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हमारे वर्तमान में सोशल मीडिया की भूमिका

भूमिका

प्रस्तुत आलेख श्री देवेंद्र जी का है जो असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और छात्र हित में निरंतर सोचते हैं। उनकी चिंता छात्र वर्ग के भविष्य को लेकर है। उलझन सुलझन मासिक की टीम का विश्वास है कि उनकी रचना जनमानस को प्रभावित करेगी।

आज के युवा का वर्तमान और भविष्य 

आज संसार तकनीक के संक्रमण काल से गुजर रहा है। आज की युवा पीढ़ी को अगर सही रास्ता नहीं दिखाया गया तो युवा पीढ़ी अपने उद्देश्य से भटक जाएगी। ऐसी प्रबल संभावना है। वर्तमान की अधिकांश युवा पीढ़ी उद्देश्यहीन है। इस स्थिति के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार नहीं हैं साथ में माता-पिता, शिक्षण संस्थान व शिक्षकों की भूमिका, बच्चों के आसपास का वातावरण और सोशल मीडिया भी उत्तरदायी है।

सोशल मीडिया का अत्यधिक व नकारात्मक प्रयोग

वर्तमान के इस भौतिकवादी युग में जिस तरह से सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप आदि के गलत और अत्यधिक प्रयोग से बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। यह हमारे समाज और देश के लिए घातक सिद्ध होता दिखाई दे रहा है। यदि सोशल मीडिया से संबंधित सभी प्लेटफॉर्म का सकारात्मक तथा कुशलतापूर्वक प्रयोग किया जाए तो नि:संदेह देश की युवा पीढ़ी सकारात्मक दिशा की तरफ अग्रसर होगी तथा भविष्य में देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी। इससे देश समर्थ और वैभवशाली बनेगा लेकिन आज हमारे देश के अधिकांश युवा सोशल मीडिया का ना तो सकारात्मक दिशा में, और! ना ही उचित तरीके से प्रयोग कर पा रहे हैं, बल्कि इसके दुरुपयोग से छात्र वर्ग पर बड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अगर सोशल मीडिया को सही दशा तथा सही मार्गदर्शन से सीखा जाए या इस्तेमाल किया जाए तो ये बच्चों के ज्ञान में और मानसिक विकास दोनों में वृद्धि कर सकते हैं। 

अभिभावकों की भूमिका

अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों से नियमित और परस्पर संवाद का अभाव होना तथा साथ ही साथ अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों की प्राकृतिक प्रतिभा को नजरअंदाज करके अपने स्वार्थ और सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बाध्य कर देना तथा जानकारी का अभाव और तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण अभिभावक अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन नहीं कर पाते, जिससे ज्यादातर बच्चे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाते और बच्चे गलत मार्ग अपनाकर अपना समय और ऊर्जा दोनों व्यर्थ ही नष्ट करते हैं।

 शिक्षण संस्थान

आज के अधिकांश शिक्षण संस्थान के शिक्षक युवा बच्चों से परस्पर संवाद नहीं कर पाते जिसके बहुत से कारण हो सकते हैं जैसे अपने विषय में महारथ ना होना, आत्मविश्वास का अभाव, अपने ट्यूशन का बढ़ावा देना, तकनीकी ज्ञान की कमी होना आदि। साथ ही साथ बहुत सारे शिक्षण संस्थानो में इंफ्रास्ट्रक्चर का ना होना, स्टाफ की कमी, खेल क्रीड़ाएं ना होना, सांस्कृतिक गतिविधियां का अभाव, अनुशासन समिति का अभाव, नियमित पुस्तकालय की अनुप्लब्धता, प्लेसमेंट सेल का अभाव होना, महिला समिति का प्रायः ना होना, नियमित कक्ष संख्या कम होना।

ऑनलाइन कक्षा को बढ़ावा देना जिससे देश की युवा पीढ़ी, जो मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्र से आती है, तकनीकी ज्ञान व साधनों की कमी की वजह से मौजूदा संसाधनों का फायदा नहीं उठा पाती। साथ साथ ऑनलाइन कक्षा से बच्चों का अपने शिक्षक से ज्यादा संपर्क नहीं हो पाता और बहुत सारे कॉन्सेप्ट क्लियर नहीं होते तथा बच्चे मेटा एआई पर आश्रित हो जाते हैं जहां पर जितने भी साइंस कोर्स जैसे डायग्राम संबंधित पाठ्यक्रम भूगोल, पर्यावरण, जीव विज्ञान, कृषि विज्ञान आदि उनसे बेसिक कॉन्सेप्ट क्लियर नहीं होते

