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आखिर क्यों इंटरनेट सटीक और विश्वसनीय नहीं बन सकता?

 भूमिका

साथियो! वर्षों पूर्व इंटरनेट के पदार्पण ने संसार भर को विस्मित कर दिया था, लेकिन आज उस पर उपलब्ध निम्नतम स्तर की सामग्री सभी को शर्मसार करती है। आखिर क्या कारण और वो कौन लोग हैं जो कि विश्व भर के प्रत्येक देश में लोकप्रिय हो चुके सूचना के इस माध्यम को निरंकुश बनाए रखना चाहते हैं। जबकि! गंभीर बुद्धिमता वाले मानव संसाधनों को इसको सर्वोच्च मापदंडों को तय कर कुशल और सटीक बनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए।

विवरण

इंटरनेट को नि:संदेह एक चमत्कारी अन्वेषण कहा जा सकता है, लेकिन जिस तरह से इसका स्वछंद उपयोग हो रहा है वह लगभग प्रत्येक वर्ग की मानसिक क्षमताओं को प्रामाणिक तरीके से प्रभावित कर रहा है। प्राकृतिक निर्भरता की व्यवस्था से इतर एक अन्य निर्भरता भी अस्तित्व में आ गई है। इंटरनेट पर अधिसंख्य सर्फिंग करने वाली मानव जाति कम्युनिटी की निर्भरता का दु:खद पक्ष यह है कि इंटरनेट को कुशल और सटीक बनाने की दिशा में प्रयास करने को कोई भी तैयार नहीं है। इंटरनेट को यदि इस निश्चय के साथ विकसित करने की दिशा में प्रयास किया जाए तो अन्य अनेक कंप्यूटर युग से पूर्व किए गए नवाचारों की तरह इंटरनेट भी एक कालजयी नवाचार की श्रेणी पा सकता है। अन्यथा तो यह साक्षर तथा निरक्षर मानव संसाधनों के मध्य खिलौने की तरह प्रयुक्त होता रहेगा।

यह बुद्धिमता या विवेक का ह्रास माना जाए याद कि इंटरनेट के स्वेच्छाचारी स्वछंद प्रसार प्रभाव कि दैनंदिन समाचारों में निरंतर विकृत मानसिकता दृष्टव्य हो रही है। कुछ बानगियां समाचारों की सुर्खियों को देखकर ही स्पष्ट समझ आ सकती हैं-

दुष्कर्म के बाद नाबालिग भांजी को पेशाब पिलाया, और

कांच के गिलास को पटाखे पर रखकर पटाखा चलाने से दस वर्षीय बालक की मौत।

इसी क्रम में 

आतिशबाजी सर्वोच्च अदालत से प्रतिबंधित होने के बाद भी बहुतायत से होने से धुंध की मोटी चादर छाई।

अंतिम समाचार तो स्पष्ट अभिव्यक्ति है कि हमारे देश में विधान का कितना मान और सम्मान है। ये तो बानगियां भर हैं। ऐसा बहुत कुछ वहां है जो बुद्धिमता की सीमितता पर संशय उत्पन्न करता है। 

यक्ष प्रश्न है यह कि

"आखिर कोई भी सूचना का माध्यम विसंगतियों से भरा क्यों हो?"

सृजक

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