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भारत में मानव शक्ति नियोजन की आवश्यकता (अतीत से)

भूमिका

एक अनछुई या लगातार बनी हुई समस्या को हल करने के लिए अक्सर एक नए दृष्टिकोण और एक व्यवस्थित रणनीति की आवश्यकता होती है। एक ऐसी ही समस्या 'भारत में मानव शक्ति नियोजन' को लेकर दशकों पूर्व विमर्श किया था डॉक्टर (श्री) सूरज सिंह नेगी जी ने। 

आलेख

आज समूचे देश में राजनेताओं, शिक्षाविदों, चिन्तकों और यहां तक कि आम आदमी के मध्य जनसंख्या वृद्धि को लेकर एक खासी बहस छिड़ चुकी है। एक प्रवृत्ति जो आमतौर पर प्रबल होती जा रही है, वह है देश का आम नागरिक विभिन्न समस्याओं के लिए जनसंख्या वृद्धि को दोषी ठहरा रहा है। कितनी विचित्र बात है, आज जहां विभिन्न देशों में आर्थिक विकास के घटकों में मानव संसाधन विकास को प्रमुखता प्रदान की जाती है वहीं भारत जैसे देश में उपलब्ध मानव संसाधन के महत्व को नकारा जा रहा है। आज बिना आत्मचिन्तन किए व विश्लेषण किए बगैर ही हम तथ्यों को स्वीकार या अस्वीकार करने लगे हैं, ऐसा इसलिए कि अन्य व्यक्ति ऐसा मानते हैं, यही बात जनसंख्या के साथ में जुड़ी हुई हैं, यह सत्य है कि बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या पर लम्बी अवधि में भी नियंत्रण नहीं लगाया जाए तो समस्या उत्पन्न हो सकती है, कारण कि साधन सीमित हैं, लेकिन भारत में जनसंख्या वृद्धि को आवश्यकता - से कुछ अधिक ही तूल दे दिया गया है। विभिन्न अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री माल्थस को अपना आदर्श मान बैठे हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि आज भारत अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धान्त के हिसाब से अभी प्रथम अवस्था में ही है, अर्थात् देश की जनसंख्या अपने अनुकूलतम बिन्दु पर नहीं पहुंच सकी है। यदि यह मान भी लिया जाए कि न्यून जनसंख्या विकास में सहायक और अधिक जनसंख्या विकास में बाधक है तो दक्षिणी अफ्रीका के कई देशों में विकास दर उच्च और चीन जैसे राष्ट्र में विकास दर न्यून होनी चाहिए। जबकि ऐसा नहीं है। अफ्रीकी राष्ट्रों की निर्धनता और चीन की अर्थव्यवस्था का विकसित स्वरूप किसी से छुपा हुआ नहीं है। प्रश्न यह नहीं है कि बढ़ती जनसंख्या विकास में बाधक है या नहीं अपितु इस बात पर गौर किए जाने की जरूरत है कि देश में उपलब्ध मानव संसाधनों का नियोजन कैसे किया जाए? जहां तक भारत जैसे राष्ट्र का सवाल है यहां पर जनसंख्या के उचित नियोजन की बजाए जनसंख्या वृद्धि के नियंत्रण पर अधिक चिन्तन किया जाने लगा है और आम भारतीय नागरिक के दिमाग में यह बात बिठा दी गई है कि बढ़ती जनसंख्या देश के लिए अभिशाप है। जिस देश में व्यक्ति के आगमन पर उसे अभिशाप माना जाता है वहां मानव संसाधन विकास की बातें बेमानी सी लगती हैं, सच तो यह है कि हमारे देश में कभी मानव शक्ति के उचित नियोजन व मानवीय संसाधन विकास पर ध्यान ही नहीं दिया गया।

समस्याओं के पीछे समस्या है। मानव-शक्ति का उचित नियोजन न हो पाने की, प्रसिद्ध प्रबन्धशास्त्री अब्राहम ए. मास्लो का मत है कि 

"संगीत की इच्छा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को संगीतकार, कविता की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को कवि, अध्यापन की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को अध्यापक, इसी प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति को वह बनने का प्रयास करना चाहिए,जो कुछ वह बनना चाहता है।" 

