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एक अधिकारी के अनवरत प्रयास

भूमिका
वर्तमान डिजिटल युग में, पत्र, आवेदन पत्र और उपन्यास लेखन जैसी साहित्यिक विधाओं का महत्व कहीं खोता जा रहा है। लेखन न केवल विचारों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है, बल्कि यह हमारे भीतर की रचनात्मकता, तर्कशक्ति और भाषा कौशल को भी निखारता है।  इसी उद्देश्य से राजस्थान में एक प्रशासनिक अधिकारी डॉक्टर सूरज सिंह नेगी जी ने एक विशेष पहल शुरू की है, जो लेखन के प्रति रुचि रखने वाले व्यक्तियों को अपनी लेखनी को धार देने का अवसर प्रदान करेगी। 

इसमें निहित उद्देश्यों में सम्मिलित है लेखन के माध्यम से विचारों को सटीक और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना, साहित्यिक शैली और भाषा कौशल को विकसित करना तथा नई प्रतिभाओं को पहचान कर उनके लेखन को प्रोत्साहन देना। तो आइए, इस पहल का हिस्सा बनें और अपने लेखन कौशल को एक नई दिशा दें। आपके विचार, आपकी कहानियां और आपकी लेखनी इस पहल को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाएंगी।
पत्र विधा आधारित पुस्तकें
पत्र और आवेदन लेखन के अभ्यास को लोकप्रिय बनाने के लिए एक पहल का प्रस्ताव निम्नलिखित है:
पहल का नाम
"शब्द संवाद अभियान"
उद्देश्य
आज के डिजिटल युग में पत्र और आवेदन लेखन की कला धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। इस पहल का उद्देश्य इस कला को पुनर्जीवित करना, लोगों को इसका महत्व समझाना और उन्हें प्रोत्साहित करना है कि वे पत्र लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाएं।
मुख्य गतिविधियां

  1. स्कूल और कॉलेज स्तर पर प्रतियोगिताएं:

    • पत्र लेखन और आवेदन लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन।
    • विजेताओं को प्रमाणपत्र और पुरस्कार प्रदान करना।
    • विद्यार्थियों को औपचारिक और अनौपचारिक पत्र लेखन की तकनीक सिखाना।
  2. कार्यशालाएं और सेमिनार:

    • विशेषज्ञों द्वारा पत्र और आवेदन लेखन की महत्ता पर कार्यशालाओं का आयोजन।
    • सही प्रारूप, भाषा और शिष्टाचार सिखाने के लिए विशेष सत्र।
  3. सामाजिक मीडिया अभियान:

    • पत्र लेखन के महत्व को बढ़ावा देने के लिए सोशल मीडिया पर "मेरा पहला पत्र" जैसी पहल।
    • लोगों को अपने अनुभव साझा करने के लिए प्रेरित करना।
  4. पत्र संग्रह अभियान:

    • पुराने पत्रों का संग्रह और उन्हें प्रदर्शित करने के लिए एक प्रदर्शनी का आयोजन।
    • ऐतिहासिक और भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण पत्रों को संरक्षित करना।
  5. पत्र मित्रता (Pen Pal) कार्यक्रम:

    • अलग-अलग स्थानों के लोगों को पत्र के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ने के लिए प्रेरित करना।
    • विद्यार्थियों और समाज के अन्य वर्गों के बीच संवाद को बढ़ावा देना।
  6. सामुदायिक भागीदारी:

    • स्थानीय पुस्तकालयों और सामुदायिक केंद्रों में पत्र लेखन सत्र।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को आवेदन और पत्र लेखन का महत्व समझाना।

अभियान में निहित संदेश
"शब्दों की ताकत को पहचानें, अपने भावों को कागज पर उतारें।"

परिणाम
यह पहल न केवल पत्र लेखन की कला को पुनर्जीवित करेगी, बल्कि लोगों को अपनी भावनाओं और विचारों को बेहतर ढंग से व्यक्त करने का मंच भी प्रदान करेगी।

