भूमिका
नवी पीढ़ी की मोबाइल पर विविध कारणों से होती जा रही निर्भरता को देख और आम जनमानस की निर्भरता से चिंतित एक कवि मुकेश कुमावत जी ने अपने उद्गार प्रेषित किए हैं। आप पढ़ेंगे तो जानेंगे कि यह वाकई चिंता का विषय है।
विवरण
सूरज रोज निकलता है, रोज ढलता है, ना समय बदला, ना ही दिन-रात, सब कुछ वैसा का वैसा ही है, पर विज्ञान के नए-नए आविष्कारों और बढ़ती हुई तकनीक ने कुछ नया परिवर्तन ला दिया है। प्राचीन भारत की संस्कृति और जीने के तरीकों में तथा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बहुत अंतर आ चुका है। आज बच्चा जन्म से लेकर शिशु, बाल, किशोर और युवा अवस्था के मूलभूत मनोरंजन, संस्कार, ज्ञान, कौशलों को भूलकर केवल मात्र मोबाइल के भंवर में फंसता चला जा रहा है।
सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते हर क्षण, हर समय केवल और केवल मोबाइल के भंवर में फंसकर समय और जीवन दोनों को बर्बाद कर रहा है। बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी आय वृद्धि के फेर में शॉर्ट वीडियो, इमेज, विभिन्न कहानियां, शायरियां बनाकर और विभिन्न प्रकार के खेलों में बच्चों को फंसाकर उनका जीवन बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। मोबाइल रूपी भंवर जाल में बच्चे फंसते जा रहे हैं। इससे निकलने का दूर-दूर तक कोई उपाय दिखाई नहीं दे रहा है। अगर इसी तरह बच्चे इस भंवर में फंसे रहे तो भारत देश का भविष्य सुरक्षित नहीं है। सरकार और माता-पिता, गुरुजनों को विद्यालयों एवं अन्य तरीकों से प्रशिक्षण देखकर बच्चों को जागरूक करके मोबाइल रूपी भंवर से बाहर निकलने का अथक प्रयास करना चाहिए। तब ही इन बच्चों का जीवन सार्थक और सफल होगा।
प्रेषक
मुकेश कुमावत 'मंगल'
टोंक (राजस्थान)
प्रस्तुति



शानदार आलेख।
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