जाहिर है व्यक्ति को यदि उसकी इच्छा व योग्यतानुसार कार्य मिलता है तो उसे वह अधिक लगन व मेहनत से करता है - जिसका प्रभाव संस्था पर भी अच्छा पड़ता है, यह सब तभी संभव है जब मानव शक्ति का उचित नियोजन किया जाए।

पिछले वर्षों में एक नवीन प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। अधिकांश चिकित्सा, अभियांत्रिकी, तकनीकी, प्रबन्ध योग्यता प्राप्त युवाओं का रुझान - प्रशासनिक सेवाओं की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में उन  युवाओं पर व्यय की गई राशि का लाभ उस क्षेत्र को नहीं मिल पाता जिसके लिए उनको तैयार किया गया होता है। यह भी उचित मानव शक्ति के नियोजन के अभाव के कारण ही है।

भारत जैसे देश में जिस बात की वर्तमान में सर्वाधिक आवश्यकता है वह है मानव शक्ति नियोजन एवं मानव संसाधन विकास को प्राथमिकता देना। इसके लिए आवश्यक है कि प्राथमिक कक्षाओं से पूर्व [प्री-प्राइमरी स्टेज] ही बच्चे का मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया जाये। उसकी  रुचियों और अभिवृत्तियों का ज्ञान प्राप्त किया जाए। तत्पश्चात उसे उसकी अभिवृत्ति के अनुसार शिक्षण-आरंभ में यह कार्य अधिक व्यय एवं श्रमसाध्य होगा, किन्तु कालान्तर में इसके अच्छे परिणाम आएंगे। शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन कराते समय विद्यार्थी की विश्लेषणात्मक सोच का विकास किया जाए जिससे वह प्रत्येक पहलू की अच्छाई व बुराई को समझ सके।

राष्ट्र के विकास में मानव शक्ति को बाधक न समझा जाकर एक सहायक के रूप में समझा जाए जिन समस्याओं का जनसंख्या वृद्धि के साथ जुड़ी होने का दावा किया जाता है। यह देखा जाए कि उनके पीछे अन्य कौन-कौन से कारण जुड़े हुए हैं।

प्रत्येक सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थान में कार्यरत व्यक्तियों की आवश्यकताओं को देखते हुए उनको पूरा करने का यथासंभव प्रयास किया जाए बजाए अनुत्पादकीय कार्यों पर व्यय करने के। साथ ही श्रम को सर्वाधिक महत्ता देते हुए उसे एक संवेदनशील और सामाजिक प्राणी मानकर व्यवहार किया जाए।

युवा वर्ग को इस बात का अहसास कराया जाए कि मात्र सरकारी सेवा सब कुछ नहीं है उसे कार्य में विश्वास रखना चाहिए जो कहीं भी किसी क्षेत्र में किया जा सकता है। ऐसी प्रवृत्ति के चलते देश में बेरोजगारी जैसी समस्या स्वतः दूर हो जाएगी।

विभिन्न संस्थाओं में अच्छा कार्य करने के लिए धनात्मक अभिप्रेरण एवं लक्ष्य से कम कार्य या घटिया किस्म के उत्पाद की दशा में ऋणात्मक रूप से अभिप्रेरित किया जाए जिससे सही कार्य के लिए व्यक्ति स्वतः प्रेरित होगा।

अन्त में इस बात से इन्कार नहीं किया जा न सकता कि अबाध रूप से बढ़ती जनसंख्या विकास को प्रतिकूल रूप में प्रभावित कर सकती है किन्तु यह समस्या इतनी विकट भी नहीं है कि इसका हल ही नहीं हो सकता। आज प्रत्येक नागरिक, प्रबुद्धजन, प्रशासक तथा नीति-निर्माताओं का यह कर्तव्य बन जाता है कि वे केवल भाषण देकर या फाइल पर न इस समस्या की गंभीरता को लिखकर अपने कर्तव्य, ना की इतिश्री न समझ लें अपितु खुले दिमाग से इस पर मंथन करें और समय की आवश्यकतानुसार मानव शक्ति नियोजन व विकास को विशेष प्राथमिकता देते हुए कार्य करें, आने वाले समय में समस्या स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। 

रचनाकार

डा. सूरज सिंह नेगी

8 बी, 9 प्रताप नगर, टोंक फाटक, 

जयपुर (राजस्थान)

सूचना स्रोत

शिवराज जी कुर्मी

प्रस्तुति



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