सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मूल्य आधारित शिक्षा के पतन पर एक समर्पित अधिकारी की चिंता

भूमिका

मूल्य आधारित शिक्षा में गिरावट समाज के नैतिक और सांस्कृतिक पतन का कारण बन सकती है। आजकल की शिक्षा में ज्ञान और तकनीकी कौशल पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, जबकि नैतिकता, सहानुभूति, और सामाजिक जिम्मेदारी पीछे छूटती जा रही हैं। इसके परिणामस्वरूप छात्र केवल करियर केंद्रित हो रहे हैं और मानवीय मूल्यों, जैसे ईमानदारी, सहिष्णुता, और सहयोग, का अभाव दिख रहा है। यह बदलाव न केवल व्यक्तिगत विकास को बाधित करता है, बल्कि समाज में अपराध, भ्रष्टाचार और असमानता को बढ़ावा देता है। मूल्य आधारित शिक्षा का पुनरुत्थान ही इन समस्याओं का समाधान हो सकता है।

शिक्षण संस्थाओं का बिगड़ता माहौल

आंकड़ों के विश्लेषण से तो यही ज्ञात होता है कि आजादी के पश्चात् देश में साक्षरता दर व शिक्षा जगत में तो सकारात्मक बदलाव आया है किन्तु शिक्षा का मूल्यांकन केवल मात्रात्मक आंकड़ों के इन रूप में न किया जाकर गुणात्मक रूप में भी किया जाना चाहिए। आज यदि हम नजर दौड़ाकर देखें तो अपने बीच में ऐसे तथाकथित शिक्षितों को पाते हैं जिनका कि नैतिक मूल्यों से कोई सरोकार नहीं है। वास्तव में, गौर किया जाए तो शिक्षण संस्थाओं से नैतिक मूल्य प्रायः लुप्त होते नजर आते हैं।

उच्च माध्यमिक स्तर से ही बालक के मन में प्रतियोगी परीक्षाओं का ऐसा भय पैदा कर दिया जाता है कि उसे अन्य मूल्यों की ओर ध्यान देने की फुर्सत ही नहीं मिलती। उसे प्रतियोगिता में अन्य को पीछे छोड़ आगे जाने की प्रेरणा दी जाती है। इसमें परिवारजन, मित्रगण, अध्यापकों का भरपूर सहयोग मिलता है। इसी क्रम में गौरतलब है कि उच्च शिक्षण संस्थाओं में राजनीति इस कदर घुसपैठ कर गई है कि अध्ययनरत छात्र-छात्राएं अपने जीवन के अमूल्य क्षण व शक्ति बर्बाद कर बैठते हैं। ऐसे में यदा-कदा तोड़फोड़, शिक्षकों का अपमान, लड़कियों से अश्लील हरकतें, कर्मचारियों से मारपीट आम बात हो गई है। क्या उच्च शिक्षा के यही मायने रह गए हैं? प्राचीन काल की तरह आज मूल्य आधारित शिक्षा नहीं दी जाती है। उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों में से कितने ऐसे हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में गीता, महाभारत, रामायण, वेद, पुराण जैसे ग्रन्थों का अध्ययन किया है या उनको आत्मसात् किया है?

आज जब पाश्चात्य देशों में भौतिकवाद व बढ़ती उपभोक्तावादी संस्कृति ने इतनी अधिक विकृतियां पैदा कर डाली हैं कि उन लोगों को आत्मिक सुख व शांति के लिए भारतीय दर्शन व आध्यात्म की शरण लेनी पड़ रही है, जबकि उनके पास शिक्षा की कमी नहीं है।

