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उलझन को सुलझाने का स्वप्रयास

भूमिका


आलेख

आखिर इसकी वजह क्या है कि हम और आप अपने स्वाभाविक रूप से विकसित कौशल के अनुसार जीवन जीने में विफल रह जाते हैं और ऐसा उन सब के विषय में भी कहा जा सकता है जो कि उच्च कोटि के उदाहरण हैं? आखिर क्या कारण है कि समाज में फुसलाने वाले लोग अपने कार्य में इतने माहिर हो गए हैं कि जीवन मूल्यों को लेकर अपने जीवन को बिखरने से बचा लेने वाले भी उनके झांसों में आ जाते हैं? मुझको स्मरण हो आता है एक अपुष्ट पर बहुत तेजी से समाज में फैला समाचार कि एक शिक्षक महोदय शिक्षा में उल्लेखनीय करने के बाद अब राजनीति में पदार्पण करेंगे। शिक्षक महोदय के संपर्क के लोगों में से कुछ ने उनको राजनीति में आने को निरंतर उकसाकर प्रयास करने के लिए प्रेरित किया तो उन्हीं के

सहयोगियों में से ही एक धडे ने उनको टिकट ना मिल पाए इस दिशा में प्रयास किए। अब यह विचार का विषय है कि ऐसा आखिर हुआ तो हुआ क्यों? हो सकता है कि इसके मूल में कई कारण हों लेकिन इसके बाद अफवाहों का बाजार आलोचनाओं, समीक्षाओं एवं आरोपों के रूप में 3अवश्य गर्म हो गया, जबकि फुसलाने वालों का शिकार हो शिक्षक महोदय अवश्य सकते में रहे। आइए! इसकी कुछ वजहों को समझ जीवन की सबसे महत्वपूर्ण उलझन को सुलझाने का अपने स्तर से प्रयास करते हैं।

हमारे देश की शिक्षा प्रणाली में प्राचीन तथा अंग्रेजों के काल की शिक्षा में अंतर को स्पष्ट समझा जा सकता है। हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली व्यक्तित्व का निर्माण करती थी, जबकि अंग्रेजों के शासन में विकसित होने के उपरांत से आज तक प्रचलित शिक्षा प्रणाली सेवा क्षेत्र के लिए सुयोग्य प्रतिभाओं की तलाश करती है जिसमें मुख्य रूप से एक समान पाठ्यक्रम और विशिष्ट विषयों पर ध्यान दिया जाता है। सभी छात्रों के लिए एक ही प्रकार की शिक्षा प्रदान की जाती है। इसके अंतर्गत प्रचलित शिक्षा में कहीं पर भी हम विद्यार्थी को स्वरोजगार या फिर वैकल्पिक रोजगार उन्मुख विकल्पों को नहीं बताते जिसके परिणामस्वरूप अनंतिम उद्देश्य सेवा क्षेत्र में रोजगार ही ढूंढते जाने को युवा प्रयासरत रहते हैं। यह परंपरागत शिक्षा प्रणाली व्यक्तिगत कौशल और रुचियों की पहचान और उनके विकास को प्रोत्साहित करने के बजाय, उन्हें दबा देती है। 

समाज के पारंपरिक मानदंड और अपेक्षाएं तो किसी व्यक्ति को क्या करना चाहिए का निर्धारण करती हैं, लेकिन हम लोग सेवा क्षेत्र को ध्यान में रखकर ही प्रयासरत रहते हैं। परिवार, समाज और आसपास के लोग अक्सर उनसे विमर्श के दौरान अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं को थोपते हैं, ऐसे प्रयासों से व्यक्ति अपनी प्राकृतिक प्रतिभा और कौशल को अनदेखा अनिच्छा वाले क्षेत्र के चयन की स्वीकृति प्रदान कर देता है।  

जीवन यापन के लिए धनार्जन हमेशा से समय की प्राथमिक आवश्यकता रही है। लोग अपनी प्राकृतिक क्षमताओं और कौशल को छोड़कर उन सेवाओं और कार्यों का चयन करते हैं जो आर्थिक रूप से अधिक स्थिरता प्रदान करते हैं और सामान्य जनजीवन में आपको ऐसे अनेकानेक लोग मिल जाएंगे मसलन डॉक्टर राजनीति करते या फिर जीवन बीमा निगम करियर एजेंट। ऐसे निर्णय और आर्थिक दबाव अक्सर उनकी रचनात्मकता और कौशल के विकास को सीधे सीधे बाधित करता है। 

खुद के कौशल की पहचान करने संबंधी अक्षमता भी एक वजह है कि बहुत से लोग अपने भीतर के कौशल और प्रतिभाओं को पहचान नहीं पाते। आत्म-विश्लेषण और आत्म-चिंतन की कमी के कारण, वे अपनी प्राकृतिक क्षमताओं को समझने और उन्हें विकसित करने में विफल रहते हैं। परिणामस्वरूप अक्षमता वाले क्षेत्रों में नियोजन हो जाने से स्थितियां जटिल, विपरीत और कॉम्प्लेक्स बनी रहती हैं।

एक अन्य वजह यह भी है कि कौशल के उत्तरोत्तर विकसित ना हो पाने के कारण सबको समान अवसर नहीं मिल पाते। इससे सत्यापित होता है कि यदि किसी व्यक्ति के पास अपने कौशल को प्रदर्शित करने या विकसित करने के लिए सही अवसर नहीं हैं, तो वह अपने प्राकृतिक कौशल को छोड़कर किसी अन्य क्षेत्र में काम करने के लिए विवश हो सकता है जिसके परिणामों के प्रतिकूल आने की प्रबल संभावना बनी रहती है।  

आधुनिक समय में कौशल के साथ साथ तकनीकी प्रगति और प्रतिस्पर्धा ने जीवन को और भी जटिल बना दिया है। लोग अपनी प्राकृतिक रुचियों और कौशलों को छोड़कर उन क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं जो अधिक मांग में हैं या समाज द्वारा 'सफलता' के मानक माने जाते हैं। भले ही वो उस परिवेश में प्राकृतिक तरीके से फिट ना होते हों।

इन सब वजहों के चलते, हम अपने स्वाभाविक रूप से विकसित कौशल और प्रतिभा के अनुरूप जीवन जीने में विफल हो जाते हैं। इस उलझन को सुलझाने के लिए आत्मविश्वास के साथ ही साथ शिक्षा प्रणाली में बदलाव, व्यक्तिगत आत्म-चिंतन, और सामाजिक दबाव को कम करने की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है।

सूचना स्रोत

शब्दशिल्प के प्रयास से चैट जीपीटी से सृजित पाठ्य का संशोधित रूप

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गूगल से 

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