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एक समर्पित शिक्षक रहे हैं मोहर सिंह जी

भूमिका

समर्पित शिक्षण से आशय है शिक्षक का अपने छात्रों और शिक्षण प्रक्रिया के प्रति पूरी निष्ठा और ईमानदारी से समर्पित होना। इसमें शिक्षक अपने ज्ञान, अनुभव और संसाधनों का उपयोग करते हुए विद्यार्थियों की समझ और विकास में मदद करता है। श्री मोहर सिंह जी जैसे समर्पित शिक्षक छात्रों को न केवल शैक्षिक ज्ञान देते हैं बल्कि उनमें नैतिक मूल्यों, आत्म-विश्वास, और जीवन कौशल को भी विकसित करते हैं।

परिचय

साथियो, सबको नमस्कार! 'उलझन-सुलझन' की वार्षिक ई-पत्रिका 'जीवन की अनुभूतियां' के लिए आज हम आपका साक्षात्कार टोंक जनपद के उनियारा ब्लॉक के कुण्डेर ग्राम में जन्मे सेवानिवृत्त अध्यापक मोहरसिंह गुर्जर जी से करवाने जा रहे हैं। वे छात्र जीवन से ही कुशाग्र बुद्धि वाले मेधावी छात्र रहे हैं। स्कूली शिक्षा ग्राम कुण्डेर से प्राप्त करने के बाद आपने उच्च शिक्षा टोंक स्थित सरकारी काॅलेज से स्नातकोत्तर तक की शिक्षा अर्जित कर जयपुर से शिक्षा विषय में बीएड कर अध्यापन की शासकीय सेवा में आए हैं।आपमें नेतृत्व करने का गुण अध्ययन काल से ही था। उच्च शिक्षा में भी आपने ग्रामीण छात्र परिषद (GMT) के बैनर तले लम्बे समय तक अपना नेतृत्व प्रदान किया था।आपका व्यक्तित्व साहसी व निडर प्रवृत्ति का रहा है। शिक्षक के रूप में शासकीय सेवा में भी निडरता के साथ हमेशा सक्रिय रहे और शिक्षक-शिक्षार्थी हित में सदैव निडरता के साथ काम करके अपनी छवि एक सर्वहितैषी शिक्षक नेता के रूप में बनाई है। उसी के परिणामस्वरूप आप सेवानिवृत्त से पूर्व लगातार पांच वर्षों तक राजस्थान शिक्षक संघ (राष्ट्रीय) के जिलाध्यक्ष के रूप में जनपद भर में कार्य कर शिक्षक संगठन को नई ऊंचाइयां प्रदान की। आपके कार्यकाल में  संगठन की सदस्य संख्या में निरंतर इजाफा हुआ साथ ही आपकी लगन व मेहनत की बदौलत संगठन के जिला कार्यालय हेतु मुख्य जयपुर कोटा स्टेट हाइवे पर जमीन खरीदी गई जिस पर भविष्य में संगठन का आलीशान कार्यालय बनाया जा सकेगा।इन समर्पित कार्यों की ही बदौलत आपको सेवानिवृत्त के बाद भी शिक्षक संगठन में लगातार तीन वर्षों से जिला संगठन मंत्री के पद का दायित्व दिया जा रहा है। आप शुरू से धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति रहे है।श्रीश्री1008 श्री भजनानंद जी महाराज नोहटा की घाटी निवाई जिला टोंक आपके परम श्रद्धेय गुरुजी रहे है।उनके सम्पर्क में आने के बाद आप, अपने जीवन में लगातार सबकी भलाई के लिए कृतसंकल्प है।आप हमेशा से ही राष्ट्रीय विचार को लेकर कई संगठनों में अपनी सहभागिता निभाते रहे हैं। वर्तमान में आप यशस्वी प्रधानमंत्री जी के विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को लेकर भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय सदस्य के रूप में तन-मन-धन से जनता की सेवा में लगे हुए हैं। ऐसे कर्मनिष्ठ व सेवाभावी व्यक्तित्व से बातचीत करके आज हम और हमारे सभी पाठक, श्रोता व दर्शक अपने आपको गौरवान्वित महसूस करेंगे। ऐसा हमारा विश्वास है, तो आइए हम स्वयं उनकी जुबानी ही जानते हैं उनके व्यक्तित्व, कृतित्व के बारे में।



