भूमिका
सृष्टि भर में नेत्रों की विशेष भूमिका है और प्रकृति के समस्त आकर्षणों का आनंद लेने में भी। परंतु विविध कारणों से अंधता पनप कर जीवों को इस आनंद से वंचित भी कर देती है। ऐसे जीवों में मानव ही था जिसने नेत्र दान करने के विषय में सोचा और इसी सोच ने देखिए तो कई लोगों को नेत्रदान के लिए प्रेरित किया। प्रस्तुत उदाहरण तो चकित कर देने वाला है।
अनूठा प्रयास ग्रामीणों का
भारत को विविधताओं का देश यूं ही नहीं कहा जाता। अगर यहां की सभ्यता-संस्कृति और रीति-रिवाज सबसे निराले हैं, तो यहां के लोग भी बेहद अनोखे हैं। यहां के लोग समय-समय पर भीड़ से कुछ बिलकुल अलग करके दुनिया में अपना नाम रोशन करते आये हैं। भारत का एक गांव ऐसा भी है, जहां कोई पैरों में जूते या चप्पल नहीं पहनता। हमारे देश में कुछ जगहों पर बेटियों के जन्म पर खूब धूमधाम से जश्न मनाया जाता है। और अपने ही देश में एक गांव ऐसा है, जहां सबसे ज्यादा जुड़वां पाए जाते हैं।
लेकिन इन सब के बीच देश में एक गांव ऐसा भी है, जो एक बेहद विशेष कारण से मशहूर है। भारत के दक्षिणी छोर पर कन्याकुमारी में स्थित एक छोटे से गांव माद्थात्युविलाई की विशेषता यह है कि यहां के हर परिवार में कोई न कोई व्यक्ति नेत्रदाता है। पिछले दस से अधिक वर्षों में यहां के दो सौ से भी ज्यादा गांववासी अपने नेत्र दान कर चुके हैं। इस लिहाज से यह गांव देश भर के लिए एक मिसाल बन गया है। हालांकि शुरुआत में ऐसा नहीं था।
गांव के अधिकतर बड़े-बूढ़ों का मानना था कि आंखें दान कर देने पर मरने के बाद वह भगवान को नहीं देख पाएंगे। यह मिथक टूटना बेहद जरूरी था। तब यहां के एक चर्च के युवा समूह के अध्यक्ष अरुणो जेवियर ने ग्रामीणों को नेत्रदान का महत्व समझाया, जिसमें एक अन्य चर्च 'सेंट सेबेस्टियन' ने भी उनकी मदद की। नतीजतन, साल 2007 में गांव के एक निवासी ने अपने नेत्रदान की पहल की और बाद में उसी वर्ष 1500 अन्य लोगों ने भी नेत्रदान हेतु पंजीकरण करवाया। इनमें अधिकतर युवा थे और आज इस गांव के हर घर से कम से कम एक व्यक्ति अपने नेत्रदान करने की शपथ ले चुका है। इस लिहाज से गांव के 14 साल के किशोर से लेकर 97 वर्ष की बुजुर्ग महिला तक नेत्रदान में शामिल हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस गांव के लोगों ने अंधेरे में जीवन जी रहे लोगों की जिंदगी में रोशनी लाने के लिए एक सार्थक कदम उठाया है।
सृजक
स्वाति गौड़
सूचना स्रोत
दैनिक हिंदुस्तान का रविवारीय संस्करण फुर्सत (मेरठ संस्करण)
संकलनकर्ता
शब्दशिल्प
उलझन सुलझन (मासिक)
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