भूमिका

सृष्टि में ऐसे अनेक लोग हैं, जो समाज में निर्लोभ और निर्बाध गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। ये वो मानव संपदाएं हैं जिनको कुदरत के आशीष मिले हैं और वे जिम्मेदारी के भावों से अनंत लोगों के लिए मिशन तैयार कर देते हैं। एक ऐसी ही शख्सियत श्री सूरज सिंह नेगी जी, जिनके प्रयासों से राजस्थान में पाती अभियान चल रहा है, की पुस्तक के कुछ अंश यहां पर प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

हाशिए पर सिमटा बचपन और बुढ़ापा 

वर्तमान दौर में यद्यपि समाज/राष्ट्र विकास के नित नए कीर्तिमान गढ़  रहा है - जीवन स्तर में सुधार, जीवन प्रत्याशा में वृद्धि, आर्थिक स्थिति में सुदृढ़ता, तकनीकी विकास, संचार क्रांति में बढ़ते कदम, आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते क़दम, विशाल मानव शक्ति। ये कुछ ऐसे मानक हैं जो विकसित समाज और राष्ट्र  के लिए आरंभिक शर्तें हैं, लेकिन दूसरी ओर समाज में संवेदनाओं में कमी, जीवन मूल्यों में छीजत, संवादहीनता, अंतहीन दिशा की तरफ दौड़, गलाकाट प्रतिस्पर्धा आदि कुछ ऐसे तथ्य हैं जो मानव द्वारा किए गए विकास पर प्रश्न चिह्न लगाने को पर्याप्त हैं। प्रश्न उठता है कि इन सबके लिए उत्तरदायी आख़िर कौन है? इसका जवाब भी सीधा सा है कि इन सबके जिम्मेदार हम सब, समाज और प्रचलित व्यवस्था है। हमारी पीढ़ी ने सपने देखे; उन सपनों को पूरा करने का जतन भी ख़ूब किया, जब वो पूरे न हुए तो उन सपनों की गठरी अपने गले में डाल दी। रात-दिन, खाते-पीते, उठते-बैठते उन सपनों के विषय में सोचते रहे। अफ़सोस करते रहे कि काश! वो सपना पूरा हो जाता, लेकिन हार न मानी। एक बार उन अधूरे सपनों को पूरा करने का माध्यम बनाया अपनी औलाद को। यह सोचा कि हम न सही हमारी औलाद वो बनेगी जो हम बनना चाहते थे। वह औलाद जिसके माँ के गर्भ में आते ही  अपने सपनों को पूरा करने का पाठ पढ़ाया जाता है, यही नहीं जिसके  जन्म से पहले ही यह  तय कर लिया जाता है कि उसे किस स्कूल में दाखिला दिलाया जाएगा और वो क्या बनेगा या बनाया जाएगा। और! जन्मते ही तो उस पर अपेक्षाओं का बोझ लाद दिया जाता है। जैसे-जैसे वो बड़ा होता है, परिजनों के सपनों को पूरा करने का बोझ उस नन्हीं मासूम जान पर लाद दिया जाता है। जिन हाथों में खिलौने होने चाहिए उन हाथों में समय से पहले ही  किताब, कॉपी, पेंसिल थमा दी जाती है। बेचारा मासूम....। आज बच्चों का चेहरा देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि उनका बचपन  जैसे कहीं खो गया है। बचपन तो उनसे कोसों दूर चला गया है। उन पर सपने थोपे जा रहे हैं। हरेक को उससे अनेक अपेक्षाएं हैं अकेले मां बाप या  परिजन को ही नहीं, शिक्षक, मित्रगण, समाज सभी तो कुछ न कुछ अपेक्षा पाले बैठे हैं। उसे क्या करना है, उसकी क्या पसंद नापसंद है, उसको क्या विषय चुनना चाहिए, किस दिशा में जाना है यह सब माँ-बाप तय करने लगे हैं। 