बातचीत

प्रश्न १. आदरणीय आपने शिक्षण का क्षेत्र चुना तो क्या सोचकर और किसी के परामर्श पर या फिर यह निर्णय ऐच्छिक था। 

उत्तर - "शिक्षक के पास समाज में शिक्षा के माध्यम से बदलाव के बहुत सारे अवसर रहते है। शुरू से ही समाज सेवा करने के मन में भाव थे। इसलिए शिक्षा क्षैत्र में जाने का निर्णय मेरा स्वयं का ही था। हां इसके लिए मेरे गुरुजनों व परिवार के सदस्यों से मुझे अच्छा प्रोत्साहन मिला था।"

प्रश्न २. आप लगातार कई सारे संगठनों से जुड़े रहे हैं। आप समर्पित भाव से शिक्षण के साथ यह सब कैसे कर पाते है जी।

उत्तर - "जैसा की मैंने बताया की शुरु से ही मन में समाज सेवा के भाव होने के कारण मैं कई सारे संगठन जो समाज, देशहित में कार्य कर रहे हैं।उनसे जुड़ना मेरी रूचि रही है।साथ मैं समय का नियोजन सही तरीके से करके मेरे को मिले दायित्व का मैं पूरी निष्ठा व लगन से लक्ष्य तक पहुंचाने में कोई कसर नहीं रखता हूं।"

प्रश्न ३. आप शिक्षा विभाग में साठ वर्ष की आयु तक सेवा करके सेवानिवृत्त हुए हैं। उस समय की कोई एक घटना जिसने आपके जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया हो?

उत्तर - "मेरा सरकारी सेवा का पुरा जीवन बेदाग रहा है। सेवानिवृत्त से पूर्व ही मैं मेरे आध्यात्मिक गुरु श्री श्री 1008 भजनानंद जी महाराज के पास अधिक समय देने लगा था। सेवानिवृत्त होते ही मेरे को उनके शिष्य के रूप में गृहस्थ आश्रम त्यागने का मैंने निश्चय किया पर गुरूजी ने मुझे पहले अपना गृहस्थ का धर्म पुरा करने को कहा। इससे मेरा जीवन का दृष्टिकोण बदला।यह मेरे लिए विशेष घटना रही।"

प्रश्न ४. आपके दृष्टिकोण से वर्तमान  शिक्षा व्यवस्था में आपको क्या महती आवश्यकता लगती और क्यों?

उत्तर - "वर्तमान समय में शिक्षित व्यक्तियों की संख्या तो बहुत हो गई पर उनमें नैतिकता व संस्कारों की कमी मुझे दिखाई देती है।मेरा मानना है बिना संस्कार की शिक्षा व्यक्ति को समाज के लिए एक अच्छा इंसान नही बनाती है। इसलिए संस्कारित शिक्षा की मुझे बड़ी आवश्यकता वर्तमान में महसूस हो रही है।"

प्रश्न ५. अध्ययन के दौरान आपका प्रिय विषय क्या रहा? उसके बारे में भी हमें थोड़ा बताएं और वह प्रिय क्यों रहा यह भी?

उत्तर - "मेरा प्रिय विषय संस्कृत रहा है। मुझे शुरू से ही संस्कृत पढ़ने में आनंद की अनुभूति होती थी। क्योंकि मैं देखता था हमारे हर धार्मिक कार्यक्रमों में संस्कृत भाषा में ही पंडित लोग सारे कार्य संपन्न करवाते है।"

प्रश्न ६. सर, हमारे पाठकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर - "जीवन में हमेशा अपना हौंसला कभी नही खोना चाहिए।साहसी व्यक्ति का ही ईश्वर साथ देता है।यह हमेशा ध्यान में रखकर अपने कर्तव्य को पुरी ईमानदारी से करना चाहिए।"

प्रश्न ७. महोदय, हमें अपनी सबसे खास रुचि के बारे में भी बताइए।

उत्तर - "मेरी रुचि समाज सेवा की शुरुआत से रही है। यह अभी तक भी खास बनी हुई है। मैं लगातार निष्काम भाव से जनहित, समाज हित व देशहित के लिए अपना तन मन और धन हमेशा समर्पित करता रहूं।यही मेरी खास रूचि है।"

सूचना स्रोत व साक्षात्कार योजनाकार



श्री हंसराज 'हंस'

प्रस्तुति



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