वातावरण(परिवेश)

आज के युवाओं पर जिस परिवेश में वे रह रहे हैं उसका विशेष प्रभाव पड़ता है अगर उनका कोई मित्र कम मेहनत या कम संघर्ष कर कुछ अलग प्रकार के कारणों से अच्छा साधन संपन्न हो जाता है तो आज के युवा बच्चे उसको आदर्श मानने लगते हैं और वह अपनी पढ़ाई या मेहनत पर कम ध्यान देकर शॉर्टकट रास्ता अपना लेते हैं और जल्दी ही साधन संपन्न बनने की कोशिश करने लगते हैं और प्रायः गलत मार्ग पर चले जाते हैं। इसमें एक अलग कारण यह भी है जितने भी सफल व्यक्ति या बच्चे हैं वे सफलता के बाद अपने मूल समाज से कट जाते हैं और अपनी युवा पीढ़ी को ही अपने साथ जोड़ नहीं पाते।

तकनीकी ज्ञान का कुशलतापूर्वक प्रयोग ना कर पाना

आज की युवा पीढ़ी अपने स्कूल या शिक्षण संस्थान में किसी भी अध्यापक या शिक्षक द्वारा किसी विषय या कॉन्सेप्ट का क्लियर ना होना या किसी कारण से स्कूल न जाने की वजह से विषय पर ज्ञान न होने पर आज की युवा पीढ़ी उस विषय को गूगल या विकिपीडिया पर देखने की अपेक्षाएं, या विषय के एक्सपर्ट की वीडियो देखने की अपेक्षाएं, युवा पीढ़ी यूट्यूब पर गाने बनाना, गाने सुनना, फिल्म देखने पर समय और ऊर्जा खराब करते हैं।

मानसिक दौर्बल्य 

आज की युवा पीढ़ी दिन प्रतिदिन तकनीकी उपागमों पर आश्रित होती जा रही है; जैसे - लैपटॉप, कंप्यूटर, मोबाइल, कैलकुलेटर, टैबलेट इत्यादि। इसके अतिरिक्त बच्चे अपने माता-पिता के साथ समय ना देना, दोस्तों को समय ना देना, अपने रुचि के अनुसार खेल में समय ना देना, अपने दोस्तों के साथ विषय पर चर्चा ना करना, सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग ना लेना, एनएसएस तथा एनसीसी जैसी गतिविधियों में भाग ना लेना। इससे बच्चे सांस्कृतिक, सामाजिक मूल्यों और नैतिकता को भूलते जा रहे हैं। जिससे धीरे-धीरे बच्चे मानसिक दुर्बलता की ओर चले जाते है और वे भविष्य में किसी भी तरह के दबाव को नहीं झेल पाते। इसी कारण वर्तमान पीढ़ी में आत्महत्या जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं।

निवारक सुझाव  

आज जिस तरह से ज्यादातर युवा निरुद्देश्य और लक्ष्यहीन दिखाई दे रहा है तथा लक्ष्य को जल्दी प्राप्त करने की भागदौड़ मची हुई है अगर आज हम सभी अपनी अपनी जिम्मेदारी पूर्णता के साथ निभाएं तो चाहे जो माता-पिता की जिम्मेदारी हो या शिक्षक की अथवा शिक्षण संस्थान की। तभी हमारी युवा पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ सकेगी और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सके। हम सभी को संकल्प लेना है कि युवा पीढ़ी के मार्गदर्शन के साथ-साथ टेक्नोलॉजी का सदुपयोग, सोशल मीडिया का सकारात्मक प्रयोग तथा साथ-साथ में शिक्षण संस्थानों द्वारा बच्चों को अच्छा माहौल दें। अच्छा शिक्षक और अच्छी शैक्षिक सुविधा देने का प्रयास करेंगे तथा साथ-साथ में अभिभावकों को भी आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारी पूरी दृढ़ता के साथ निभानी है तभी भारत देश भविष्य में परम वैभवशाली और सामर्थ्यवान बनेगा।

सृजक

डॉ. देवेंद्र कुमार नागर

सह आचार्य - पर्यावरण विभाग, रामानुजन कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

प्रस्तुति




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