जिन समस्याओं और परिस्थितियों में आदमी का दिमाग धीमा पड़ जाता है वहां नारी सहजता के साथ सामंजस्य बिठाकर अपने व्यक्तित्व के नये आयाम गढ़ देती है,दीपक की तरह प्रज्वलित होकर दुनिया और समाज के लिए पथ-प्रदर्शक बन जाती है।इसमें कोई दो राय नहीं कि नारी शक्ति प्रकृति प्रदत्त अपने गुण कि 'संसाधनों का समुचित संपूर्णता के साथ उपयोग और उपभोग' कैसे किया जाये?', उन्हें बेहतरीन तरीके से क्रियान्वित करके अपनी शख्सियत को समय-समय पर परिभाषित और प्रतिष्ठित करती रही है। नारी बिगड़े हुए को सदैव ही संवारना जानती है, बिखरे हुए को समेटना जानती है, घर-परिवार, रिश्ते-संस्कार, मूल्य-प्रतिमान, प्रथा-परंपरा, रीति-रिवाज इत्यादि कैसे नई पीढ़ी में स्थापित करने हैं शायद उससे बेहतर उक्त कार्य को कोई अन्य कर भी नहीं सकता। जिन समस्याओं और परिस्थितियों में आदमी का दिमाग धीमा पड़ जाता है वहां पर नारी सहजता के साथ सामंजस्य बिठाकर अपने व्यक्तित्व के नये आयाम गढ़ देती है। दीपक की तरह प्रज्वलित होकर दुनिया और समाज के लिए पथ-प्रदर्शक बन जाती है।

उसी की एक नज़ीर मेरठ के परीक्षितगढ़ ब्लाक के सिकंदरपुर गांव की महिलाओं ने पेश की है।

सूचना स्रोत आइडिया

अमर उजाला से साभार

संकलनकर्ता 

सोनिया सिंह 'जागृति' (संपादिका)

उलझन सुलझन (लेडीज विंग)

सहारनपुर

प्रस्तुति 






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