• शिक्षा का तेजी से होता व्यवसायीकरण भी इसके लिए उत्तरदाई ठहराया जा सकता है। आज स्कूल खोलकर रातों-रात मालामाल बनने की जो प्रवृत्ति जन्म ले चुकी है वह अत्यंत घातक है। प्रत्येक गली, मोहल्ले में स्कूल देखे जा सकते हैं जो स्कूल स्थापना के मानदण्डों में से एक को भी पूरा नहीं करते हैं। आश्चर्य तब होता है जब पढ़े-लिखे मां-बाप अपने बच्चे को एक सच्चा व ईमानदार इंसान बनाने की बजाय उस पर कलेक्टर, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील आदि बनाने पर जोर डालते हैं जिसके चलते वह सही व वास्तविक शिक्षा से वंचित हो जाता है।

इसी क्रम में यह भी उल्लेखनीय है कि आज अधिकांश शिक्षणशालाओं (सभी नहीं) में इस बात पर जोर दिया जाता है कि जैसे-तैसे बच्चों को कोर्स पूरा करा दिया जाए, परीक्षा आयोजन से पूर्व तोते की तरह रटा दिया जाए ताकि वह परीक्षा में अच्छे अंक ला सके। बालक के सर्वांगीण विकास पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। अंग्रेजी स्कूलों की तर्ज पर क्लास टीचर, प्रिंसिपल या अध्ययनरत छात्र-छात्राओं का बर्थडे बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर चाकलेट, टाफियां वितरित की जाती हैं, महंगे बर्थडे कार्ड दिए जाते हैं, किन्तु किसी महापुरुष या हमारे संतों के जन्मदिन पर महज छुट्टी की घोषणा कर कर्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है। आज आलम यह हो चुका है कि अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को एक-दूसरे का जन्मदिन कब है, अध्यापक का बर्थडे, वैडिंग ऐनीवर्सरी कब है, यह तो याद रहता है किन्तु उनसे किसी राष्ट्रीय स्तर के महापुरुष या संत के बारे में पूछा जाए तो मुंह ताकने  लगते हैं, इसमें दोष किसका है? स्पष्ट है शिक्षक व अभिभावक दोनों ही समाज में उत्पन्न इस प्रवृति के लिए जिम्मेदार हैं। अंत में यही कहना समीचीन जान पड़ता है कि अध्ययनरत छात्र-छात्राएं देश के भविष्य हैं, उनको वर्तमान में जिस प्रकार के संस्कार दिए जाएंगे भविष्य में भी वे उसी प्रकार का आचरण करेंगे। 

रचनाकार

डॉ. सूरज  सिंह नेगी, 8 बी, 9 प्रताप नगर, जयपुर-15

साभार राजस्थान पत्रिका से 

प्रस्तुति



टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

"मां की गोद से ऊंचाइयों तक — गिरिराज की आत्मकथा"

  मां की गोद से ऊंचाइयों तक  गिरिराज की आत्मकथा "मां की ही वह गोद है, जहां मानवता पले, अगर कहीं है जन्नत तो उसके आंचल के तले..."   यह पंक्ति मेरे जीवन का सार है — मेरी प्रेरणा, मेरा विश्वास और मेरी दिशा।   जब मैं पांच साल का था, तभी पिता जी — भंवरलाल गुर्जर — हमें छोड़कर चले गए। मां, मोती देवी, उस समय केवल 26 वर्ष की थीं। उस उम्र में जब जीवन शुरू होता है, उन्होंने अपना पूरा जीवन मेरे भविष्य के नाम कर दिया। मजदूरी करते हुए उन्होंने न केवल मुझे पाला, बल्कि यह यकीन भी दिलाया कि शिक्षा ही वह कुंजी है जो हर ताला खोल सकती है।   मां कहा करती थीं — "बेटा, गरीबी इंसान की हालत बदल सकती है, इरादा नहीं। मेहनत और ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी है।"  यह वाक्य मेरे जीवन का संबल बन गया।   लुहारा के सरकारी विद्यालय से मैंने पहली से आठवीं तक की पढ़ाई की। माध्यमिक शिक्षा मुंडिया से और उच्च माध्यमिक निवाई के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की — जहां से मैंने 1994–95 में 12वीं कक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई जयपुर के राजस्थान कॉलेज से की, जहां 1...

