भूमिका
प्रस्तुत समाचार दैनिक अमर उजाला से उद्धृत है और हमारे देश की यह विडंबना ही है कि कृषक क्षेत्र से जुड़ी मानव संपदा को परोसे जाने वाले अधिकांश स्टार्टअप अच्छे खासे वित्तीय निवेश वाले होते हैं लेकिन जिस समाचार को आधार बना इस स्पष्टीकरण की यहां पर व्याख्या की जा रही है उसमें नाम मात्र का वित्तीय निवेश सिर्फ साफ सफाई और पैकिंग को लेकर ही है। विचार योग्य यह है कि आखिर कब इस देश की मानव संपदा के लिए ऐसे वित्तरहित स्टार्टअप कब मुहैया होंगे?
अखबारी रिपोर्ट
अमर उजाला के संवाददाता श्री अंकित चौहान की एक रिपोर्ट है कि "ऑनलाइन बिक रहा गन्ना, किसानों को 3500 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा दाम"।
वर्षोंवर्ष से गन्ना और गन्ना मूल्य चर्चा का विषय रहा है जिसके मूल में उसकी संस्तुत राशि, आवंटन क्षेत्र, पर्ची व्यवस्था और भुगतान अवधि रहते हैं। इस व्यवस्था के बरस्क किसानों को गन्ना मिलों से भले ही गन्ने का अधिकतम दाम 370 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा हो। मगर, अब गन्ना ऑनलाइन भी बिक रहा है और वहां दाम भी साढ़े तीन हजार रुपये क्विंटल तक है। किसानों से गन्ना खरीद करने के लिए ऑनलाइन कंपनियों के प्रतिनिधि संपर्क कर रहे हैं जो मीठे व सफेद गन्ने की मांग ज्यादा कर रहे हैं।
यह व्यवस्था कृषकों के लिए आशा की किरण के समान है। और!ऑनलाइन खाद्य सामान बेचने वाली कोई एक नहीं, बल्कि दस से ज्यादा कंपनियों ने गन्ना बेचना शुरू कर दिया है। वह किसानों से गन्ना लेकर उसकी धुलाई व छोटे टुकड़े करके पैकेट में बंद करके बेच रही हैं। किसी कंपनी के एक किलो तो कोई आधा किलो के पैकेट बनाकर बेच रही हैं। इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि एक किलो गन्ने की परियों का पैकेट सबसे कम 35 रुपये में मिल रहा है। इसमें भी अगर गन्ने को छीलने के बाद छोटा-छोटा काटकर पैकेट में बेचा जाता है तो वह 50 रुपये किलो तक है।
यह व्यवस्था ऑनलाइन है लेकिन यही व्यवस्था एक समय कृषकों के लिए नई इबारत लिखेगी और कृषक आज नहीं तो कल ऐसे व्यापार करने में ठीक उसी तरह रुचि दिखाएंगे जिस तरह ग्राम पर्यटन की दिशा में कुछेक कृषक सामने आए हैं।
इस तरह एक क्विंटल की बात करें तो सबसे कम साढ़े तीन हजार रुपये क्विंटल गन्ना ऑनलाइन बिक रहा है। अभी अधिकतर कंपनियां गन्ने को ऑनलाइन दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत, चंडीगढ़, पंचकूला समेत अन्य जगहों पर बेच रही हैं। छोटे शहरों का पिन कोड डालने पर वहां पहुंचाने के लिए मना कर दिया जाता है।
ऑनलाइन बेचने के लिए गन्ने की रसदार, सफेद, नरम प्रजाति को किसानों से कंपनियां खरीद रही हैं। सबसे ज्यादा कोशा-238, 15023, सीओएस- 0118, सीओएसई-14201 की मांग है। इनकी कीमत भी गन्ने को देखकर तय की जाती है। मगर, शुगर मिल के मुकाबले दो से तीन गुना कीमत पर गन्ने की खरीद कंपनी करती हैं।
अधिकारी का वक्तव्य
अमर प्रताप सिंह (जिला गन्ना अधिकारी) के अनुसार,
"कंपनियां अपने स्तर से सीधे किसानों से संपर्क करके गन्ना खरीदती हैं। इसमें विभाग का घहस्तक्षेप नहीं है और वह खुद ही दाम तय करती हैं। किसान सीधे उनको गन्ना बेच सकते हैं।"
उपरोक्त के अतिरिक्त भी गन्ने को लेकर नवाचार हो रहे हैं। गन्ना प्रजनन संस्थान करनाल के वैज्ञानिकों डॉक्टर एम.एल. छाबड़ा तथा डॉक्टर के. हरि ने गन्ने के रस का पाउडर तैयार कर लिया है। इस रस का सेवन छह माह तक किया जा सकता है और यह अपने प्राकृतिक स्वाद के अतिरिक्त लेमन स्वाद में भी उपलब्ध हो सकेगा। ये सब गणना कृषकों के लिए शुभ संकेत हैं तो चीनी मिलों के समक्ष कोई अन्य विकल्प ना होने के कारण खतरे की घंटी।
संस्थान में प्रक्रिया में संलग्न एक वैज्ञानिक
आइडिया और आभार
दैनिक अमर उजाला
चित्र
गूगल से साभार
प्रस्तुति






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