अभिभावक भी यह भी भूल जाते हैं कि प्रत्येक बच्चा एक निश्चित उद्देश्य लेकर जन्मता है। उसकी एक निश्चित नियति होती है लेकिन अपने सपनों को पंख लगाने की अंधी दौड़ में यह सब कुछ गौण हो जाता है, वो ख़ुद भाग्य नियंता बन बैठते हैं।

एक आयु के पश्चात् कोचिंग रूपी फैक्ट्री में उसे भेज दिया जाता है मानो कोई इंसान न हो कच्चा माल हो जो परिष्कृत होकर नए रूप में सामने आएगा। आखिर सब तरफ से टूट चुका किशोर जिसकी पुकार सुनने को कोई तैयार नहीं है। परेशान, हैरान है। ईश्वर की बनाई इस खूबसूरत दुनिया से वो जल्द ही ऊबने लगता है। वो करे भी तो क्या करे। सबको परिणाम चाहिए और अपनी इच्छानुसार। उसे क्या चाहिए, उसके मन में क्या कुछ है। इसे सुनने को, समझने को कोई तैयार नहीं है। चारों तरफ़ से प्रश्नों की बौछार... । उसकी असफलता पर  घायल मन को संवेदना रूपी मरहम के बजाए चारों तरफ से उसे घेर लिया जाकर जले पर नमक छिड़कने का काम किया जाता है जिसकी शुरुआत घर से, अपनों से होती है। तुम किसी काम के नहीं, तुम्हारे साथी को देखो, हमारी जमापूंजी सब तुम पर लगा दी, तुम कुछ नहीं कर सकते, और भी न जाने किन किन उपाधियों से  विभूषित किया जाता है। वो जाए भी तो कहां ।निराश होकर फिर वो ऐसा कदम उठाता है जिसकी कल्पना से रूह तक कांप उठती है और फिर उन माँ-बाप, परिजनों के पास जीवन भर अफसोस करने के सिवाय कुछ नहीं रह जाता। दूसरी तरफ यदि माँ-बाप के सपनों पर बच्चे खरा उतर भी जाते हैं। उनके सपनों को पूरा कर भी देते हैं तो एक बार सफलता का स्वाद क्या चखा, घर की दहलीज पार करने के बाद वापिस मुड़ कर नहीं देखते। 

यह समस्या केवल महानगरों तक ही सीमित न रही, अब तो कस्बे और गांव भी इससे दो चार हो रहे हैं। मां बाप वृद्धावस्था में उन बच्चों की राह तकते-तकते परलोक गमन तक कर जाते हैं। बच्चे उनके अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने तक के लिए समय ही नहीं निकाल पाते। आज के दौर में यह समस्या आम हो गई है।

आखिर इस सबके लिए दोषी है कौन? माँ-बाप, समाज, व्यवस्था या फिर बच्चे...?

दरअसल आज घर परिवार की महत्वपूर्ण इकाई बच्चे और वृद्धजन दोनों ही इस समस्या को झेल रहे हैं। दो चार हो रहे हैं। यह बात अलग है कि इन सबके लिए दोषी कौन है हम स्वयं या हमारी बढ़ती महत्वाकांक्षाएं। कुछ भी हो प्रभावित तो घर परिवार और समाज हो रहे हैं। आने वाले समय में यह स्थिति और अधिक भयावह होगी यदि समय रहते हम संभले नहीं तो....।

बस, इन्हीं कुछ प्रश्नों की पड़ताल करता  मेरा आगामी  उपन्यास  भावेश की डायरी जो चार खण्डों में विभाजित है। शीघ्र ही आपके हाथ में होगा।

आशा है मेरे स्नेही पाठकों को मेरे  पूर्व के उपन्यास: रिश्तों की आंच, वसीयत, नियति चक्र, ये कैसा रिश्ता, सांध्य पथिक, कहानी संग्रह:पापा फिर कब आओगे एवम् संस्मरण:मेरी ईजा की तरह यह उपन्यास 'भावेश की डायरी' भी पसन्द आएगा। 

डॉक्टर सूरज सिंह नेगी

9660119122

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