દીપક પંડ્યા (ગાંધીનગર) - Updated 04.06.2026

મારી ભાવયાત્રા 64 નમસ્કાર … સ્નેહવંદન ! માનવ જીવનની આખીય દોડ પાછળ જો કોઈ એક જ આકાંક્ષા છુપાયેલી હોય, તો તે છે 'ખુશી'. સવારથી સાંજ સુધી માણસ જે કંઈ પણ કરે છે—પૈસા કમાય છે, સત્તા મેળવે છે, સંબંધો બાંધે છે—એ બધાની પાછળનો અંતિમ ઉદ્દેશ્ય માત્રને માત્ર સુખ અને આનંદની પ્રાપ્તિ જ હોય છે. પરંતુ આજના ભૌતિકવાદી યુગમાં માણસ ખુશીની વ્યાખ્યા ભૂલી ગયો છે. તે વિચારે છે કે મેળવવામાં, સંગ્રહ કરવામાં કે અન્ય પાસે અપેક્ષા રાખવામાં ખુશી છે. પણ સત્ય એનાથી તદ્દન વિપરીત છે. સાચી ખુશી આપવામાં છે, લેવા કે માંગવામાં નથી. આ સૃષ્ટિનો અપરંપાર નિયમ છે કે ખુશીની આપણે જેટલી લહાણી કરીશું, તેટલી જ તે આપણી પાસે વ્યાજ સાથે પાછી આવશે. જરા ઊંડાણથી વિચારીએ તો સમજાશે કે 'લેવું' અને 'માંગવું' એ ભિખારીપણું છે, જ્યારે 'આપવું' એ ખુદ અમીરી છે. જ્યારે આપણે કોઈની પાસે કંઈક માંગીએ છીએ, પછી ભલે તે વસ્તુ હોય, પ્રેમ હોય કે આદર હોય, ત્યારે આપણે આપણી જાતને ખાલી અનુભવીએ છીએ. માંગવામાં હંમેશા અપેક્ષા અને પરવશતા હોય છે. અને જ્યાં અપેક્ષાઓનો પહાડ હોય, ત્યાં ક્યારેય સાચો આનંદ હોઈ શકે નહીં. કારણ કે અપેક્ષા હંમેશા...

मन की बातें भाव भरी

🙏🌹🌹❤️❤️🙏 शुभ प्रभात जी🙏🌹❤️🙏 आपका दिन मंगलमय हो। ईश्वर आपकी हर मंगलकामना पूर्ण करें— वह जो हारे का सहारा है, जो टिमटिमाता जुगनू भी है और अथाह ऊर्जा से भरा तारा भी। जो घोर तिमिर में प्रकाश बनकर उभरता है, और उजाले में भी दिन को बहार देता है। वह जो आकार–निराकार दोनों रूपों में दुष्टों का संहारक है, जो दिशाहीन के लिए दिशासूचक यंत्र का पारा बन जाता है। जो निर्धन के दुःख–दरिद्रता का अंत है, और धनी के लिए पौ-बराहा। जिसके हम भी हैं और जो हमारा भी है। जो भूखे के लिए अन्न है और पशुओं के लिए चारा, जो पत्थर, पहाड़ और समूची धरा का आधार है। 🌹 वह सबका भला करें🌹 🙏🌹🌹❤️❤️🙏 आज का विचार मेरी पुस्तक “हृदय उद्गार” से एक कविता — सर्व धर्म समभाव छिन्न-भिन्न सा हृदय मेरा, मन में तूफानी कोलाहल है। सभ्यता के शिखर पर पहुँचकर, धर्म बना क्यों क्रूर दावानल है? भूमि वही, आकाश वही, तुझमें वही, मुझमें वही। एक-सा ही सबका आंचल है, धरती माँ का पावन आँचल है। रक्त-कोष में बहता एक ही बल है, कहीं केसरिया, कहीं हरित दल है। आब पियो या पानी पियो, जल तो आखिर एक ही जल है। यह कैसा आया भेद-रूपी पल है? भिन्न-भिन्न नामों म...